सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 'बच्चा गोद लेने वाली महिलाओं को मिलेगी 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव'

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 'बच्चा गोद लेने वाली महिलाओं को मिलेगी 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव'

भारत में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और समावेशी फैसला सुनाया है, जो बच्चा गोद लेने वाली महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करता है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि गोद लेने वाली किसी भी महिला को 12 हफ्ते का मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) मिलेगा, चाहे बच्चा किसी भी उम्र का क्यों न हो।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान को असंवैधानिक घोषित कर दिया। पहले यह प्रावधान गोद लेने वाली माताओं के लिए मैटरनिटी लीव (मातृत्व अवकाश) केवल उन मामलों तक सीमित करता था, जहाँ बच्चा तीन महीने से कम उम्र का होता। कोर्ट ने अपने फ़ैसले में स्पष्ट किया कि बच्चे की उम्र चाहे जो भी हो, गोद लेने वाली सभी माताओं को गोद लेने की तारीख से 12 हफ़्ते की छुट्टी का अधिकार मिलेगा। 

कोर्ट ने कहा कि जैविक मां की तरह, गोद लेने वाली महिला को भी मातृत्व अवकाश का पूरा अधिकार मिलना चाहिए, ताकि वह बच्चे की देखभाल और पालन-पोषण में पर्याप्त समय दे सके।

पहले की व्यवस्था और असंवैधानिक घोषित प्रावधान

पहले ‘कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी 2020’ की धारा 60(4) के तहत मैटरनिटी लीव केवल उन महिलाओं तक सीमित थी, जो तीन महीने से छोटे बच्चों को गोद लेती थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया और कहा कि उम्र के आधार पर गोद लेने वाली माताओं को छुट्टी देने में भेदभाव करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “मैटरनिटी लीव का अधिकार बच्चे की उम्र या माता-पिता बनने के तरीके पर निर्भर नहीं करता। गोद लेने वाली माताओं को भी जैविक मां की तरह छुट्टी का पूरा हक मिलना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह बातें रेखांकित कीं, किसी भी मां में कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता, चाहे वह जैविक जन्म से मां बनी हो या बच्चे को गोद लिया हो। बच्चे का भावनात्मक विकास और नए परिवार में ढलना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। बड़े बच्चे, विशेषकर जो संस्थागत देखभाल से आते हैं, उन्हें नए परिवेश में ढलने के लिए अतिरिक्त समय की जरूरत होती है।

मातृत्व अवकाश सिर्फ जैविक जन्म तक सीमित नहीं, बल्कि गोद लेने की प्रक्रिया में भी लागू होता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रजनन की आज़ादी का अधिकार केवल जैविक जन्म तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गोद लेने की प्रक्रिया भी शामिल है।

पैटरनिटी लीव पर सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी कहा कि वह पितृत्व अवकाश (पैटरनिटी लीव) शुरू करने पर विचार करे। अदालत ने जोर दिया कि बच्चे की देखभाल में लिंग-तटस्थ और समावेशी दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। कोर्ट का यह निर्देश सामाजिक कल्याण और परिवारों में समान जिम्मेदारी सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

यह फैसला कर्नाटक की वकील हमसानंदिनी नंदुरी की याचिका पर आया है। उन्होंने पुराने प्रावधानों को चुनौती दी थी, जिनमें गोद लेने वाली माताओं के लिए छुट्टी की उम्र सीमा निर्धारित की गई थी। याचिका में यह भी बताया गया कि भारत में गोद लेने की प्रक्रिया में आमतौर पर तीन महीने से छोटे बच्चों को ही प्राथमिकता दी जाती है, जिससे यह उम्र-सीमित लाभ अधिकतर मामलों में अप्रासंगिक हो जाता था।

इस याचिका की पैरवी वकील बानी दीक्षित ने की। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि मैटरनिटी बेनिफिट्स को सभी माताओं के लिए समान रूप से लागू करना संविधान की दृष्टि से जरूरी है।

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