शंकराचार्य लिखने पर विवाद! धरने पर बैठे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, सुप्रीम कोर्ट ने नहीं लगाई

शंकराचार्य लिखने पर विवाद! धरने पर बैठे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, सुप्रीम कोर्ट ने नहीं लगाई

प्रयागराज माघ मेला में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद शाही स्नान और संतों के साथ मारपीट के विरोध में धरने पर बैठे। सुप्रीम कोर्ट ने शंकराचार्य पद लिखने पर रोक नहीं लगाई। मेला प्रशासन द्वारा नोटिस जारी किया गया था।

UP News: प्रयागराज माघ मेला में मौनी अमावस्या के अवसर पर शाही स्नान और संतों के साथ मारपीट के विरोध में जगद्गुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर बैठे हैं। इस दौरान मेला प्राधिकरण द्वारा उन्हें नोटिस जारी किया गया, जिसमें शंकराचार्य का पद लिखने पर आपत्ति जताई गई थी। इसके विरोध में उनके वकील ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने शंकराचार्य लिखने पर कोई रोक नहीं लगाई है। वकील ने बताया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य हैं और उनके द्वारा की गई वसीयत के आधार पर वे शंकराचार्य लिख रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट का रुख 

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के अधिवक्ता पीएन मिश्र ने मीडिया से बातचीत में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ पट्टाभिषेक, यानी आधिकारिक शंकराचार्य पद ग्रहण करने की प्रक्रिया पर रोक लगाई है। इसके विपरीत, शंकराचार्य के पद का इस्तेमाल करने या उसे अपने नाम के साथ लिखने पर कोई रोक नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के मार्गदर्शन और रजिस्टर्ड वसीयत के आधार पर शंकराचार्य लिख रहे हैं।

स्वामी निश्चलानंद का दृष्टिकोण

स्वामी निश्चलानंद सरस्वती, जो पुरी पीठाधीश्वर हैं, ने इस विवाद पर अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि वे इस मामले में न किसी के पक्ष में हैं और न ही विपक्ष में। स्वामी निश्चलानंद ने अविमुक्तेश्वरानंद को अपना लाडला बताया, लेकिन यह भी कहा कि विवाद में उनकी कोई सक्रिय भूमिका नहीं है।

उनका मानना है कि मेला प्रशासन का निर्णय अकाट्य है और मीडिया तथा अन्य लोग इसे अधिक तूल दे रहे हैं, जो उचित नहीं है।

मेला प्रशासन का नोटिस

माघ मेला प्राधिकरण द्वारा जारी नोटिस में कहा गया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य का पद लिख रहे हैं, जो विवादास्पद है। प्रशासन ने यह कदम मेला के शांतिपूर्ण आयोजन और अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य से उठाया। इस नोटिस के बाद कई संत और धर्मगुरु इस विषय पर सार्वजनिक रूप से बोलने लगे, जिससे विवाद और बढ़ गया।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की प्रतिक्रिया

धरने पर बैठे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि उनका उद्देश्य केवल धार्मिक और सांस्कृतिक जिम्मेदारी निभाना है। उन्होंने जोर दिया कि वे अपने गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की वसीयत के आधार पर शंकराचार्य लिख रहे हैं और उनका यह कदम किसी प्रकार का विरोध या चुनौती नहीं है। स्वामी ने यह भी कहा कि उनका ध्यान माघ मेला के शाही स्नान और धार्मिक अनुष्ठानों की गरिमा बनाए रखने पर है।

वकील पीएन मिश्र का बयान

अधिवक्ता पीएन मिश्र ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पट्टाभिषेक पर रोक है, लेकिन शंकराचार्य लिखने पर कोई रोक नहीं है। उन्होंने मीडिया से अपील की कि इस मामले को भड़काने के बजाय तथ्य के आधार पर प्रस्तुत किया जाए। उनका कहना था कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के कार्य धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं और इसे विवाद का रूप देने की जरूरत नहीं है।

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