सोनीपत जिले में पिछले तीन दशकों के दौरान बड़ी संख्या में तालाब और जोहड़ खत्म हो गए हैं। इसके चलते भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। कई क्षेत्रों में भूजल संकट गहराने के साथ डार्क जोन की स्थिति बन चुकी है।
सोनीपत: प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण में लगातार लापरवाही और बढ़ते अतिक्रमण का असर अब सोनीपत में साफ दिखाई देने लगा है। जिले में पिछले 30 वर्षों के दौरान अधिकांश तालाब और जोहड़ समाप्त हो गए हैं, जिससे भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि कई इलाकों में जल संकट गंभीर रूप ले चुका है और भूजल दोहन चिंता का प्रमुख विषय बन गया है।
तीन दशक में सिमट गए प्राकृतिक जल स्रोत
सोनीपत जिले में कभी तालाब, जोहड़ और कुएं ग्रामीण और शहरी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करते थे। ये जल स्रोत वर्षा जल संचयन के साथ-साथ भूजल रिचार्ज में भी अहम भूमिका निभाते थे। लेकिन पिछले तीन दशकों में तेजी से हुए शहरी विस्तार, अतिक्रमण और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण इनकी संख्या में भारी गिरावट आई है।
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हरियाणा अध्ययन एवं शोध संस्थान के सर्वे के अनुसार जिले के 323 गांवों में करीब 1,500 तालाब और जोहड़ मौजूद थे। वर्तमान में इनकी संख्या घटकर 500 से भी कम रह गई है। वहीं सोनीपत शहर में जहां कभी 24 छोटे-बड़े तालाब थे, अब केवल छह ही बचे हैं। कई ऐतिहासिक जल स्रोतों पर निर्माण कार्य हो गए हैं, जबकि कुछ स्थानों को कूड़ा डालकर समतल कर दिया गया।
भूजल स्तर में लगातार गिरावट
तालाबों और जोहड़ों के खत्म होने का सीधा असर जिले के भूजल स्तर पर पड़ा है। वर्षा जल का प्राकृतिक संचयन कम होने से भूमिगत जल पर निर्भरता बढ़ती गई। इसके साथ ही कृषि, उद्योग और शहरी जरूरतों के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन भी जारी रहा।
स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुरथल क्षेत्र में भूजल स्तर 24.61 मीटर तक पहुंच चुका है। कई गांवों में यह 40 मीटर से भी अधिक गहराई पर चला गया है। कुंडली, राई, गन्नौर, मुरथल और बीसवां मील जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में भूजल का अत्यधिक दोहन पर्यावरण विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्राकृतिक जल स्रोतों का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में पेयजल संकट और गंभीर हो सकता है।
अतिक्रमण और विकास कार्य बने बड़ी वजह
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के विस्तार के साथ कई तालाबों और जोहड़ों की जमीन पर कॉलोनियां, पार्क, स्कूल, पंचायत भवन, खेल मैदान और अन्य निर्माण कार्य कर दिए गए। कई स्थानों पर जल स्रोतों का उपयोग कूड़ा डंपिंग के लिए होने लगा, जिससे उनका अस्तित्व ही समाप्त हो गया।
शहर के सुंदर सांवरी, कालूपुर चुंगी और जटवाड़ा जैसे प्रमुख तालाबों के संरक्षण और पुनर्विकास की योजनाएं भी वर्षों से कागजों में ही सीमित हैं। नतीजतन वर्षा जल संग्रहण की पारंपरिक व्यवस्था लगभग खत्म हो गई और भूजल रिचार्ज की प्रक्रिया कमजोर पड़ती गई।
अमृत सरोवर योजना भी नहीं दिखा सकी अपेक्षित परिणाम
जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से शुरू की गई अमृत सरोवर योजना से बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन जिले में यह योजना अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी। जिले के 33 चयनित तालाबों में से केवल 15 का ही विकास पूरा हो पाया है। छह तालाबों पर अभी भी काम चल रहा है, जबकि 12 परियोजनाएं विभिन्न कारणों से शुरू ही नहीं हो सकीं।
जिन तालाबों का विकास किया गया, उनमें भी कई स्थानों पर वर्षा जल के बजाय दूषित पानी जमा हो रहा है। रखरखाव की कमी के कारण करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद कई अमृत सरोवर अपने मूल उद्देश्य को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। बरोणा और पबसरा जैसे गांवों में विकसित सरोवरों की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली बताई जा रही है।
जल संरक्षण पर गंभीर कदम उठाने की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तालाबों, जोहड़ों और अन्य पारंपरिक जल स्रोतों को संरक्षित करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो जिले में जल संकट और गहरा सकता है। वर्षा जल संचयन, अतिक्रमण हटाने, पुराने तालाबों के पुनर्जीवन और भूजल दोहन पर नियंत्रण जैसे उपायों को प्राथमिकता देने की जरूरत है।
सोनीपत में घटते जल स्रोत केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं हैं, बल्कि भविष्य की जल सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुके हैं। ऐसे में प्रशासन, स्थानीय निकायों और आम नागरिकों की साझा भागीदारी ही इस संकट का स्थायी समाधान निकाल सकती है।










