सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम के गायन को लेकर दायर याचिका को खारिज कर दिया है, और कहा कि गृह मंत्रालय के सर्कुलर में इसे अनिवार्य नहीं बनाया गया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि वंदे मातरम न गाने पर किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम के गायन को लेकर दायर याचिका को खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत का कहना है कि गृह मंत्रालय के सर्कुलर में वंदे मातरम को अनिवार्य नहीं बनाया गया है और गीत न गाने पर किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं है। इस फैसले पर मौलाना महमूद मदनी ने प्रतिक्रिया दी।
जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के रुख का स्वागत किया और कहा कि यह फैसला भारतीय नागरिकों के संवैधानिक अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के दृष्टिकोण से सकारात्मक है।
मौलाना मदनी का रुख
मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि जमीयत का स्पष्ट मत है कि वंदे मातरम हमारी मूल आस्था तौहीद के खिलाफ है। उन्होंने कहा, “किसी भी प्रशासनिक आदेश या सरकारी निर्देश के माध्यम से किसी नागरिक को वंदे मातरम गाने के लिए बाध्य करना संविधान के खिलाफ है। भारत का संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अगर कहीं भी किसी को इसके लिए मजबूर किया गया तो जमीयत चुप नहीं बैठेगी।
मौलाना मदनी ने यह भी कहा कि किसी भी छात्र या संस्था को धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करने के लिए मजबूर किया गया तो जमीयत अदालत जाएगी और अपने हक के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेगी।

संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
मौलाना मदनी के अनुसार, भारत का संविधान हर नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता देता है। इसे किसी भी प्रशासनिक आदेश, सरकारी दबाव या सामाजिक दबाव के माध्यम से छीना नहीं जा सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी व्यक्ति को उसके धर्म, आस्था या अंतरात्मा के खिलाफ कार्य करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
मौलाना मदनी ने यह भी स्पष्ट किया कि मुसलमान केवल अल्लाह की इबादत करते हैं। वंदे मातरम का अर्थ है ‘मां मैं तेरी पूजा करता हूं’, जो इस्लामी आस्था के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि किसी को भी इस्लाम की आस्था के खिलाफ कोई नारा या गीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। वर्ष 2011 और उससे पहले भी जमीयत उलमा-ए-हिंद ने वंदे मातरम पर काफी बहस की थी। मदनी ने कहा था कि यह गीत मुसलमानों के धार्मिक विश्वास के खिलाफ है और इसे उनकी आस्था के अनुसार अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वंदे मातरम गाने को लेकर कोई भी दंडात्मक प्रावधान मौजूद नहीं है। गृह मंत्रालय के सर्कुलर में इसे अनिवार्य करने का कोई प्रावधान नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी नागरिक को इस गीत को गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।









