अमेरिका के 25 डेमोक्रेटिक राज्यों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नए टैरिफ को कोर्ट में चुनौती देते हुए इसे अवैध बताया है। राज्यों का कहना है कि इससे महंगाई बढ़ेगी और राष्ट्रपति ने ट्रेड एक्ट 1974 का गलत उपयोग किया है।
वाशिंगटन: अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नई व्यापार नीति एक बड़े कानूनी विवाद का कारण बन गई है। देश के 25 डेमोक्रेटिक पार्टी शासित राज्यों ने ट्रम्प प्रशासन द्वारा लगाए गए नए आयात शुल्क (टैरिफ) को अदालत में चुनौती देते हुए इसे अवैध और असंवैधानिक बताया है। राज्यों का कहना है कि इन टैरिफ का असर केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे अमेरिकी उपभोक्ताओं, उद्योगों और महंगाई पर भी व्यापक प्रभाव पड़ेगा। इन राज्यों ने अमेरिकी कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में याचिका दायर कर टैरिफ आदेश को निरस्त करने की मांग की है। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका की व्यापार नीति, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
60 अर्थव्यवस्थाओं पर लगाए गए नए टैरिफ
ट्रम्प प्रशासन ने हाल ही में 60 अर्थव्यवस्थाओं से आयात होने वाले उत्पादों पर नए टैरिफ लागू किए हैं। प्रशासन का कहना है कि यह कदम उन देशों के खिलाफ उठाया गया है जहां जबरन मजदूरी (Forced Labour) से जुड़े मामलों को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जिन देशों पर टैरिफ लगाया गया है, वे अमेरिका के कुल आयात का लगभग 99.4 प्रतिशत हिस्सा हैं। नए शुल्क की दर 10 प्रतिशत से 12.5 प्रतिशत के बीच निर्धारित की गई है। भारत सहित 17 देशों पर 10 प्रतिशत का टैरिफ लगाया गया है, जबकि कुछ अन्य देशों पर इससे अधिक दर लागू की गई है।
राज्यों ने कोर्ट में क्या दलील दी
याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रपति प्रशासन ने ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 का गलत और अत्यधिक व्यापक उपयोग किया है। राज्यों का तर्क है कि यह कानून विशेष परिस्थितियों में व्यापारिक असंतुलन या अनुचित व्यापारिक गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति देता है, लेकिन इसका उपयोग व्यापक और मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि राष्ट्रपति के पास कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी के बिना इतने बड़े पैमाने पर नए आयात शुल्क लागू करने का अधिकार नहीं है। उनका दावा है कि यह फैसला अमेरिकी संविधान में निर्धारित शक्तियों के संतुलन के विपरीत है।
अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स का बयान
न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स ने कहा कि अमेरिकी संविधान के तहत व्यापार और कराधान से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों में कांग्रेस की भूमिका सर्वोपरि है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति किसी भी देश पर अपनी इच्छा के अनुसार टैरिफ नहीं लगा सकते। उनका आरोप है कि ट्रम्प प्रशासन ने कानून की सीमाओं से आगे बढ़कर अपनी कार्यकारी शक्तियों का उपयोग किया है। लेटिशिया जेम्स ने यह भी कहा कि यदि अदालत ने इस फैसले पर रोक नहीं लगाई तो इसका आर्थिक असर पूरे अमेरिका में महसूस किया जाएगा।
राज्यों की प्रमुख चिंताएं
याचिका में राज्यों ने कई आर्थिक और कानूनी चिंताएं उठाई हैं। उनका कहना है कि नए टैरिफ लागू होने से आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। राज्यों के अनुसार, बढ़ती आयात लागत के कारण कंपनियां अतिरिक्त खर्च उपभोक्ताओं पर डाल सकती हैं, जिससे महंगाई में और वृद्धि हो सकती है। इसके अलावा, छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए कच्चा माल महंगा होने की आशंका भी जताई गई है। याचिका में यह भी कहा गया है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने से कई उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
ट्रम्प प्रशासन का पक्ष
ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि नए टैरिफ का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार को अधिक निष्पक्ष बनाना और जबरन मजदूरी से जुड़े उत्पादों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करना है। प्रशासन का तर्क है कि अमेरिका ऐसे उत्पादों के आयात को हतोत्साहित करना चाहता है जिनका संबंध मानवाधिकार उल्लंघन या फोर्स्ड लेबर से हो सकता है। इसके अलावा, प्रशासन का मानना है कि यह कदम अमेरिकी उद्योगों को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ देने में भी मदद करेगा। हालांकि, अदालत में दायर याचिका के बाद इस नीति की कानूनी वैधता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
भारत सहित कई देशों पर असर
नए टैरिफ का असर भारत सहित कई प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों पर पड़ सकता है। भारत पर 10 प्रतिशत का अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने से कुछ निर्यात क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि टैरिफ लंबे समय तक लागू रहते हैं तो वैश्विक व्यापार प्रवाह, निवेश निर्णयों और निर्यात रणनीतियों पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि, विभिन्न देशों की सरकारें स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और आगे की रणनीति पर विचार कर रही हैं।
अदालत में क्या होगा आगे
अब अमेरिकी कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड इस मामले की सुनवाई करेगा। अदालत यह तय करेगी कि क्या राष्ट्रपति ने ट्रेड एक्ट 1974 के तहत अपने अधिकारों का सही उपयोग किया या फिर संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन किया। यदि अदालत राज्यों के पक्ष में फैसला देती है तो ट्रम्प प्रशासन को अपने टैरिफ आदेश में संशोधन करना पड़ सकता है या उसे पूरी तरह वापस लेना पड़ सकता है। वहीं यदि अदालत प्रशासन के पक्ष में निर्णय देती है तो यह भविष्य में राष्ट्रपति की व्यापारिक शक्तियों को और मजबूत करने वाला फैसला माना जा सकता है।
वैश्विक व्यापार पर संभावित प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका जैसे बड़े आयातक देश द्वारा व्यापक स्तर पर टैरिफ लगाने का असर केवल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं रहता। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला, विनिर्माण क्षेत्र और वैश्विक आर्थिक वृद्धि पर भी प्रभाव पड़ सकता है। यदि कानूनी विवाद लंबा चलता है तो कई देशों के निर्यातकों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को नीति संबंधी अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है।










