Supreme Court ने अलांद दरगाह में पूजा-अर्चना रोकने की याचिका खारिज की, महाशिवरात्रि से पहले विवाद समाप्त

Supreme Court ने अलांद दरगाह में पूजा-अर्चना रोकने की याचिका को खारिज कर महाशिवरात्रि से पहले विवाद को समाप्त कर दिया। पूरा अपडेट पढ़ें। सुप्रीम कोर्ट का रुख

सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कर्नाटक के अलांद दरगाह में हिंदू धर्म से संबंधित पूजा-अर्चना की अनुमति देने वाले न्यायिक आदेशों पर रोक लगाने की मांग वाली रिट याचिका खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर कहा कि इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 32 का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

Maha Shivratri Puja at Dargah: कर्नाटक के अलांद दरगाह में महाशिवरात्रि से पहले पूजा-अर्चना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बड़ी स्पष्टता दिखाई। शीर्ष अदालत ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें दरगाह में हिंदू धर्म से संबंधित पूजा-अर्चना पर रोक लगाने की मांग की गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस मामले में याचिका दाखिल नहीं की जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका कौन लाया था?

इस मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की बेंच ने की। याचिकाकर्ता खलील अंसारी थे, जो दरगाह हजरत मलिकुल मशाइख मकदूम लाडले अंसारी (सुन्नी) की प्रबंध समिति के सचिव बताए गए हैं। याचिकाकर्ता का तर्क था कि हाईकोर्ट द्वारा विशेष अवसरों पर पूजा-अर्चना की अनुमति देने वाले आदेश दरगाह की वक्फ संपत्ति की धार्मिक स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं।

हाईकोर्ट ने समय-समय पर विशेष अवसरों के लिए पूजा-अर्चना करने की अनुमति दी थी। इसमें आगामी 15 फरवरी की महाशिवरात्रि भी शामिल थी। अदालत ने तदर्थ व्यवस्थाओं के तहत अनुशासन बनाए रखा और यह आदेश पारित किया कि निर्धारित अवसरों पर पूजा की जा सकती है।

याचिकाकर्ता के तर्क

याचिकाकर्ता ने दावा किया कि दरगाह की वक्फ स्थिति को सुरक्षित रखने के लिए कोर्ट को निर्देश देना चाहिए कि किसी भी तीसरे पक्ष को पूजा-अर्चना की अनुमति न दी जाए। उन्होंने दिसंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश का हवाला भी दिया, जिसमें कहा गया था कि न्यायालयों को संपत्ति के धार्मिक स्वरूप पर सवाल उठाने वाली नई याचिकाओं पर विचार करने से रोक दिया गया है।

वरिष्ठ अधिवक्ता विभा दत्ता मखीजा ने कहा कि उच्च न्यायालय पहले ही इस मामले का फैसला कर चुका है और याचिकाकर्ता को सुप्रीम कोर्ट में आने की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि “रेस ज्यूडिकाटा” का सिद्धांत लागू होता है।

सुप्रीम कोर्ट का रुख

जस्टिस दत्ता ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल करना सही तरीका नहीं है। अदालत ने कहा कि याचिका हाईकोर्ट द्वारा खारिज होने पर ही न्यायालय में विचार के लिए लायी जा सकती है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता इस मामले को अनुच्छेद 26 के तहत अपने धार्मिक अधिकारों के आधार पर आगे बढ़ा सकते हैं।

मखीजा ने बताया कि वक्फ ट्रिब्यूनल ने दरगाह की संपत्ति को 1976 में स्थायी रूप से वक्फ घोषित किया था। इसके बावजूद, पिछले कई वर्षों से तीसरे पक्ष हर साल महाशिवरात्रि से पहले रिट याचिकाएं दायर कर राहत मांगते रहे हैं। अदालत ने इस अनुरोध को खारिज कर दिया।

Leave a comment