यह कहानी है रसोइ घर (Kitchen) की एक टोकरी की, जहाँ रात होते ही सब्ज़ियाँ आपस में बातें करने लगती हैं। अक्सर तो वे दोस्त होती हैं, लेकिन एक रात 'आलू' के घमंड और 'टमाटर' की शान के बीच ऐसी बहस छिड़ी कि पूरी टोकरी अखाड़ा बन गई। जानिए कैसे उनकी यह तकरार एक मज़ेदार सीख में बदल गई।
कहानी
रात के 12 बज चुके थे। घर के सभी लोग गहरी नींद में सो रहे थे, लेकिन रसोई घर में आज अलग ही चहल-पहल थी। सब्ज़ियों की टोकरी में एक अजीब सा तनाव फैला हुआ था।
मामला तब शुरू हुआ जब आलू, जो खुद को सब्ज़ियों का राजा समझता था, ने अपनी मोटी तोंद पर हाथ फेरते हुए कहा, 'सुनो सब लोग! इसमें कोई शक नहीं कि मैं इस दुनिया की सबसे ज़रूरी सब्ज़ी हूँ। मेरे बिना न समोसा बन सकता है, न पराठा और न ही टिक्की। मैं हर जगह हूँ, इसलिए मैं ही यहाँ का असली बॉस हूँ।'
पास ही बैठे लाल-लाल टमाटर को यह बात चुभ गई। उसने अपनी चमकती हुई लाल त्वचा को दिखाया और हँसते हुए बोला, 'रहने दो आलू भाई! तुम सिर्फ़ पेट भरते हो, लेकिन स्वाद तो मुझसे आता है। देखो मुझे, मैं कितना सुंदर, लाल और रसीला हूँ। मुझे लोग कच्चा भी खा सकते हैं, सलाद में भी और सूप में भी। तुम तो मिट्टी में सने रहते हो, बोरिंग कहीं के!'
आलू को गुस्सा आ गया। उसने कहा, 'ऐ लाल मुंह वाले! ज़बान संभाल कर बात कर। मैं बच्चों का फेवरेट हूँ। मुझे कोई भी कभी भी खा सकता है।'
टमाटर ने चिढ़ाते हुए कहा, 'हाँ, तभी तो बच्चे तुम्हें खाकर गोल-मटोल हो जाते हैं! मुझमें विटामिन हैं, ताज़गी है।'
अब यह बहस सिर्फ़ आलू और टमाटर तक सीमित नहीं रही। बाकी सब्ज़ियाँ भी अपनी-अपनी तरफदारी करने लगीं।
हरी मिर्च, जो स्वभाव से ही तीखी थी, कूदकर टमाटर की तरफ आ गई। वह तीखी आवाज़ में बोली, 'टमाटर भाई सही कह रहे हैं! आलू तो बस स्वाद को दबा देता है। असली मज़ा तो तीखेपन और खटास में है।'
उधर, बैंगन ने अपनी हरी टोपी ठीक की और भारी आवाज़ में आलू का पक्ष लिया, 'शांत रहो मिर्च! आलू के बिना हम सब्ज़ियों का कोई वजूद नहीं। वह हम सबके साथ मिल जाता है। वह सबसे मिलनसार है।'
भिंडी, जो पतली और नाज़ुक थी, उसने कहा, 'मुझे तो आलू बिल्कुल पसंद नहीं। वह मुझे चिपचिपा बना देता है। मैं टमाटर के साथ हूँ।'
देखते ही देखते टोकरी दो गुटों में बंट गई। एक तरफ 'आलू सेना' और दूसरी तरफ 'टमाटर सेना'। गोभी और मटर आलू के साथ हो लिए, जबकि गाजर और मूली टमाटर की तरफ चले गए।
शोर इतना बढ़ गया कि कोने में पड़ा कद्दू (Pumpkin) अपनी नींद से जाग गया। उसने उबासी लेते हुए कहा, 'अरे भाई! क्यों लड़ रहे हो? हम सब एक ही खेत से आए हैं।' लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी। आलू चिल्लाया, 'आज फैसला हो ही जाए! कल सुबह देखते हैं कि मालकिन किसे चुनती हैं।' टमाटर ने भी चुनौती स्वीकार की, 'हाँ, देख लेना! वह सबसे पहले मुझे ही उठाएंगी।'
पूरी रात वे एक-दूसरे को घूरते रहे। सुबह हुई, सूरज की किरणें रसोई में आईं। मालकिन रसोइ में दाखिल हुईं। टोकरी में सन्नाटा छा गया। आलू और टमाटर दोनों ने अपनी सांसें रोक लीं।
मालकिन ने टोकरी की तरफ देखा। उन्होंने सबसे पहले आलू को उठाया। आलू ने मन ही मन सोचा, 'देखा! मेरी जीत हुई।' लेकिन अगले ही पल, मालकिन ने टमाटर को भी उठा लिया।
उन्होंने आलू को धोया, छीला और छोटे टुकड़ों में काट दिया। फिर टमाटर को भी काटा। कड़ाही में तेल गर्म हुआ। 'छनन्न!' की आवाज़ आई। मालकिन ने जीरा डाला, फिर आलू और थोड़ी देर बाद टमाटर।
कड़ाही के अंदर अब आलू और टमाटर एक साथ थे। गर्मी बढ़ रही थी। आलू ने धीरे से कहा, 'अरे टमाटर भाई, यहाँ तो बहुत गर्मी है।' टमाटर ने कहा, 'हाँ आलू भाई, मैं तो गल रहा हूँ।'
धीरे-धीरे दोनों पकने लगे। आलू का सादापन और टमाटर का खट्टा रस आपस में मिलने लगा। मिर्च ने तीखापन दिया और धनिए ने खुशबू। थोड़ी ही देर में रसोई में एक ऐसी लाजवाब महक फैल गई कि घर का छोटा बच्चा दौड़ता हुआ आया। 'मम्मी! क्या खुशबू आ रही है! आज लंच में क्या है?'
मम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा, 'तुम्हारी पसंद, आलू-टमाटर की रसेदार सब्ज़ी।'
कड़ाही के अंदर, आलू और टमाटर ने एक-दूसरे को देखा। अब वे अलग नहीं थे। वे मिलकर एक बेहतरीन डिश बन चुके थे। आलू ने मुस्कुराते हुए कहा, 'यार टमाटर, मान गए! तुम्हारे रस ने मुझमें जान डाल दी।' टमाटर भी पिघलते हुए बोला, 'और तुम्हारे बिना मेरा खट्टापन भी किसी काम का नहीं था दोस्त।'
उस दिन सबने उंगलियां चाट-चाट कर खाना खाया। आलू और टमाटर समझ गए थे कि लड़ने में नहीं, बल्कि मिल-जुलकर रहने में ही असली मज़ा और स्वाद है।
सीख
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि 'हम सब में अलग-अलग खूबियां होती हैं। जब हम खुद को दूसरों से बेहतर समझने के बजाय मिल-जुलकर काम करते हैं, तो हम सबसे बेहतरीन परिणाम दे सकते हैं। एकता में ही असली शक्ति (और स्वाद) है।'













