AI in Judiciary: तकनीक का लाभ उठाएं, लेकिन संवैधानिक मूल्यों से समझौता न हो: CJI सूर्यकांत

AI in Judiciary पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि तकनीक से न्याय व्यवस्था को अधिक सुलभ और तेज बनाया जा सकता है, लेकिन गरिमा, समानता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता जैसे

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने गुरुवार को न्याय व्यवस्था में डिजिटल तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को अपनाने की जरूरत पर जोर दिया। 

CJI Surya Kant on AI: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने न्याय व्यवस्था में डिजिटल तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल का समर्थन करते हुए कहा है कि तकनीकी बदलावों का उद्देश्य न्याय तक लोगों की पहुंच को बेहतर बनाना होना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि तकनीकी प्रगति के बीच संविधान में निहित गरिमा, समानता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता जैसे मूल्यों को बनाए रखना जरूरी है।

सीजेआई सूर्यकांत ने यह बात उज्बेकिस्तान के समरकंद में आयोजित एशियन कॉन्स्टिट्यूशनल कोर्ट्स एंड इक्विवेलेंट इंस्टीट्यूशंस (AACC) के सातवें कांग्रेस के उद्घाटन सत्र में कही। इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का मुख्य विषय डिजिटलाइजेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में संवैधानिक न्याय है। AACC कांग्रेस 1 से 3 अक्टूबर 2026 तक समरकंद में आयोजित की जा रही है।

अदालतें तकनीकी बदलाव से अलग नहीं रह सकतीं

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि तकनीक ने समाज के काम करने के तरीके में व्यापक बदलाव किया है। सरकारों की सेवाएं देने की प्रक्रिया से लेकर कारोबार और नागरिकों के सार्वजनिक संस्थानों के साथ संवाद तक, हर क्षेत्र में डिजिटल बदलाव दिखाई दे रहा है। ऐसे में न्यायपालिका भी इस परिवर्तन से अलग नहीं रह सकती।

उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल अदालतों को अधिक सुलभ बनाने, न्यायिक प्रक्रियाओं को आसान करने और मामलों में होने वाली देरी को कम करने के लिए किया जा सकता है। AI न्यायाधीशों और अदालत के कर्मचारियों को कानूनी शोध करने तथा बड़ी मात्रा में उपलब्ध जानकारी को व्यवस्थित करने में भी सहायता दे सकता है।

AI के इस्तेमाल में 'ह्यूमन प्राइमसी' जरूरी

सीजेआई ने तकनीक के इस्तेमाल के साथ मानवीय भूमिका को बनाए रखने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि AI न्यायिक प्रक्रिया में सहयोगी की भूमिका निभा सकता है, लेकिन न्यायाधीशों की कानूनी समझ और निर्णय लेने की जिम्मेदारी को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता। उन्होंने बताया कि भारतीय न्यायपालिका में AI के इस्तेमाल से संबंधित प्रस्तावित नियमों में मानवीय प्राथमिकता (Human Primacy) के सिद्धांत को महत्व दिया गया है। इसके तहत AI का इस्तेमाल शोध और न्यायिक प्रक्रियाओं में सहायता के लिए किया जा सकता है, लेकिन अंतिम न्यायिक निर्णय न्यायाधीशों के पास ही रहना चाहिए।

संवैधानिक मूल्यों की सुरक्षा सबसे जरूरी

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अदालतों का काम केवल विवादों का निपटारा करना नहीं है। संवैधानिक अदालतें गरिमा, समानता, स्वतंत्रता और निष्पक्षता जैसे मूल अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों को व्यवहार में अर्थ देने का काम भी करती हैं। उनके मुताबिक, अदालतों के सामने चुनौती यह नहीं है कि वे परंपरा और तकनीक में से किसी एक को चुनें। इसके बजाय जरूरी है कि आधुनिक तकनीक की उपयोगिता को न्यायिक संस्थानों में शामिल किया जाए और साथ ही संविधान को मार्गदर्शक आधार बनाए रखा जाए।

उन्होंने तकनीकी बदलाव के संभावित जोखिमों की ओर भी ध्यान दिलाया। डिजिटल न्याय व्यवस्था में डिजिटल डिवाइड, डेटा सुरक्षा और एल्गोरिदम की जवाबदेही जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। यदि तकनीकी सुविधाओं तक सभी नागरिकों की समान पहुंच नहीं होगी, तो डिजिटलाइजेशन का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

भारत की डिजिटल न्याय व्यवस्था का किया उल्लेख

सीजेआई ने भारत में न्यायिक डिजिटलाइजेशन के अनुभव को भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर साझा किया। उन्होंने बताया कि ई-फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई, डिजिटल केस मैनेजमेंट और लाइव स्ट्रीमिंग जैसी सुविधाओं ने अदालतों तक पहुंच को आसान बनाने में मदद की है। उन्होंने eCourts Mission Mode Project का उल्लेख करते हुए कहा कि डिजिटल बुनियादी ढांचे ने न्यायिक प्रक्रियाओं को नागरिकों के अधिक करीब लाने में भूमिका निभाई है। 

उन्होंने AI आधारित SUVAS का भी जिक्र किया, जिसके जरिए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया जा रहा है। इसके अलावा Su-Sahayak और One Case, One Data जैसी पहलों को भी न्यायिक सेवाओं को अधिक नागरिक-केंद्रित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण बताया।

एशियाई अदालतों के बीच सहयोग पर जोर

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि तकनीक से जुड़े कई सवाल केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं। डेटा सुरक्षा, AI की जवाबदेही, डिजिटल पहुंच और न्यायिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दे अलग-अलग देशों की संवैधानिक अदालतों के सामने भी आ रहे हैं। इसी वजह से उन्होंने एशियाई संवैधानिक अदालतों के बीच अनुभव साझा करने और सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। AACC कांग्रेस का उद्देश्य भी डिजिटल युग में संवैधानिक न्याय, मानवाधिकार और कानून के शासन से जुड़े मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय संवाद को बढ़ावा देना है।

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