देश में न्यायिक प्रणाली पर लगातार बढ़ते दबाव और लंबित मामलों की संख्या पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि अदालतों में दाखिल हो रहे कई मुकदमे वास्तविक न्याय पाने की इच्छा से कम और कार्यवाही में देरी करने, विरोधियों को परेशान करने और न्यायिक समय बर्बाद करने के उद्देश्य से अधिक प्रेरित दिखाई देते हैं।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ते मुकदमों पर कड़ी टिप्पणी की है और कहा है कि अदालतों में दाखिल हो रहे कई मामले न्याय पाने की वास्तविक इच्छा से कम, और कार्यवाही में देरी करने, विरोधियों को परेशान करने तथा न्यायिक समय बर्बाद करने के उद्देश्य से अधिक प्रेरित दिखाई देते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक व्यवस्था का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
जस्टिस Deepankar Dutta और जस्टिस AG Masiha की पीठ ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल वास्तविक और गंभीर विवादों का समाधान करना है, न कि बार-बार या बेतुके दावों को बढ़ावा देना।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह शामिल थे, ने कहा कि न्यायिक प्रणाली का उद्देश्य केवल वास्तविक और गंभीर विवादों का समाधान करना है। उन्होंने यह भी कहा कि बार-बार या निरर्थक दावे उठाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। पीठ ने यह स्पष्ट किया कि:
'यदि कोई पक्ष जानबूझकर निरर्थक या परेशान करने वाले मुकदमे दायर करता है, तो अदालत ऐसे मामलों को खारिज करने के साथ जुर्माना भी लगा सकती है। किसी एक विवाद को अलग-अलग तरीकों से बार-बार उठाना न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ है। इससे अदालतों पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है और अन्य मामलों में न्याय मिलने में भी देरी होती है।'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का सही उपयोग केवल उन्हीं मामलों के लिए होना चाहिए जिनमें वास्तविक और गंभीर विवाद हो।

लंबित मामले: आंकड़े बताते गंभीर स्थिति
देशभर में न्यायिक प्रणाली पर बढ़ते दबाव को आंकड़े भी प्रमाणित करते हैं:
- लगभग 5.5 करोड़ केस देश की विभिन्न अदालतों में लंबित हैं, जिनमें ज्यादातर निचली अदालतों में दर्ज हैं।
- सुप्रीम कोर्ट में 10 वर्ष से अधिक समय से 698 से अधिक जनहित याचिकाएं लंबित हैं।
- कुल 3500 जनहित याचिकाएं आजतक सुनवाई का इंतजार कर रही हैं। इनमें से कई को पिछले 42 वर्षों में भी निपटाया नहीं जा सका।
ये आंकड़े दर्शाते हैं कि न्यायिक प्रणाली पर लगातार बढ़ता बोझ देश के नागरिकों के लिए न्याय मिलने में देरी का कारण बन रहा है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक सिविल अपील को खारिज करते हुए आई। यह मामला हैदराबाद के हिमायत नगर स्थित संपत्ति विवाद से जुड़ा था। अदालत ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, हालांकि कुछ तर्कों से असहमति भी जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी विवाद को बार-बार अदालतों में उठाना न्यायिक व्यवस्था के लिए हानिकारक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह केवल न्याय पाने के वास्तविक उद्देश्य को ही प्रभावित करता है।










