वैशाख संकष्टी चतुर्थी 2026 को 5 अप्रैल को मनाई जाएगी, जिसमें पूजा के लिए सुबह और शाम के शुभ मुहूर्त निर्धारित हैं। इस दिन रात 9:58 बजे चंद्र दर्शन के बाद व्रत पूर्ण माना जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह ‘बड़ी चतुर्थी’ विशेष फलदायी होती है और विघ्नों को दूर करती है।
Vaishakh Sankashti Chaturthi 2026: वैशाख माह की संकष्टी चतुर्थी 5 अप्रैल 2026 को पूरे देश में श्रद्धा के साथ मनाई जाएगी, जिसमें भगवान गणेश की पूजा और व्रत रखा जाएगा। इस दिन सुबह 7:41 से दोपहर 12:24 और शाम 6:41 से रात 10:58 तक पूजा का शुभ मुहूर्त रहेगा, जबकि रात 9:58 बजे चंद्रमा का उदय होगा। भक्त चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलेंगे। इस व्रत को करने से विघ्न दूर होने और अक्षय पुण्य प्राप्त होने की मान्यता है।
पूजा मुहूर्त और चंद्रोदय का सही समय
वैशाख संकष्टी चतुर्थी के दिन पूजा के लिए सुबह 7:41 बजे से दोपहर 12:24 बजे तक का समय शुभ माना गया है। इसके अलावा शाम को 6:41 बजे से रात 10:58 बजे तक भी पूजा का विशेष मुहूर्त रहेगा, जिसमें भक्त गणेश जी की आराधना कर सकते हैं।
इस दिन चंद्रमा का उदय रात 9:58 बजे होगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्र दर्शन के बाद ही पूर्ण माना जाता है। इसलिए भक्त चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत खोलते हैं, जिससे व्रत का पूरा फल प्राप्त होता है।

क्यों कहलाती है ‘बड़ी चतुर्थी’
वैशाख माह को हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। पुराणों में उल्लेख है कि इस महीने में किए गए व्रत, दान और स्नान का फल अक्षय होता है, यानी इसका पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। यही कारण है कि इस माह में आने वाली संकष्टी चतुर्थी को ‘बड़ी चतुर्थी’ कहा जाता है।
गणेश पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति श्रद्धा से इस व्रत का पालन करता है, उसके सभी विघ्न भगवान गणेश की कृपा से समाप्त हो जाते हैं। यह व्रत सालभर की चतुर्थियों के समान फल देने वाला माना गया है, इसलिए इसका महत्व और बढ़ जाता है।
पूजा विधि और व्रत का तरीका
वैशाख संकष्टी चतुर्थी के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं और भगवान गणेश का ध्यान कर व्रत का संकल्प लिया जाता है। घर के मंदिर या साफ स्थान पर चौकी सजाकर गणेश जी की मूर्ति या चित्र स्थापित किया जाता है।
पूजा में दूर्वा, मोदक या लड्डू, फूल, धूप-दीप और रोली-अक्षत अर्पित किए जाते हैं। दिनभर व्रत रखकर “ॐ गणेशाय नमः” का जाप किया जाता है और शाम को कथा व आरती की जाती है। रात में चंद्र दर्शन कर अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोला जाता है।
कथा और धार्मिक महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान गणेश ने विकट रूप धारण कर कामासुर नामक दैत्य का वध किया था। इस रूप में उन्होंने भक्तों को भय, रोग और संकटों से मुक्ति दिलाई। इसलिए इस दिन भगवान विकट की विशेष पूजा की जाती है।
मान्यता है कि इस व्रत को करने से जीवन के ज्ञात-अज्ञात कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का मार्ग खुलता है। यही कारण है कि हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस व्रत को पूरी श्रद्धा के साथ करते हैं।








