कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम के बयान पर नाराजगी जताई है। बर्नहम ने दास व्यापार के लिए औपचारिक माफी पर विचार करने की बात कही थी। थरूर ने सवाल उठाया कि इसमें ब्रिटेन के औपनिवेशिक शासन और उससे हुए नुकसान का जिक्र क्यों नहीं किया गया।
नई दिल्ली: कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम के उस बयान की आलोचना की है, जिसमें उन्होंने ट्रांस-अटलांटिक दास व्यापार में ब्रिटेन की भूमिका के लिए औपचारिक माफी मांगने पर विचार करने की बात कही थी। थरूर का कहना है कि केवल गुलामी के इतिहास को स्वीकार करना काफी नहीं है। ब्रिटेन को उन देशों में अपने औपनिवेशिक शासन के दौरान हुए शोषण और नुकसान की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए। उन्होंने माफी की चर्चा में उपनिवेशवाद को शामिल नहीं किए जाने को बेहद शर्मनाक और अक्षम्य बताया है।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री के बयान पर थरूर ने उठाए सवाल
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने हाल ही में कहा था कि उनकी सरकार दास व्यापार में ब्रिटेन की ऐतिहासिक भूमिका के लिए औपचारिक माफी मांगने की मांग पर बातचीत करने को तैयार है। इसके बाद शशि थरूर ने शनिवार, 31 अक्टूबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया दी।
थरूर ने कहा कि दास व्यापार के कारण लोगों को जो पीड़ा झेलनी पड़ी, उसके लिए ब्रिटेन की ओर से माफी मांगने पर विचार करना अच्छी शुरुआत हो सकती है। लेकिन इस चर्चा में ब्रिटिश उपनिवेशवाद को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
उनके अनुसार, ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के दौरान कई देशों के लोगों को आर्थिक शोषण, हिंसा और दूसरे गंभीर नुकसान का सामना करना पड़ा। ब्रिटेन को उस इतिहास को भी स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि जब सरकार गुलामी पर अपने अतीत की जिम्मेदारी मानने की बात कर रही है, तो औपनिवेशिक शासन के नुकसान पर चुप्पी क्यों है।
ब्रिटेन ने औपनिवेशिक शोषण के लिए माफी नहीं मांगी: थरूर
शशि थरूर लंबे समय से ब्रिटिश शासन के दौरान भारत को हुए आर्थिक और सामाजिक नुकसान का मुद्दा उठाते रहे हैं। उन्होंने अपनी नई प्रतिक्रिया में भी इसी बात को दोहराया।
थरूर ने कहा कि ब्रिटेन ने औपनिवेशिक शासन के दौरान हुई लूट, हिंसा और तबाही के लिए अब तक व्यापक औपचारिक माफी नहीं मांगी है। उनके मुताबिक, यह इतिहास केवल भारत तक सीमित नहीं है। ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहे कई देशों के लोगों ने लंबे समय तक इसका असर झेला।
कांग्रेस सांसद का मानना है कि ऐसे नुकसान की भरपाई केवल पैसों से नहीं की जा सकती। लेकिन ब्रिटेन की ओर से ऐतिहासिक गलतियों को स्वीकार करना और उनके लिए नैतिक रूप से माफी मांगना जरूरी है।
थरूर पहले भी ब्रिटिश उपनिवेशवाद के आर्थिक प्रभावों पर खुलकर बोल चुके हैं। उनकी किताब 'इनग्लोरियस एम्पायर: व्हाट द ब्रिटिश डिड टू इंडिया' में भी भारत पर ब्रिटिश शासन के प्रभावों की चर्चा की गई है।
दास व्यापार के लिए माफी पर क्या बोले एंडी बर्नहम?
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने ब्रिटिश अखबार 'द गार्डियन' में लिखे अपने लेख में देश के पुराने इतिहास को लेकर बात की है। उनका कहना है कि ब्रिटेन अपने अतीत की उन घटनाओं से मुंह नहीं मोड़ सकता, जिनकी वजह से दूसरे देशों और वहां के लोगों को नुकसान उठाना पड़ा था। कॉमनवेल्थ देशों के साथ रिश्ते बेहतर करने हैं तो इन मुद्दों पर खुलकर बात करनी होगी।
बर्नहम के मुताबिक, ब्रिटिश सरकार उन देशों और समुदायों से बातचीत करना चाहती है, जिनके पूर्वज ट्रांस-अटलांटिक दास व्यापार का शिकार हुए थे। इस दौरान ब्रिटेन की ओर से माफी मांगने के मुद्दे पर भी चर्चा हो सकती है। हालांकि, उन्होंने अभी माफी मांगने का कोई ऐलान नहीं किया है। सरकार फिलहाल इस मांग को सुनने और उस पर बातचीत करने के लिए तैयार है।
वहीं, गुलामी के दौर में हुए नुकसान के बदले पैसे देने की मांग से बर्नहम सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि सदियों पहले जो कुछ हुआ, उसकी आर्थिक जिम्मेदारी आज ब्रिटेन में रहने वाले लोगों पर डालना सही नहीं होगा। उस समय की घटनाओं में आज के नागरिकों की कोई भूमिका नहीं थी।
कॉमनवेल्थ की बैठक में उठ सकता है गुलामी का मामला
प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है, जब एंटीगुआ और बारबुडा में कॉमनवेल्थ देशों के नेताओं की बैठक होने वाली है। माना जा रहा है कि इस बैठक में गुलामी के पुराने इतिहास और उससे प्रभावित देशों की मांगों पर भी बात होगी।
अफ्रीका और कैरेबियाई देशों के नेता काफी समय से चाहते हैं कि ब्रिटेन दास व्यापार में अपनी भूमिका स्वीकार करे। उनकी मांग है कि गुलामी के कारण जिन देशों और समुदायों को नुकसान पहुंचा, उनके लिए ब्रिटेन को कुछ ठोस कदम भी उठाने चाहिए।
हालांकि, बर्नहम ने सीधे आर्थिक मुआवजे की जगह गरीब कॉमनवेल्थ देशों को कर्ज में राहत देने का सुझाव दिया है। उनके प्रस्ताव के मुताबिक, इन देशों को कर्ज लौटाने के लिए ज्यादा समय मिल सकता है और ब्याज दरों में भी राहत दी जा सकती है।
कैरेबियाई देशों के कुछ नेताओं ने ब्रिटेन के बातचीत के लिए आगे आने को अच्छा कदम बताया है, लेकिन वे मुआवजे की मांग छोड़ने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि केवल बातचीत से पुराने नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती।
ब्रिटिश शासन को लेकर भारत में भी उठते रहे हैं सवाल
इस पूरे मामले में कांग्रेस सांसद शशि थरूर की प्रतिक्रिया के बाद भारत में ब्रिटिश शासन का इतिहास फिर चर्चा में आ गया है। भारत पर अंग्रेजों के शासन के दौरान देश की अर्थव्यवस्था, व्यापार और संसाधनों पर पड़े असर को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।
इतिहासकारों और राजनीतिक नेताओं के बीच आज भी इस बात पर बहस होती है कि ब्रिटिश शासन से भारत को कितना आर्थिक नुकसान हुआ और ब्रिटेन को इसकी जिम्मेदारी किस तरह स्वीकार करनी चाहिए। अब गुलामी के मुद्दे पर माफी की चर्चा शुरू होने से औपनिवेशिक शासन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।








