सुप्रीम कोर्ट ने ब्राह्मणों के खिलाफ नफरती भाषणों को जाति-आधारित भेदभाव के रूप में दंडनीय अपराध मानने की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि, ब्राह्मण क्या, हम तो किसी भी समुदाय के खिलाफ नफरती भाषण नहीं चाहते हैं।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने ब्राह्मणों के खिलाफ नफरती भाषण (हेट स्पीच) को जाति-आधारित दंडनीय अपराध मानने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने साफ कहा कि किसी भी समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने वाले भाषण स्वीकार्य नहीं हैं और नफरत के खिलाफ लड़ाई सभी समुदायों के लिए समान रूप से होनी चाहिए।
याचिकाकर्ता महालिंगम बालाजी ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की थी कि ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ हेट स्पीच पर तुरंत कानूनी कार्रवाई की जाए और जांच की जाए कि क्या कोई संगठित अभियान चल रहा है, जिसका उद्देश्य इस समुदाय के खिलाफ नफरत या हिंसा फैलाना है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए बालाजी को याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी। अदालत ने इस आदेश को रिकॉर्ड में दर्ज किया और याचिका को रद्द कर दिया।
जस्टिस नागरत्ना ने कही महत्वपूर्ण बातें
सुप्रीम कोर्ट की पीठ में शामिल न्यायमूर्ति नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि किसी विशेष समुदाय को केवल अपने खिलाफ नफरती भाषण से सुरक्षा क्यों चाहिए, दूसरों के लिए क्यों नहीं? उन्होंने कहा कि नफरत फैलाने वाले भाषण में किसी को भी शामिल नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता विशेष मामलों को उचित मंचों पर उठा सकते हैं, लेकिन न्यायपालिका के समक्ष इसे प्राथमिक मुद्दा बनाना सही नहीं है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, “हम नहीं चाहते कि देश में किसी भी समुदाय के खिलाफ हेट स्पीच हो। यह शिक्षा, बौद्धिक विकास, सहिष्णुता और धैर्य पर निर्भर करता है। जब सभी भाईचारे का पालन करेंगे, तो नफरती भाषण का कोई स्थान नहीं रहेगा।”
याचिकाकर्ता की मांग

बालाजी ने याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों से यह अनुरोध किया था कि:
- ब्राह्मणों के खिलाफ हेट स्पीच को जाति-आधारित भेदभाव के दंडनीय रूप में मान्यता दी जाए।
- ऐसे मामलों में तुरंत कानूनी कार्रवाई की जाए।
- यदि कोई जनसेवक या संवैधानिक पदाधिकारी ब्राह्मणों के खिलाफ जाति-आधारित नफरती भाषण में लिप्त पाया जाता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी समुदाय विशेष इस तरह की सुरक्षा का हकदार नहीं है, बल्कि नफरत फैलाने वाले भाषण के खिलाफ कानूनी कार्रवाई सभी के लिए समान रूप से होनी चाहिए। सुनवाई के दौरान बालाजी ने यह भी तर्क दिया कि सोशल मीडिया पर न्यायपालिका को निशाना बनाया जा रहा है। पीठ ने कहा कि न्यायपालिका को इस पर चिंता नहीं है और ऐसे मामलों को सही मंच पर उठाना ही उचित होगा।











