जब भी हम किसी बीमारी के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं, तो वे कुछ दवाइयां प्रिस्क्राइब करते हैं। मेडिकल स्टोर से हमें विभिन्न रंगों की टैबलेट्स और कैप्सूल मिलते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि दवाइयां इतनी रंगीन क्यों होती हैं? क्या इनके रंगों का बीमारी से कोई संबंध होता है? या फिर यह सिर्फ एक मार्केटिंग रणनीति है? आइए जानते हैं इसके पीछे के वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक कारण।
दवाइयों का इतिहास: कब और कैसे शुरू हुआ रंगों का प्रयोग?
सबसे पहले दवा की गोलियों के इस्तेमाल का प्रमाण मिस्र सभ्यता में मिलता है। उस समय दवाओं को चिकनी मिट्टी या ब्रेड में मिलाकर बनाया जाता था। 20वीं सदी तक दवाइयां सफेद और गोल ही होती थीं। लेकिन 1960 के दशक में दवाइयों के रंगों में बदलाव शुरू हुआ।
इसके बाद 1975 में सॉफ्टजेल कैप्सूल के निर्माण में बड़े तकनीकी बदलाव हुए, जिससे रंगों के प्रयोग की प्रक्रिया और भी उन्नत हो गई। शुरुआत में लाल, पीले, हरे और चमकीले रंग की दवाइयां बनाई गईं, ताकि लोग इन्हें आसानी से पहचान सकें। आज, जेल कैप्सूल के लिए 75,000 से अधिक रंग संयोजनों का उपयोग किया जाता है।
क्यों बनाई जाती हैं रंग-बिरंगी दवाइयां?
1. पहचान में आसानी: रंगीन दवाइयां बुजुर्गों और अशिक्षित लोगों के लिए फायदेमंद होती हैं। वे दवाओं को नाम से नहीं, बल्कि उनके रंगों से पहचानते हैं। इससे सही समय पर सही दवा लेने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए, मेरी दादी अशिक्षित थीं, लेकिन वह अपनी दवाइयों को रंगों के आधार पर पहचानकर सही समय पर लेती थीं।
2. मनोवैज्ञानिक प्रभाव: रंगों का असर केवल पहचान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह मनोवैज्ञानिक रूप से भी असर डालता है। अमेरिका में किए गए एक शोध में पाया गया कि चमकीले रंगों की दवाइयों को लोग खुशी से लेते हैं, जबकि बिना रंग वाली दवाओं को लेने में संकोच करते हैं। नीले रंग की दवाइयां मन को शांत करने में मदद करती हैं, जबकि लाल रंग की दवाइयां शरीर को ऊर्जा देने के लिए प्रयोग की जाती हैं।
3. ब्रांडिंग और मार्केटिंग रणनीति: फार्मा कंपनियां अपनी दवाइयों को अलग दिखाने और ब्रांडिंग को मजबूत करने के लिए विभिन्न रंगों का उपयोग करती हैं। मेडिकल स्टोर पर कई ग्राहक बिना डॉक्टर के परामर्श के ही दवा खरीदते हैं। ऐसे में, फार्मा कंपनियां खास रंगों की दवाइयां बनाकर अपनी बिक्री बढ़ाने का प्रयास करती हैं।
4. तापमान और मौसम के अनुसार रंग निर्धारण: कुछ शोधों के अनुसार, दवाइयों के रंग तापमान के अनुसार भी तय किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, नीले रंग की दवाइयां ठंडे तापमान का संकेत देती हैं, जबकि नारंगी या लाल रंग की दवाइयां गर्मी का प्रतीक होती हैं। यह रंग मनोवैज्ञानिक रूप से मरीजों को दवा की प्रकृति को समझने में मदद करते हैं।
क्या दवा के रंगों का बीमारी से कोई संबंध है?
अमेरिका में की गई एक रिसर्च में यह पाया गया कि मरीजों की प्रतिक्रिया उनके द्वारा ली जा रही दवा के रंग पर भी निर्भर करती है। उदाहरण के लिए:
• हल्के नीले रंग की दवाइयां और बेहतर नींद
• अगर किसी बीमारी में जल्दी आराम चाहिए, तो लाल रंग की दवाइयां अधिक प्रभावी मानी जाती हैं।
• कुछ दवाइयों के स्वाद और गंध को ध्यान में रखते हुए भी रंग तय किए जाते हैं।
रंग-बिरंगी दवाइयां क्यों जरूरी हैं?
रंग-बिरंगी दवाइयां केवल दिखने में सुंदर नहीं होतीं, बल्कि उनकी पहचान, प्रभाव और मार्केटिंग के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। ये बुजुर्गों और अशिक्षित लोगों के लिए मददगार होती हैं, मरीजों पर मनोवैज्ञानिक रूप से सकारात्मक प्रभाव डालती हैं और फार्मा कंपनियों के लिए भी फायदेमंद होती हैं।
तो अगली बार जब आप कोई रंगीन दवा लें, तो जान लें कि इसका रंग सिर्फ दिखावे के लिए नहीं, बल्कि एक गहरी वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक सोच का परिणाम है।