कोटा के अपना घर आश्रम ने आठ साल पहले लावारिस मिली महिला को उसके परिवार से मिलाया। इलाज और देखभाल के बाद महिला की पहचान हुई। भाई से मिलते ही दोनों भावुक हो गए और यह दृश्य देखकर मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं।
कोटा: राजस्थान के कोटा शहर में एक भावुक और प्रेरणादायक घटना सामने आई है, जहां सामाजिक सेवा संस्था "अपना घर आश्रम" ने आठ वर्षों से अपने परिवार से बिछड़ी एक मानसिक रूप से असहाय महिला को उसके परिजनों से मिलाने में सफलता हासिल की। यह पुनर्मिलन केवल एक परिवार के लिए खुशी का क्षण नहीं था, बल्कि समाज सेवा, धैर्य और मानवीय संवेदनाओं का एक ऐसा उदाहरण बन गया जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर दीं।
करीब आठ साल पहले लावारिस हालत में मिली महिला आज अपने भाई के साथ घर लौट सकी। वर्षों की तलाश, इलाज और पहचान की प्रक्रिया के बाद यह संभव हो पाया। भाई-बहन के मिलन का दृश्य इतना भावुक था कि आश्रम के कर्मचारी, स्वयंसेवक और अन्य लोग भी अपनी भावनाओं को रोक नहीं सके।
2018 में मेडिकल कॉलेज के पास मिली थी महिला
जानकारी के अनुसार वर्ष 2018 में कोटा मेडिकल कॉलेज के आसपास एक महिला असहाय और भटकती हुई अवस्था में मिली थी। वह न तो अपने बारे में स्पष्ट जानकारी दे पा रही थी और न ही अपने घर-परिवार की पहचान बता सकती थी। मानसिक स्थिति कमजोर होने के कारण उसके लिए सामान्य बातचीत करना भी मुश्किल था।
स्थानीय समाजसेवी की सूचना पर अपना घर आश्रम की टीम मौके पर पहुंची और महिला को सुरक्षित आश्रय प्रदान किया। उस समय महिला पूरी तरह असुरक्षित अवस्था में थी और उसके पास कोई दस्तावेज या पहचान संबंधी जानकारी भी नहीं थी। ऐसी परिस्थितियों में अक्सर लोगों की पहचान स्थापित करना बेहद कठिन हो जाता है, लेकिन आश्रम ने महिला को केवल आश्रय ही नहीं दिया, बल्कि उसके पुनर्वास की लंबी प्रक्रिया भी शुरू की।
इलाज और देखभाल से धीरे-धीरे सुधरी हालत
आश्रम में रहने के दौरान महिला की नियमित चिकित्सा करवाई गई। विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में उसका उपचार शुरू हुआ और उसे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता भी प्रदान की गई। आश्रम के सेवा सहयोगियों ने उसकी देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ी। नियमित काउंसलिंग, दवाइयों और मानवीय सहयोग के कारण उसकी मानसिक स्थिति में धीरे-धीरे सुधार होने लगा।
कई वर्षों तक चले उपचार के बाद महिला ने अपने अतीत से जुड़ी कुछ बातें याद करनी शुरू कीं। उसने अपने गांव, आसपास के क्षेत्र और परिवार से संबंधित कुछ संकेत देने शुरू किए। यही जानकारी आगे चलकर उसके परिवार तक पहुंचने का आधार बनी।
छोटी-छोटी जानकारियों से शुरू हुई पहचान की खोज
जब महिला ने अपने गांव और परिवार के बारे में कुछ महत्वपूर्ण संकेत दिए, तब आश्रम की टीम ने उन सूचनाओं के आधार पर पहचान की प्रक्रिया शुरू की। यह आसान काम नहीं था। कई बार मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति द्वारा दी गई जानकारी अधूरी या अस्पष्ट होती है। इसके बावजूद आश्रम के कार्यकर्ताओं ने हार नहीं मानी।
टीम ने विभिन्न पुलिस थानों और प्रशासनिक अधिकारियों से संपर्क किया। विशेष रूप से गंगापुर सिटी क्षेत्र में महिला द्वारा बताए गए स्थानों और नामों के आधार पर खोज अभियान चलाया गया। पुलिस और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सहयोग से धीरे-धीरे महिला की पहचान स्थापित होने लगी। जांच में पता चला कि महिला का नाम रुमाली है और वह गंगापुर सिटी क्षेत्र के निकट स्थित खानपुर बड़ौदा की जाटव बस्ती की निवासी है।
भाई तक पहुंची सूचना, वर्षों की तलाश हुई पूरी
पहचान की पुष्टि होने के बाद आश्रम ने महिला के परिजनों से संपर्क किया। सूचना मिलते ही उसके भाई रामलाल जाटव को आश्रम आने के लिए कहा गया। रामलाल के लिए यह खबर किसी चमत्कार से कम नहीं थी। उन्होंने बताया कि बहन के लापता होने के बाद परिवार ने लंबे समय तक उसकी तलाश की थी। विभिन्न स्थानों पर खोजबीन की गई और पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज करवाई गई थी।
हालांकि समय बीतने के साथ परिवार की उम्मीदें कमजोर पड़ने लगी थीं। वर्षों तक कोई सुराग नहीं मिलने के कारण उन्हें नहीं पता था कि उनकी बहन जीवित भी है या नहीं। जब उन्हें आश्रम से सूचना मिली तो परिवार में खुशी और भावनाओं का माहौल बन गया।
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आठ साल बाद भाई-बहन का भावुक मिलन
जब रामलाल आश्रम पहुंचे और अपनी बहन से मिले, तो दोनों ने एक-दूसरे को तुरंत पहचान लिया। वर्षों की दूरी और बिछड़ने का दर्द उस पल में जैसे समाप्त हो गया।
भाई और बहन एक-दूसरे को देखकर भावुक हो गए। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। वहां मौजूद लोगों ने इस दृश्य को बेहद मार्मिक बताया। आश्रम के कर्मचारियों के अनुसार, यह उन पलों में से एक था जो उनके सामाजिक कार्य को नई ऊर्जा और प्रेरणा देते हैं। वर्षों तक किसी व्यक्ति की सेवा करने और फिर उसे उसके परिवार से मिलाने का सुख शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
परिवार ने जताया आभार
रामलाल ने अपनी बहन को सुरक्षित और स्वस्थ देखकर राहत व्यक्त की। उन्होंने कहा कि परिवार ने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी थी, लेकिन इतने वर्षों बाद बहन का मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं है। उन्होंने अपना घर आश्रम और वहां कार्यरत सभी लोगों का धन्यवाद किया। उनका कहना था कि यदि आश्रम की टीम समर्पण और धैर्य के साथ काम नहीं करती तो शायद उनकी बहन कभी परिवार तक वापस नहीं पहुंच पाती।
समाज सेवा का प्रेरणादायक उदाहरण
यह घटना केवल एक परिवार के पुनर्मिलन की कहानी नहीं है, बल्कि उन संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के योगदान को भी सामने लाती है जो समाज के सबसे कमजोर और असहाय लोगों की मदद के लिए निरंतर काम करते हैं। मानसिक रूप से अस्वस्थ, लावारिस या बेसहारा लोगों की पहचान स्थापित करना और उन्हें परिवार से मिलाना एक लंबी और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया होती है। इसके लिए संवेदनशीलता, धैर्य और संसाधनों की आवश्यकता होती है। अपना घर आश्रम जैसे संस्थान देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे लोगों को आश्रय, चिकित्सा और सम्मानजनक जीवन प्रदान करने का काम कर रहे हैं।
लोगों से की गई महत्वपूर्ण अपील
आश्रम प्रबंधन ने इस अवसर पर नागरिकों से अपील की कि यदि उन्हें कोई लावारिस, मानसिक रूप से अस्वस्थ या असहाय व्यक्ति दिखाई दे तो उसकी सूचना संबंधित संस्थाओं या प्रशासन को दें।
समय पर मिली सूचना किसी व्यक्ति को नया जीवन दे सकती है और कई परिवारों को फिर से जोड़ सकती है। समाज की सक्रिय भागीदारी ऐसे प्रयासों को और अधिक प्रभावी बना सकती है।










