इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 10 साल पुराना आपराधिक केस रद्द किया, समझौते को दी मान्यता

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सिविल विवाद में समझौते के बाद 10 साल पुराना आपराधिक केस रद्द किया। कोर्ट ने ट्रायल जारी रखना समय और संसाधनों की बर्बादी बताया।

प्रयागराज में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सिविल प्रकृति के विवाद में पक्षों के बीच समझौता होने के बाद 10 साल पुराने आपराधिक मुकदमे को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में ट्रायल जारी रखना न्यायिक संसाधनों की अनावश्यक बर्बादी है।

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि यदि सिविल प्रकृति के विवाद में पक्षकारों के बीच वास्तविक समझौता हो चुका है, तो आपराधिक मुकदमे को जारी रखना उचित नहीं है। कोर्ट ने बीएनएसएस की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए मुरादाबाद के एक दशक पुराने मामले की कार्यवाही समाप्त कर दी।

सिविल विवाद में समझौते के बाद हाई कोर्ट ने खत्म की आपराधिक कार्यवाही

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी सिविल प्रकृति के विवाद में संबंधित पक्षों के बीच आपसी समझौता हो चुका है, तो ऐसे मामले में आपराधिक मुकदमा जारी रखना न्यायालय के समय और संसाधनों की अनावश्यक बर्बादी माना जा सकता है। इसी टिप्पणी के साथ कोर्ट ने मुरादाबाद में दर्ज करीब 10 साल पुराने आपराधिक मामले की कार्यवाही को रद्द कर दिया।

न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की एकलपीठ ने बीएनएसएस (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 528 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने माना कि मामले के दोनों पक्षों के बीच वास्तविक और स्वैच्छिक समझौता हो चुका है, इसलिए मुकदमे को आगे बढ़ाने का कोई विशेष औचित्य नहीं रह जाता।

ट्रायल कोर्ट ने समझौते के बावजूद नहीं किया था केस बंद

यह मामला मुरादाबाद जिले के कांठ थाना क्षेत्र में दर्ज किया गया था। आरोपितों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420, 467, 468, 471, 472, 504, 506 और 120-बी के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। इनमें कई धाराएं गैर-सुलहनामा श्रेणी में आती हैं।

मामले में पक्षकारों के बीच समझौता होने के बाद आरोपितों ने ट्रायल कोर्ट से मुकदमा समाप्त करने की मांग की थी। हालांकि अतिरिक्त सिविल जज (जूनियर डिवीजन)/न्यायिक मजिस्ट्रेट ने यह कहते हुए अनुरोध खारिज कर दिया कि जिन धाराओं में आरोप लगाए गए हैं, वे कानून के अनुसार समझौता योग्य नहीं हैं। इसलिए केवल समझौते के आधार पर मुकदमे को समाप्त नहीं किया जा सकता।

इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देकर रखी गई दलील

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से कई महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख किया गया। इनमें रामगोपाल बनाम कर्नाटक, परबतभाई आहिर बनाम गुजरात, निखिल मर्चेंट बनाम सीबीआई और ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य जैसे मामले शामिल थे।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि भले ही मजिस्ट्रेट की शक्तियां सीआरपीसी की धारा 320 तक सीमित हों, लेकिन हाई कोर्ट के पास बीएनएसएस की धारा 528 के तहत व्यापक और अंतर्निहित अधिकार हैं। इन अधिकारों का उपयोग करते हुए अदालत न्याय के हित में ऐसे मामलों की कार्यवाही समाप्त कर सकती है, जहां विवाद का मूल स्वरूप निजी या सिविल प्रकृति का हो और पक्षकार आपसी सहमति से मामला सुलझा चुके हों।

सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से भी अदालत को बताया गया कि समझौता पूरी तरह से हो चुका है और वे मुकदमे को आगे नहीं बढ़ाना चाहते।

न्यायालय ने बताई समझौते की कानूनी अहमियत

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला उस समय लागू कानून के अनुरूप था, इसलिए उसे गलत नहीं कहा जा सकता। हालांकि उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके पास न्याय सुनिश्चित करने के लिए व्यापक अधिकार मौजूद हैं।

अदालत ने कहा कि जब किसी मामले का मूल विवाद सिविल प्रकृति का हो, पक्षकारों के बीच वास्तविक समझौता हो चुका हो और शिकायतकर्ता भी कार्यवाही समाप्त करने के पक्ष में हो, तब आपराधिक मुकदमे को जारी रखना न्यायिक समय और शक्ति की बर्बादी होगी।

इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मुरादाबाद के इस 10 साल पुराने आपराधिक मामले की पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया। यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां निजी या सिविल विवाद बाद में आपसी सहमति से सुलझ जाते हैं, लेकिन आपराधिक कार्यवाही लंबे समय तक जारी रहती है।

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