त्रिपुरा के खोवाई जिले की लखपति दीदी लिपि भौमिक सूखे गोबर से folders, मूर्तियां और दीये जैसे पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद बना रही हैं। TRLM से मिली 5.10 लाख रुपये की सहायता ने उनके उद्यम को शुरू करने और विकसित करने में मदद की।
अगरतला: अगर सही सोच, प्रशिक्षण और संस्थागत सहयोग मिले तो रोजमर्रा में बेकार समझी जाने वाली चीज भी आय का जरिया बन सकती है। त्रिपुरा के खोवाई जिले की लिपि भौमिक ने इसी सोच को अपने उद्यम के जरिए साबित किया है। पश्चिम सोनातला की रहने वाली लिपि ने सूखे गोबर से सजावटी और उपयोगी वस्तुएं बनाने का कारोबार शुरू किया है। उनका यह प्रयास ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिला उद्यमिता और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने वाली मिसाल बनकर सामने आया है।
लिपि भौमिक को इस उद्यम को स्थापित करने के लिए त्रिपुरा रूरल लाइवलीहुड्स मिशन यानी TRLM के माध्यम से 5.10 लाख रुपये की वित्तीय सहायता मिली। इस आर्थिक सहयोग का इस्तेमाल उन्होंने गोबर आधारित उत्पाद तैयार करने वाले अपने छोटे उद्यम को विकसित करने में किया। उनके कारोबार में folders, धार्मिक एवं सजावटी मूर्तियां और दीये जैसे उत्पाद शामिल हैं।
बेकार समझी जाने वाली सामग्री से तैयार हो रहे उपयोगी उत्पाद
ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर आमतौर पर पशुपालन से जुड़ा एक सामान्य उप-उत्पाद माना जाता है। इसका इस्तेमाल पारंपरिक रूप से ईंधन, खाद और कृषि संबंधी गतिविधियों में होता रहा है। लिपि भौमिक ने इसी स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री को एक अलग दृष्टिकोण से देखा और इससे बाजार में उपयोग किए जा सकने वाले उत्पाद बनाने का रास्ता चुना।
सूखे गोबर को उचित तरीके से तैयार और प्रसंस्कृत करके उससे विभिन्न आकार और डिजाइन की वस्तुएं बनाई जा सकती हैं। लिपि के उद्यम में तैयार किए जा रहे दीये और सजावटी वस्तुएं विशेष रूप से त्योहारी और धार्मिक अवसरों के लिए उपयोगी हो सकती हैं। वहीं, folders जैसे उत्पाद यह दिखाते हैं कि प्राकृतिक या पुनर्चक्रित सामग्री का इस्तेमाल केवल सजावटी वस्तुओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
इस तरह उनका मॉडल waste-to-wealth यानी कचरे या कम मूल्य वाली सामग्री को आर्थिक मूल्य वाले उत्पाद में बदलने की अवधारणा से जुड़ता है।
5.10 लाख रुपये की सहायता से खड़ा हुआ उद्यम
लिपि भौमिक की सफलता में उनकी व्यक्तिगत रचनात्मकता के साथ सरकारी ग्रामीण आजीविका कार्यक्रम की आर्थिक सहायता की भी भूमिका रही है। TRLM के माध्यम से उन्हें 5.10 लाख रुपये की वित्तीय मदद मिली, जिसने उनके उद्यम को स्थापित करने और आवश्यक संसाधन जुटाने में मदद की।
ग्रामीण इलाकों में छोटे व्यवसाय शुरू करने वाली महिलाओं के लिए शुरुआती पूंजी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होती है। ऐसे में वित्तीय सहायता मिलने से स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल कर कारोबार शुरू करने की संभावना बढ़ जाती है।
लिपि का उदाहरण इस बात को रेखांकित करता है कि यदि महिलाओं को वित्तीय संसाधन, संस्थागत मार्गदर्शन और अपने उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराया जाए तो वे परिवार की आय बढ़ाने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा दे सकती हैं।
TRLM अधिकारियों ने उद्यम का किया दौरा
त्रिपुरा रूरल लाइवलीहुड्स मिशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी तारिक कांति चकमा ने हाल ही में लिपि भौमिक के उद्यम का दौरा किया। उनके साथ खोवाई के DMC और अन्य अधिकारी भी मौजूद थे।
अधिकारियों ने लिपि के काम को देखा और उनके रचनात्मक प्रयास तथा उद्यमशीलता की सराहना की। अधिकारियों के अनुसार, स्थानीय संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करके टिकाऊ आजीविका तैयार करना ग्रामीण विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
लिपि के काम को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह केवल एक छोटे व्यवसाय की कहानी नहीं है। इसमें ग्रामीण महिला के आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने, स्थानीय संसाधन का उपयोग करने और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों को बढ़ावा देने जैसे कई पहलू जुड़े हुए हैं।
पर्यावरण के लिए भी महत्वपूर्ण पहल
गोबर आधारित उत्पादों का कारोबार पर्यावरणीय दृष्टि से भी संभावनाएं पैदा करता है। प्राकृतिक और स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री का उपयोग करके उत्पाद तैयार करने से कुछ मामलों में पारंपरिक या अधिक संसाधन-गहन सामग्रियों पर निर्भरता कम की जा सकती है।
हालांकि, किसी भी eco-friendly उत्पाद के वास्तविक पर्यावरणीय लाभ का आकलन उसके पूरे उत्पादन चक्र, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन और उपयोग के तरीके को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। फिर भी स्थानीय जैविक सामग्री को उपयोगी वस्तुओं में बदलने की दिशा में ऐसे प्रयोग टिकाऊ उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बीच संबंध मजबूत कर सकते हैं।
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लिपि का उद्यम इसी विचार को स्थानीय स्तर पर लागू करता दिखाई देता है। यहां एक ऐसी सामग्री को व्यावसायिक उत्पाद में बदलने का प्रयास किया जा रहा है, जिसे आमतौर पर कम आर्थिक मूल्य वाली वस्तु माना जाता है।
महिला उद्यमिता को मिल सकता है बढ़ावा
भारत के ग्रामीण इलाकों में महिला स्वयं सहायता समूहों और आजीविका मिशनों के जरिए महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। लखपति दीदी की अवधारणा भी महिलाओं को ऐसी आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने पर केंद्रित है, जिनसे उनकी सालाना आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सके।
लिपि भौमिक का उद्यम इसी व्यापक ग्रामीण महिला उद्यमिता के संदर्भ में देखा जा सकता है। उन्होंने अपने आसपास उपलब्ध संसाधन को कारोबार के अवसर में बदला और रचनात्मक उत्पाद तैयार करने का रास्ता चुना।
ऐसी पहलें दूसरी महिलाओं को भी यह सोचने के लिए प्रेरित कर सकती हैं कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान का इस्तेमाल करके नए उत्पाद तथा सेवाएं विकसित की जा सकती हैं। इसके लिए प्रशिक्षण, डिजाइन सुधार, पैकेजिंग, डिजिटल मार्केटिंग और बाजार तक पहुंच जैसे क्षेत्रों में अतिरिक्त सहयोग कारोबार को और मजबूत कर सकता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए नई संभावनाएं
ग्रामीण उद्यमिता का महत्व केवल किसी एक व्यक्ति की आय बढ़ाने तक सीमित नहीं है। यदि कोई छोटा उद्यम लगातार विस्तार करता है तो वह कच्चे माल की आपूर्ति, उत्पाद निर्माण, पैकेजिंग, परिवहन और बिक्री जैसे कई स्तरों पर आर्थिक गतिविधि पैदा कर सकता है।
गोबर जैसे स्थानीय संसाधन पर आधारित उद्यम का एक लाभ यह भी हो सकता है कि कच्चे माल को दूर से लाने की आवश्यकता अपेक्षाकृत कम हो। इससे स्थानीय संसाधनों का आर्थिक मूल्य बढ़ाने की संभावना बनती है।
हालांकि किसी भी ग्रामीण उद्यम की दीर्घकालिक सफलता के लिए केवल उत्पाद बनाना पर्याप्त नहीं है। बाजार की मांग, उत्पाद की गुणवत्ता, प्रतिस्पर्धी कीमत, नियमित बिक्री और ग्राहक तक पहुंच भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
बाजार और ब्रांडिंग से बढ़ सकता है कारोबार
लिपि भौमिक के उत्पादों को व्यापक बाजार तक पहुंचाने के लिए आधुनिक ब्रांडिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पर्यावरण-अनुकूल और स्थानीय रूप से तैयार वस्तुओं की मांग बढ़ने के साथ ऐसे उत्पादों को विशेष बाजार मिल सकता है।
त्योहारी सीजन, धार्मिक अवसरों, स्थानीय मेलों, हस्तशिल्प प्रदर्शनियों और ऑनलाइन मार्केटप्लेस के जरिए इन उत्पादों को नए ग्राहकों तक पहुंचाया जा सकता है। आकर्षक पैकेजिंग और उत्पाद की कहानी बताने वाली ब्रांडिंग भी ग्राहकों को जोड़ने में मदद कर सकती है।
यदि ग्रामीण उद्यमों को उत्पादन के साथ-साथ ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया मार्केटिंग और आधुनिक डिजाइन का प्रशिक्षण मिले, तो उनके स्थानीय कारोबार को क्षेत्रीय और राष्ट्रीय बाजार तक ले जाने की संभावना बढ़ सकती है।
‘Waste to Wealth’ मॉडल की मिसाल
लिपि भौमिक की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि उन्होंने किसी महंगे कच्चे माल के बजाय स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री को अपने उद्यम का आधार बनाया। सूखे गोबर से folders, दीये और मूर्तियां तैयार करने का उनका प्रयास यह दिखाता है कि नवाचार केवल अत्याधुनिक तकनीक तक सीमित नहीं है।
कई बार स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक ज्ञान और नए डिजाइन को मिलाकर भी ऐसे उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं जिनका बाजार मूल्य हो। यही विचार waste-to-wealth मॉडल की बुनियाद है।
त्रिपुरा की यह पहल ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता, पर्यावरणीय जागरूकता और उद्यमिता को एक साथ आगे बढ़ाने की संभावना दिखाती है। TRLM की वित्तीय सहायता और अधिकारियों के प्रोत्साहन से शुरू हुआ यह उद्यम आने वाले समय में यदि बेहतर बाजार और तकनीकी समर्थन हासिल करता है, तो यह स्थानीय स्तर पर एक बड़े सामाजिक-आर्थिक मॉडल का रूप ले सकता है।











