आगरा में रिटायर्ड लेखाकार से 72.74 लाख रुपये की ठगी, ATS अफसर बनकर 34 दिन तक डिजिटल अरेस्ट का डर

आगरा में रिटायर्ड लेखाकार को ATS अधिकारी बनकर आतंकियों से संबंध होने का डर दिखाया गया। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 72.74 लाख रुपये ठगने का आरोप है।
आगरा में रिटायर्ड लेखाकार से 72.74 लाख रुपये की ठगी, ATS अफसर बनकर 34 दिन तक डिजिटल अरेस्ट का डर
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आगरा: उत्तर प्रदेश के आगरा में साइबर ठगी का एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां साइबर अपराधियों ने कथित तौर पर एटीएस अधिकारी बनकर एक सेवानिवृत्त लेखाकार को आतंकवादियों से संबंध होने का डर दिखाया और उनसे 72.74 लाख रुपये से अधिक की रकम ठग ली। आरोपियों ने पीड़ित को बताया कि उनके आधार कार्ड का इस्तेमाल आतंकियों से जुड़े बैंक खाते के लिए किया गया है। इसके बाद गिरफ्तारी, परिवार को जांच के दायरे में लाने और संपत्ति जब्त करने जैसी धमकियां देकर उन्हें मानसिक दबाव में रखा गया। ठगी का शिकार हुए बुजुर्ग आगरा के सिकंदरा क्षेत्र के निवासी बताए गए हैं। शिकायत के बाद साइबर क्राइम थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

मामले में सामने आई जानकारी के अनुसार, आरोपियों ने पीड़ित को भरोसा दिलाने और डराने के लिए जांच एजेंसियों के नाम का इस्तेमाल किया। फोन करने वाले ने खुद को पुलिस और एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड यानी एटीएस से जुड़ा अधिकारी बताया। इसके बाद पीड़ित को कथित तौर पर कहा गया कि उनके आधार कार्ड पर बैंक खाता खोला गया है और उसमें आतंकवादियों से जुड़ी करोड़ों रुपये की रकम जमा हुई है। ठगों ने इस कहानी के जरिए बुजुर्ग को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि वह किसी गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा मामले में फंस चुके हैं। गिरफ्तारी का डर दिखाकर उन्हें अपनी बैंकिंग जानकारी देने और रकम अलग-अलग खातों में भेजने के लिए मजबूर किया गया।

साइबर अपराधियों ने कथित तौर पर पीड़ित को यह भी बताया कि उनके नाम से जुड़े खाते का इस्तेमाल संदिग्ध वित्तीय लेन-देन में हुआ है। आरोपियों ने मामले को आतंकवाद और जांच एजेंसियों की कार्रवाई से जोड़कर पेश किया, जिससे बुजुर्ग घबरा गए। इस तरह की ठगी में अपराधी अक्सर पुलिस, सीबीआई, एटीएस या अन्य सरकारी एजेंसियों का नाम लेकर लोगों को विश्वास दिलाते हैं कि उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी होने वाला है या उनकी संपत्ति जब्त की जा सकती है। पीड़ित को लगातार फोन और वीडियो कॉल के जरिए संपर्क में रखने से उसके लिए वास्तविक स्थिति की स्वतंत्र रूप से जांच करना मुश्किल हो सकता है।

इस मामले में ठगी की रकम जुटाने के लिए पीड़ित की जमा पूंजी को निशाना बनाया गया। शिकायत के मुताबिक, आरोपियों ने बैंक में जमा रकम और फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी जैसी बचत के बारे में जानकारी हासिल की। इसके बाद रकम को अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कराने का आरोप है। बुजुर्ग की वर्षों की मेहनत से जमा की गई राशि इस तरह साइबर अपराधियों के कब्जे में चली गई। सेवानिवृत्ति के बाद जमा पूंजी अक्सर बुजुर्गों के नियमित खर्च, स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों और भविष्य की सुरक्षा का प्रमुख आधार होती है। ऐसे में इतनी बड़ी रकम का नुकसान परिवार के लिए आर्थिक और मानसिक परेशानी पैदा कर सकता है।

डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली ठगी में अपराधी पीड़ित को यह महसूस कराते हैं कि वह फोन या वीडियो कॉल के जरिए किसी जांच एजेंसी की निगरानी में है। उन्हें कहा जाता है कि किसी से बात न करें, घरवालों को जानकारी न दें और जांच पूरी होने तक हर निर्देश का पालन करें। कई मामलों में फर्जी पहचान पत्र, कथित सरकारी दस्तावेज और वीडियो कॉल का इस्तेमाल कर डर को और बढ़ाया जाता है। वास्तव में, फोन या वीडियो कॉल पर कोई व्यक्ति किसी को कानूनी रूप से गिरफ्तार या डिजिटल अरेस्ट नहीं कर सकता। अपराधियों का मकसद पीड़ित को अलग-थलग रखकर उसकी सोचने-समझने और दूसरों से सलाह लेने की क्षमता को प्रभावित करना होता है।

आगरा के इस मामले में भी आतंकवादियों से संबंध होने का आरोप ठगी की कहानी का मुख्य हिस्सा बताया गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद जैसे संवेदनशील विषयों का नाम सुनकर कोई भी व्यक्ति घबरा सकता है, खासकर जब फोन करने वाला खुद को सरकारी अधिकारी बताकर कानूनी कार्रवाई की धमकी दे। साइबर अपराधी इसी भय का फायदा उठाते हैं। वे पीड़ित को विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि रकम ट्रांसफर करने या अपनी वित्तीय जानकारी देने से जांच में सहयोग होगा और गिरफ्तारी से बचा जा सकेगा। लेकिन सरकारी जांच एजेंसियां फोन पर धमकी देकर किसी व्यक्ति से निजी खातों में रकम जमा कराने की मांग नहीं करतीं। इस तरह की मांग धोखाधड़ी का गंभीर संकेत है।

पीड़ित को कथित तौर पर कई सप्ताह तक डर और दबाव में रखा गया। इस दौरान वह आरोपियों के बताए निर्देशों के अनुसार काम करता रहा और परिवार से खुलकर बात करने में भी परेशानी महसूस कर सकता था। डिजिटल अरेस्ट के ऐसे मामलों में ठग पीड़ित को यह कहकर चुप रहने के लिए दबाव डालते हैं कि जांच गोपनीय है और जानकारी बाहर जाने पर परिवार भी मुसीबत में पड़ सकता है। इस कारण कई लोग समय रहते अपने बच्चों, रिश्तेदारों या परिचितों से सलाह नहीं ले पाते। जब तक उन्हें ठगी का अहसास होता है, तब तक बैंक खातों से बड़ी रकम निकल चुकी होती है।

मामले का खुलासा होने के बाद पीड़ित ने पुलिस से संपर्क किया। साइबर क्राइम थाना पुलिस ने शिकायत के आधार पर प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस के सामने अब यह पता लगाने की चुनौती है कि रकम किन खातों में भेजी गई, उन खातों को कौन संचालित कर रहा था और फोन करने वाले कथित आरोपियों की पहचान क्या है। साइबर ठगी के मामलों में लेन-देन की जानकारी, कॉल रिकॉर्ड, मोबाइल नंबर, बैंक खातों और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच महत्वपूर्ण होती है। संबंधित खातों की पहचान और रकम के प्रवाह का पता लगाने से जांच को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, रकम की बरामदगी या आरोपियों की गिरफ्तारी को लेकर अंतिम स्थिति जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।

इस घटना ने एक बार फिर वरिष्ठ नागरिकों और सेवानिवृत्त कर्मचारियों की वित्तीय सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है। सेवानिवृत्त लोगों के पास जीवनभर की बचत, पेंशन और एफडी के रूप में जमा धन हो सकता है। साइबर अपराधी अक्सर ऐसे लोगों को निशाना बनाते हैं और उन्हें किसी आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी देते हैं। ठगों को यह भी पता होता है कि कानूनी कार्रवाई और पुलिस का नाम सुनकर कई लोग डर सकते हैं। ऐसे में परिवार के सदस्यों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। बुजुर्गों को यह भरोसा दिलाना जरूरी है कि किसी भी संदिग्ध कॉल की जानकारी परिवार को देना सुरक्षित है और इससे कोई कानूनी अपराध नहीं हो जाता।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ लगातार सलाह देते हैं कि अनजान कॉल पर खुद को पुलिस, एटीएस, सीबीआई या अन्य जांच एजेंसी का अधिकारी बताने वाले व्यक्ति की बात पर तुरंत भरोसा न करें। यदि कोई व्यक्ति आतंकवाद, मनी लॉन्ड्रिंग, अवैध बैंक खाते या गिरफ्तारी का डर दिखाए, तो घबराकर पैसे ट्रांसफर न करें। बैंक खाते, एफडी, ओटीपी, पासवर्ड और पहचान संबंधी जानकारी किसी अनजान व्यक्ति को न दें। वीडियो कॉल पर किसी व्यक्ति की वर्दी, पहचान पत्र या सरकारी लोगो देखकर भी उसकी पहचान को प्रमाणित नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि इनका दुरुपयोग किया जा सकता है।

यदि किसी व्यक्ति को ऐसी कॉल आती है, तो उसे कॉल काटकर संबंधित एजेंसी के आधिकारिक संपर्क माध्यम से जानकारी की पुष्टि करनी चाहिए। परिवार के किसी भरोसेमंद सदस्य को तुरंत बताना और स्थानीय पुलिस से सलाह लेना भी जरूरी है। यदि पैसे की ठगी हो चुकी है, तो जितनी जल्दी हो सके राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर संपर्क करें और आधिकारिक पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं। बैंक को भी तुरंत सूचित करना चाहिए, ताकि संबंधित लेन-देन और खातों के संबंध में समय रहते जरूरी कदम उठाए जा सकें। शिकायत के दौरान बैंक ट्रांजैक्शन की रसीद, कॉल रिकॉर्ड, फोन नंबर और संदेश जैसे सबूत सुरक्षित रखना उपयोगी हो सकता है।

आगरा में रिटायर्ड लेखाकार से 72.74 लाख रुपये की कथित ठगी इस बात की चेतावनी है कि साइबर अपराधी अब केवल लालच नहीं, बल्कि डर और मानसिक दबाव का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। आतंकियों से संबंध होने और गिरफ्तारी की धमकी देकर किसी व्यक्ति को अपनी बचत ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करना डिजिटल ठगी का गंभीर तरीका है। पुलिस मामले की जांच कर रही है और अब यह स्पष्ट होना बाकी है कि इस नेटवर्क के पीछे कौन लोग हैं तथा ठगी की रकम में से कितनी राशि वापस हासिल की जा सकती है। लोगों के लिए सबसे जरूरी संदेश यही है कि फोन पर होने वाली किसी कथित जांच के नाम पर पैसे ट्रांसफर न करें और ऐसी स्थिति में तुरंत परिवार, बैंक तथा पुलिस की मदद लें।

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