सीकर में 4000 बीघा कृषि भूमि अधिग्रहण के विरोध में हजारों किसानों ने कलेक्ट्रेट का घेराव किया। एयरपोर्ट और रेलवे प्रोजेक्ट के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए किसानों ने जमीन बचाने और बिना सहमति अधिग्रहण रोकने की मांग रखी।
सीकर: राजस्थान के सीकर जिले में प्रस्तावित विकास परियोजनाओं को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। तारपुरा और दादिया क्षेत्र के हजारों किसानों ने अपनी कृषि भूमि के संभावित अधिग्रहण के विरोध में जिला कलेक्ट्रेट का घेराव कर दिया।
किसानों का आरोप है कि प्रस्तावित एयरपोर्ट, रेलवे लाइन और अन्य औद्योगिक परियोजनाओं के लिए लगभग 4000 बीघा उपजाऊ जमीन अधिग्रहित की जा सकती है, जिससे उनकी आजीविका खतरे में पड़ जाएगी।
कलेक्ट्रेट पर बड़ा प्रदर्शन और महापड़ाव
सोमवार को किसानों ने ट्रैक्टरों, बसों और निजी वाहनों के बड़े काफिले के साथ सीकर कलेक्ट्रेट पहुंचकर जोरदार प्रदर्शन किया। हजारों की संख्या में किसान और महिलाएं इस आंदोलन में शामिल हुए।
प्रदर्शन के दौरान किसानों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और अपनी मांगों को लेकर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा।
किन परियोजनाओं का विरोध हो रहा है?
किसानों का विरोध मुख्य रूप से चार प्रमुख प्रस्तावित परियोजनाओं को लेकर है:
1. प्रस्तावित तारपुरा ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट
किसानों का कहना है कि एयरपोर्ट परियोजना के लिए बड़ी मात्रा में कृषि भूमि ली जा रही है, जिससे गांवों की पूरी खेती व्यवस्था प्रभावित होगी।
2. रेलवे लाइन परियोजना
नवलगढ़–बेरी–बसावा क्षेत्र में प्रस्तावित रेलवे लाइन को लेकर भी किसानों ने आपत्ति जताई है।
3. सीमेंट प्लांट परियोजना
औद्योगिक विकास के तहत प्रस्तावित सीमेंट प्लांट के लिए भी जमीन अधिग्रहण का विरोध किया जा रहा है।
4. जेरठी–दादिया अंडरपास परियोजना
इस परियोजना की डिजाइन और स्थान को लेकर भी ग्रामीणों में असंतोष है।

किसानों की प्रमुख 4 मांगें
- किसानों ने प्रशासन के सामने चार मुख्य मांगें रखी हैं:
- ग्राम सभा और किसानों की लिखित सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण न किया जाए
- एयरपोर्ट और रेलवे परियोजना पर किसानों के साथ सीधा संवाद किया जाए
- जेरठी–दादिया अंडरपास की डिजाइन और स्थान पर पुनर्विचार किया जाए
औद्योगिक परियोजनाओं के लिए उपजाऊ खेतों के बजाय बंजर भूमि का उपयोग किया जाए
हजारों वाहनों के काफिले के साथ पहुंचे किसान
प्रदर्शन में शामिल किसानों का काफिला बेहद बड़ा था। जानकारी के अनुसार, गांवों से लगभग:
- 34 बसें
- 80 ट्रैक्टर
- 100 से अधिक निजी वाहन
- करीब 100 बाइकें
किसान सुबह 9:30 बजे अपने गांवों से रवाना हुए और दोपहर तक कलेक्ट्रेट पहुंचकर प्रदर्शन किया।
‘एक इंच जमीन भी नहीं छोड़ेंगे’ – किसानों का कड़ा रुख
प्रदर्शन के दौरान किसानों ने साफ कहा कि वे अपनी उपजाऊ जमीन किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। उनका कहना है कि यह जमीन उनकी आजीविका का मुख्य साधन है और इसे खोने पर पूरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पलायन की स्थिति बन सकती है।
किसानों ने यह भी आरोप लगाया कि लगातार विकास परियोजनाओं के नाम पर उनकी कृषि भूमि छीनी जा रही है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति खतरे में पड़ जाएगी।
धार्मिक और सामाजिक महत्व का भी मुद्दा
किसानों ने यह भी दावा किया कि प्रस्तावित भूमि में कई धार्मिक और सामाजिक स्थल शामिल हैं। इनमें प्राचीन मंदिर, देवस्थान और सार्वजनिक उपयोग की भूमि शामिल है।
उनका कहना है कि भूमि अधिग्रहण से न केवल कृषि व्यवस्था प्रभावित होगी, बल्कि स्थानीय सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान भी खतरे में पड़ सकती है।
गोचर भूमि और पशुपालन पर असर
किसानों के अनुसार प्रस्तावित परियोजनाओं से लगभग 166 हेक्टेयर गोचर भूमि प्रभावित होगी। इसके अलावा:
- सार्वजनिक श्मशान भूमि
- खेल मैदान
- सामुदायिक भवन
- पशु चिकित्सा केंद्र
- गौशाला
भी प्रभावित हो सकते हैं। इससे पशुपालन और ग्रामीण जीवन पर गंभीर असर पड़ेगा।
प्रशासन को सौंपा गया ज्ञापन
किसानों ने जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर अपनी मांगें रखीं। प्रदर्शन के दौरान करीब आधे घंटे तक कलेक्ट्रेट परिसर में नारेबाजी होती रही।
प्रशासनिक अधिकारियों ने ज्ञापन प्राप्त कर मामले को संबंधित विभाग तक पहुंचाने का आश्वासन दिया है।
विकास बनाम विस्थापन की बहस
इस पूरे मामले ने एक बार फिर विकास परियोजनाओं और ग्रामीण विस्थापन के बीच संतुलन पर बहस छेड़ दी है। एक तरफ सरकार बुनियादी ढांचे और आर्थिक विकास के लिए बड़े प्रोजेक्ट्स को जरूरी बता रही है, वहीं दूसरी ओर किसान अपनी जमीन और आजीविका को लेकर चिंतित हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में पारदर्शी संवाद और स्थानीय लोगों की सहमति बेहद जरूरी है।
आगे की स्थिति क्या हो सकती है?
यदि किसानों और प्रशासन के बीच सहमति नहीं बनती है, तो यह आंदोलन और तेज हो सकता है। किसान संगठनों ने संकेत दिया है कि वे आगे भी विरोध प्रदर्शन जारी रख सकते हैं।
प्रशासन के लिए अब चुनौती यह है कि विकास परियोजनाओं और किसानों के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।











