Shweta Tripathi: 'मिर्जापुर' की गोलू ने श्वेता त्रिपाठी की जिंदगी पर डाला गहरा असर, टाइपकास्टिंग को लेकर कही बड़ी बात

Shweta Tripathi ने बताया कि ‘मिर्जापुर’ की गोलू का किरदार उनकी निजी जिंदगी पर भी गहरा असर डाल गया। अभिनेत्री ने टाइपकास्टिंग के डर और किरदार से बाहर निकलने पर

‘मसान’ से लेकर ‘मिर्जापुर द मूवी’ तक का सफर तय कर चुकीं एक्ट्रेस श्वेता त्रिपाठी को आज दर्शक शालू गुप्ता से ज्यादा ‘गोलू’ के नाम से जानते हैं। ‘मिर्जापुर’ में किताब पढ़ने वाली लड़की से लेकर बंदूक उठाकर एक्शन करने तक का उनका सफर दर्शकों को काफी पसंद आया है।

एंटरटेनमेंट न्यूज़: अभिनेत्री श्वेता त्रिपाठी ने वेब सीरीज 'मिर्जापुर' में गोलू गुप्ता का किरदार निभाकर दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। सीरीज में एक शांत और किताबें पढ़ने वाली लड़की से लेकर मजबूत और बेखौफ महिला तक गोलू का सफर काफी प्रभावशाली रहा। अब 'मिर्जापुर द मूवी' को लेकर चर्चा में चल रहीं श्वेता ने एक इंटरव्यू में इस किरदार के साथ अपने अनुभव और इसके निजी जीवन पर पड़े असर के बारे में खुलकर बात की है।

श्वेता के मुताबिक, गोलू का किरदार उनके लिए सिर्फ एक एक्टिंग असाइनमेंट नहीं था। लंबे समय तक इस किरदार को निभाने के दौरान उसकी भावनाओं, गुस्से, दर्द और मानसिक संघर्ष का असर उन पर भी पड़ा। अभिनेत्री ने बताया कि किरदार से पूरी तरह बाहर निकलने में उन्हें काफी समय लगा और इसके लिए उन्होंने थेरेपी की मदद भी ली।

शालू से गोलू तक का सफर

श्वेता त्रिपाठी को 'मसान' में शालू गुप्ता के किरदार के लिए भी काफी सराहना मिली थी। उनके अनुसार, शालू और गोलू के व्यक्तित्व में कई अंतर होने के बावजूद दोनों किरदारों में कुछ समानताएं भी हैं।

दोनों ही किरदारों का किताबों से गहरा जुड़ाव है और दोनों अपने तरीके से मजबूत व्यक्तित्व दिखाती हैं। हालांकि गोलू का व्यक्तित्व शालू की तुलना में अधिक आक्रामक और दृढ़ नजर आता है। श्वेता का मानना है कि किसी महिला का मजबूत होना सिर्फ शारीरिक शक्ति दिखाने तक सीमित नहीं है। आत्मविश्वास, ज्ञान, मानसिक मजबूती और रोजमर्रा के फैसले भी व्यक्ति की ताकत को दर्शाते हैं।

अभिनेत्री ने यह भी बताया कि गोलू के किरदार से उन्होंने शारीरिक और मानसिक फिटनेस के महत्व को समझा। उनके लिए किरदार का बदलाव केवल हथियार उठाने या एक्शन करने तक सीमित नहीं था, बल्कि उसके पीछे की मानसिकता को समझना भी उतना ही जरूरी था।

गोलू के किरदार में सबसे मुश्किल क्या था?

श्वेता के लिए गोलू का किरदार निभाने की सबसे बड़ी चुनौती उसका ट्रॉमा और भावनात्मक दर्द था। गोलू की जिंदगी में कई ऐसे घटनाक्रम आते हैं, जो उसके व्यक्तित्व और सोच को पूरी तरह बदल देते हैं। अभिनेत्री ने बताया कि करीब नौ साल तक गोलू के साथ जुड़े रहने के कारण वह इस किरदार से भावनात्मक रूप से जुड़ गई थीं। लगातार गुस्सा, बदला, अकेलापन और मुश्किल परिस्थितियों से गुजरने वाली गोलू की मानसिक स्थिति को पर्दे पर उतारना उनके लिए आसान नहीं था।

श्वेता के मुताबिक, किसी किरदार को लंबे समय तक निभाने के दौरान उसकी बॉडी लैंग्वेज, बोलने का तरीका, व्यवहार और भावनात्मक स्थिति कलाकार की दिनचर्या का हिस्सा बन सकती है। गोलू के मामले में यही अनुभव उनके लिए सबसे चुनौतीपूर्ण रहा।

गोलू ने श्वेता की मानसिक स्थिति को किया प्रभावित

श्वेता ने खुलासा किया कि गोलू के किरदार ने उन्हें मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक स्तर पर काफी प्रभावित किया। किरदार में मौजूद अकेलापन, गुस्सा और मानसिक संघर्ष को लंबे समय तक निभाने के कारण उन्हें उससे बाहर निकलने में परेशानी हुई। अभिनेत्री के अनुसार, गोलू की भूमिका से खुद को अलग करने के लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी और उन्होंने थेरेपिस्ट की मदद भी ली। इससे यह पता चलता है कि किसी गहरे और लंबे समय तक निभाए गए किरदार से बाहर निकलना कलाकार के लिए कितना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

क्या टाइपकास्टिंग से डरती हैं श्वेता?

'मिर्जापुर' में गोलू की लोकप्रियता के बाद यह सवाल भी उठता रहा कि कहीं श्वेता त्रिपाठी एक खास तरह के किरदारों तक सीमित न हो जाएं। हालांकि अभिनेत्री खुद टाइपकास्ट होने को लेकर चिंतित नहीं हैं। श्वेता ने कहा कि दर्शकों ने 'मिर्जापुर' से पहले भी उनके अलग-अलग काम देखे हैं। 'मसान', 'हरामखोर', 'लाखों में एक' और 'मेड इन हेवन' जैसे प्रोजेक्ट्स में उनके किरदार एक-दूसरे से अलग रहे हैं। इसलिए उनका मानना है कि दर्शक कलाकार और उसके किरदार के बीच अंतर समझते हैं।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह आगे भी अलग-अलग तरह के प्रोजेक्ट्स करना चाहती हैं। उनके लिए एक ही तरह के किरदार को बार-बार दोहराने के बजाय नई भूमिकाओं और कहानियों के साथ प्रयोग करना अधिक महत्वपूर्ण है।

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