साल 2000 के लाल किला आतंकी हमले के दोषी मोहम्मद आरिफ की फांसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट फिर सुनवाई करेगा। शीर्ष अदालत ने उसकी उपचारात्मक याचिका पर सहमति दी है और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है।
New Delhi: साल 2000 में हुए ऐतिहासिक लाल किला आतंकी हमले (Red Fort Attack) से जुड़े मामले में एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया चर्चा में आ गई है। इस हमले के दोषी और मौत की सजा पाए लश्कर-ए-तैयबा (Lashkar-e-Taiba) के आतंकवादी मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक की फांसी को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) दोबारा सुनवाई करेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने आरिफ की उपचारात्मक याचिका (Curative Petition) पर सुनवाई के लिए सहमति दे दी है और इस मामले में दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया गया है।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब इस केस में करीब ढाई दशक से न्यायिक प्रक्रिया चल रही है और इसे आतंकवाद से जुड़े सबसे संवेदनशील मामलों में गिना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने मोहम्मद आरिफ द्वारा दायर उपचारात्मक याचिका पर विचार करने का निर्णय लिया। यह याचिका किसी भी दोषी के पास उपलब्ध अंतिम कानूनी उपाय होती है। इससे पहले आरिफ की अपील याचिका (Appeal) और पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दोनों ही खारिज हो चुकी हैं।
सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी की विशेष पीठ ने वकीलों की दलीलें सुनीं। इसके बाद अदालत ने दिल्ली सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा कि इस याचिका पर विचार किया जाएगा।
क्या है लाल किला हमला
22 दिसंबर 2000 की रात दिल्ली के लाल किले में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, कुछ हथियारबंद घुसपैठिए लाल किले के अंदर उस क्षेत्र में दाखिल हुए थे, जहां भारतीय सेना की 7 राजपूताना राइफल्स यूनिट तैनात थी।
आतंकियों ने अचानक अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। इस हमले में भारतीय सेना के तीन जवान शहीद हो गए। यह हमला न सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल था, बल्कि इसे देश की संप्रभुता पर सीधा हमला माना गया।
जांच के दौरान इस हमले में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े आतंकवादी मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक की भूमिका सामने आई और उसे गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया गया।
निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सजा बरकरार

लाल किला हमले के बाद शुरू हुई न्यायिक प्रक्रिया कई चरणों से गुजरी। अक्टूबर 2005 में निचली अदालत (Trial Court) ने मोहम्मद आरिफ को दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई। अदालत ने इसे दुर्लभ से दुर्लभतम (Rarest of Rare) मामला माना।
इसके बाद सितंबर 2007 में दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए फांसी की सजा को बरकरार रखा।
आरिफ ने इसके बाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन अगस्त 2011 में शीर्ष अदालत ने भी मौत की सजा को वैध ठहराया।
पुनर्विचार याचिका भी हो चुकी है खारिज
सुप्रीम कोर्ट से सजा बरकरार रहने के बाद मोहम्मद आरिफ ने पुनर्विचार याचिका दायर की। हालांकि 3 नवंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को भी खारिज कर दिया था।
इसके साथ ही यह स्पष्ट हो गया था कि अब आरिफ के पास केवल एक ही कानूनी रास्ता बचता है, जिसे उपचारात्मक याचिका कहा जाता है। अब उसी याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सहमति दी है।
उपचारात्मक याचिका क्या होती है?
उपचारात्मक याचिका यानी क्यूरिटिव पिटीशन (Curative Petition) न्यायिक प्रक्रिया का अंतिम और असाधारण उपाय है। यह तब दायर की जाती है जब अपील और पुनर्विचार याचिका दोनों खारिज हो चुकी हों।
इस याचिका का मकसद यह सुनिश्चित करना होता है कि न्याय की प्रक्रिया में कोई गंभीर गलती न रह गई हो। सुप्रीम कोर्ट बहुत ही दुर्लभ मामलों में इस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करता है।
दिल्ली सरकार को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद अब दिल्ली सरकार को इस याचिका पर अपना पक्ष अदालत के सामने रखना होगा। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि मामले में आगे विस्तृत सुनवाई की जरूरत है या नहीं।
दो दशकों से ज्यादा लंबी न्यायिक लड़ाई
लाल किला हमले से जुड़े इस केस की न्यायिक यात्रा दो दशकों से भी अधिक समय की रही है। 2000 में हमला, 2005 में निचली अदालत का फैसला, 2007 में हाई कोर्ट की पुष्टि, 2011 में सुप्रीम कोर्ट का आदेश और 2022 में पुनर्विचार याचिका की अस्वीकृति के बाद अब उपचारात्मक याचिका पर सुनवाई हो रही है।











