31 जुलाई को शहीद उधम सिंह का बलिदान दिवस मनाया जाता है। उन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड के जिम्मेदार माइकल ओ'डायर को मारकर हजारों निर्दोष भारतीयों के लिए न्याय का संदेश दिया। उनका साहस, त्याग और देशभक्ति आज भी हर भारतीय को प्रेरित करती है।
Sacrifice of Udham Singh: हर वर्ष 31 जुलाई को भारत महान क्रांतिकारी शहीद उधम सिंह का बलिदान दिवस मनाता है। यह दिन उस वीर सपूत को श्रद्धांजलि देने का अवसर है, जिसने जलियांवाला बाग हत्याकांड के हजारों निर्दोष भारतीयों की शहादत का बदला लेने के लिए अपने जीवन का बलिदान दे दिया। उधम सिंह का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन अमर सेनानियों में शामिल है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने में कोई संकोच नहीं किया। उनका साहस, देशभक्ति और न्याय के प्रति समर्पण आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
प्रारंभिक जीवन
शहीद उधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में हुआ था। उनका बचपन अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बीता। बचपन में ही माता-पिता का निधन हो जाने के कारण उन्हें और उनके बड़े भाई को अमृतसर के खालसा अनाथालय में रहना पड़ा। यहीं उनका पालन-पोषण हुआ और उन्हें "उधम सिंह" नाम मिला। कम उम्र में ही उन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों को करीब से देखा, जिसने उनके मन में आजादी की लौ जला दी।
जलियांवाला बाग हत्याकांड ने बदल दी जिंदगी
13 अप्रैल 1919 का दिन भारतीय इतिहास के सबसे काले दिनों में गिना जाता है। बैसाखी के अवसर पर हजारों लोग अमृतसर के जलियांवाला बाग में एकत्रित थे। तभी ब्रिटिश अधिकारी जनरल रेजिनाल्ड डायर ने बिना किसी चेतावनी के निहत्थी भीड़ पर गोलियां चलाने का आदेश दे दिया। इस नरसंहार में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हुए। कहा जाता है कि उस समय युवा उधम सिंह वहां मौजूद थे और उन्होंने घायल लोगों की सहायता भी की। इस दर्दनाक घटना ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला और उन्होंने संकल्प लिया कि इस अत्याचार के जिम्मेदार लोगों को वे कभी नहीं छोड़ेंगे।
प्रतिशोध की प्रतिज्ञा
जलियांवाला बाग हत्याकांड के पीछे तत्कालीन पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ'डायर की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती थी। उधम सिंह ने उसी समय यह प्रण लिया कि वह इस नरसंहार का बदला जरूर लेंगे। इसके बाद उन्होंने देश-विदेश की यात्राएं कीं, क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया और लंबे समय तक सही अवसर का इंतजार करते रहे। उन्होंने कई देशों का दौरा किया और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारियों के संपर्क में रहे।

लंदन में लिया बदला
करीब 21 वर्षों तक अपने संकल्प को जीवित रखने के बाद 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में आयोजित एक सभा के दौरान उधम सिंह ने माइकल ओ'डायर पर गोलियां चला दीं। इस हमले में ओ'डायर की मृत्यु हो गई। गिरफ्तारी के बाद उन्होंने भागने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने गर्व से स्वीकार किया कि उन्होंने यह कार्य जलियांवाला बाग के निर्दोष शहीदों के न्याय के लिए किया है। उनका कहना था कि उन्होंने किसी व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण नहीं, बल्कि अपने देशवासियों के सम्मान और न्याय के लिए यह कदम उठाया।
अदालत में निर्भीक बयान
मुकदमे के दौरान उधम सिंह ने ब्रिटिश अदालत में बिना किसी डर के अपने विचार रखे। उन्होंने अंग्रेजी शासन को अमानवीय बताया और कहा कि भारत के लोगों पर किए गए अत्याचारों का जवाब देना उनका कर्तव्य था। उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्हें अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है। उनके इन शब्दों ने दुनिया का ध्यान भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई की ओर आकर्षित किया।
बलिदान और अमरता
ब्रिटिश सरकार ने उधम सिंह को मृत्युदंड की सजा सुनाई। 31 जुलाई 1940 को लंदन की पेंटनविल जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। फांसी के समय भी उनके चेहरे पर डर नहीं, बल्कि मातृभूमि के लिए बलिदान का गर्व था। बाद में वर्ष 1974 में उनके पार्थिव अवशेष भारत लाए गए, जहां पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।
युवाओं के लिए प्रेरणा
उधम सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना और देश के सम्मान की रक्षा करना हर नागरिक का कर्तव्य है। उनका साहस, धैर्य और दृढ़ संकल्प आज भी युवाओं को राष्ट्रसेवा, आत्मसम्मान और न्याय के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। आज के दौर में उनका संदेश केवल प्रतिशोध का नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ अडिग रहने, देशप्रेम और मानवता की रक्षा का भी है।













