सुलतानपुर के अस्पताल में अब तक शुरू नहीं हुई सिजेरियन सुविधा अपर निदेशक ने प्रभारी अधीक्षक से 2 दिन में मांगा जवाब

सुलतानपुर के अस्पताल में अब तक सिजेरियन सुविधा शुरू नहीं होने पर अपर निदेशक ने नाराजगी जताई। प्रभारी अधीक्षक से दो दिन में जवाब मांगा गया है।
सुलतानपुर के अस्पताल में अब तक शुरू नहीं हुई सिजेरियन सुविधा अपर निदेशक ने प्रभारी अधीक्षक से 2 दिन में मांगा जवाब
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सुलतानपुर के एक अस्पताल में अब तक सिजेरियन ऑपरेशन की सुविधा शुरू नहीं होने का मामला सामने आया है। स्वास्थ्य विभाग के अपर निदेशक ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए अस्पताल के प्रभारी अधीक्षक से जवाब तलब किया है। उन्हें दो दिन के भीतर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया गया है।

अस्पताल में सिजेरियन सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण प्रसव के गंभीर मामलों में मरीजों को दूसरे अस्पतालों में रेफर करना पड़ सकता है। इससे गर्भवती महिलाओं और उनके परिवारों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। खासकर आपात स्थिति में समय पर इलाज मिलना बेहद जरूरी होता है।

स्वास्थ्य विभाग की ओर से अस्पताल में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं की समीक्षा के दौरान सिजेरियन सेवा शुरू नहीं होने का मामला सामने आया। इसके बाद अपर निदेशक ने अस्पताल प्रशासन से स्थिति को लेकर जानकारी मांगी। प्रभारी अधीक्षक से यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि सुविधा अब तक क्यों शुरू नहीं हो सकी।

अस्पताल में सिजेरियन सुविधा शुरू करने के लिए ऑपरेशन थिएटर, प्रशिक्षित डॉक्टर, एनेस्थीसिया विशेषज्ञ, नर्सिंग स्टाफ और जरूरी उपकरणों की उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है। विभाग अब यह भी देख रहा है कि इनमें से कौन-कौन सी व्यवस्थाएं पूरी हैं और किन कारणों से सेवा शुरू करने में देरी हो रही है।

सिजेरियन ऑपरेशन की सुविधा सरकारी अस्पताल में उपलब्ध होने से क्षेत्र की गर्भवती महिलाओं को काफी राहत मिल सकती है। सामान्य प्रसव के मामलों के साथ-साथ ऐसी गर्भवती महिलाओं का भी इलाज स्थानीय स्तर पर किया जा सकेगा, जिन्हें चिकित्सकीय कारणों से ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है।

यदि अस्पताल में सुविधा उपलब्ध नहीं होती है तो डॉक्टरों को मरीज को उच्च चिकित्सा केंद्र के लिए रेफर करना पड़ता है। गंभीर स्थिति में अस्पताल तक पहुंचने में लगने वाला अतिरिक्त समय मरीज और नवजात दोनों के लिए जोखिम बढ़ा सकता है। यही वजह है कि स्वास्थ्य विभाग अस्पतालों में प्रसव और आपात चिकित्सा सेवाओं को मजबूत करने पर जोर देता है।

अपर निदेशक द्वारा जवाब मांगे जाने के बाद अब अस्पताल प्रशासन को दो दिन के भीतर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। प्रभारी अधीक्षक को यह बताना होगा कि सिजेरियन सेवा शुरू करने में क्या बाधाएं हैं और उन्हें दूर करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।

विभाग यह भी जानना चाहता है कि अस्पताल में ऑपरेशन से संबंधित जरूरी संसाधन मौजूद हैं या नहीं। यदि किसी उपकरण, विशेषज्ञ डॉक्टर या अन्य स्टाफ की कमी है तो उसकी जानकारी भी उच्च अधिकारियों को दी जा सकती है। इसके बाद जरूरत के अनुसार संसाधन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

मामले में अस्पताल प्रशासन की ओर से दिए जाने वाले जवाब के बाद आगे की कार्रवाई तय होने की संभावना है। यदि सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद सेवा शुरू नहीं की गई है तो जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है।

स्थानीय स्तर पर सिजेरियन सुविधा की मांग लंबे समय से महत्वपूर्ण मानी जाती रही है, क्योंकि ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों की गर्भवती महिलाओं को प्रसव के दौरान कई बार जिला या बड़े निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। इससे इलाज का खर्च बढ़ने के साथ परिवार को आने-जाने की परेशानी भी होती है।

सरकारी अस्पताल में यह सुविधा शुरू होने पर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सबसे ज्यादा लाभ मिल सकता है। निजी अस्पतालों में सिजेरियन प्रसव का खर्च अधिक होने के कारण कई परिवार सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर रहते हैं।

फिलहाल अपर निदेशक के निर्देश के बाद अस्पताल प्रशासन की जवाबदेही बढ़ गई है। दो दिन में मांगे गए जवाब से यह स्पष्ट होगा कि सिजेरियन सुविधा शुरू करने में देरी की असली वजह क्या है और सेवा कब तक शुरू की जा सकती है। स्वास्थ्य विभाग की अगली कार्रवाई भी इसी जवाब पर निर्भर करेगी।

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