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Samvatsari Pratikraman 2025: जानें क्या है यह जैन धर्म का महत्वपू्र्ण व्रत और इसे करने की सही विधि

Samvatsari Pratikraman 2025: जानें क्या है यह जैन धर्म का महत्वपू्र्ण व्रत और इसे करने की सही विधि

संवत्सरी प्रतिक्रमण जैन धर्म का प्रमुख वार्षिक अनुष्ठान है, जिसमें श्रद्धालु अपने वर्ष भर किए गए पापों के प्रायश्चित और आत्मनिरीक्षण करते हैं। यह पर्व प्रयुषण महापर्व के अंतिम दिन मनाया जाता है और आत्मशुद्धि, क्षमा और नैतिक जीवन की प्रेरणा देता है। श्रद्धालु मंदिर या घर पर दीप प्रज्वलित कर, प्रार्थना और प्रतिक्रमण सूत्र का पाठ करते हैं।

Samvatsari Pratikraman 2025: जैन धर्म का महत्वपूर्ण वार्षिक पर्व, संवत्सरी प्रतिक्रमण 2025, श्रद्धालुओं द्वारा अपने वर्ष भर के पापों का प्रायश्चित करने और आत्मनिरीक्षण के लिए विधिपूर्वक मनाया जा रहा है। यह पर्व प्रयुषण महापर्व के अंतिम दिन (श्वेतांबर परंपरा में 27 अगस्त, दिगंबर परंपरा में 6 सितंबर) पूरे भारत में उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। श्रद्धालु मंदिर या अपने घर के शुद्ध स्थान पर दीप प्रज्वलित कर, लोगस सूत्र और प्रतिक्रमण सूत्र का पाठ करते हैं, गुरु और धर्म के समक्ष अपनी गलतियों को स्वीकार कर क्षमा मांगते हैं। यह अनुष्ठान आत्मशुद्धि, नैतिक जीवन और आध्यात्मिक कल्याण का संदेश देता है।

सर्वोच्च महत्व का वार्षिक अनुष्ठान

संवत्सरी प्रतिक्रमण जैन धर्म का एक प्रमुख वार्षिक अनुष्ठान है, जिसे श्रद्धालु अपने वर्ष भर किए गए पापों के प्रायश्चित और आत्मनिरीक्षण के लिए करते हैं। यह पर्व प्रयुषण महापर्व के समापन के दिन मनाया जाता है। श्वेतांबर परंपरा में प्रयुषण आठ दिनों (20 अगस्त से 27 अगस्त 2025) तक चलता है, जबकि दिगंबर परंपरा में यह दस दिनों (28 अगस्त से 6 सितंबर 2025) तक आयोजित होता है। इस अवसर पर श्रद्धालु अपने मन, वचन और कर्म से हुए पापों के लिए क्षमा प्रार्थना करते हैं और भविष्य में उन्हें दोहराने से बचने का संकल्प लेते हैं।

संवत्सरी प्रतिक्रमण का समय और स्थान

संवत्सरी प्रतिक्रमण का अनुष्ठान आमतौर पर संध्या के समय किया जाता है। सूर्यास्त के बाद से रात 8 बजे तक इसे करने को शुभ माना जाता है। श्रावक उपवास रखते हुए मंदिर या उपाश्रय में सामूहिक रूप से प्रतिक्रमण करते हैं। यदि व्यक्ति मंदिर नहीं जा सकता, तो घर के किसी शुद्ध स्थान पर बैठकर भी प्रतिक्रमण किया जा सकता है। सही समय और विधि के लिए अपने स्थानीय जैन केंद्र या समुदाय से परामर्श लेना उत्तम माना जाता है।

विधि और अनुष्ठान का महत्व

प्रतिक्रमण के दौरान श्रद्धालु दीप प्रज्वलित कर, शांत मन से लोगस सूत्र, कयोत्सर्ग सूत्र, प्रतिक्रमण सूत्र और आलोचना सूत्र का पाठ करते हैं।कायोत्सर्ग की मुद्रा में बैठकर श्रद्धालु अपनी आत्मा पर ध्यान केंद्रित करते हैं और शरीर से निर्लिप्त होने का अभ्यास करते हैं। इस दौरान पूरे वर्ष में किए गए अपराध, हिंसा, असत्य और परिग्रह की स्मृति करते हुए गुरु और धर्म के समक्ष अपनी भूलों के लिए क्षमा प्रार्थना की जाती है। अंत में सभी जीवों, परिवार और समाज से यह प्रतिज्ञा ली जाती है—“मिच्छामि दुक्कडं”, यही कारण है कि इसे क्षमावाणी पर्व के नाम से जाना जाता है।

आध्यात्मिक महत्व 

संवत्सरी प्रतिक्रमण सिर्फ पापों की क्षमा का अवसर नहीं है, बल्कि यह आत्मनिरीक्षण और आध्यात्मिक शुद्धि का भी प्रतीक है। यह पर्व जैन अनुयायियों को नैतिक जीवन जीने, संयम, तप और त्याग के महत्व को समझने की प्रेरणा देता है और आत्मा के कल्याण और मोक्ष की ओर मार्गदर्शन करता है।

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