अमेरिका की दोस्ती पाकिस्तान के लिए बनी नई मुसीबत, गाजा मुद्दे पर बढ़ा बवाल

गाजा शांति सेना को लेकर अमेरिका के दबाव ने पाकिस्तान को मुश्किल में डाल दिया है। असीम मुनीर के फैसले पर देश की राजनीति, सेना और जनता में विरोध तेज हो गया है।

अमेरिका के गाजा पीस प्लान को लेकर पाकिस्तान पर दबाव बढ़ गया है। सेना प्रमुख असीम मुनीर के रुख से देश में राजनीतिक और सैन्य स्तर पर विरोध शुरू हो गया है। यह मुद्दा पाकिस्तान के लिए नई कूटनीतिक चुनौती बन गया है।

Pakistan: पाकिस्तान इस समय एक गंभीर कूटनीतिक और राजनीतिक उलझन में फंसा हुआ नजर आ रहा है। अमेरिका के साथ रिश्ते मजबूत करने की कोशिश अब पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर के लिए गले की फांस बनती जा रही है। मामला गाजा से जुड़ा है, जहां अमेरिका पाकिस्तान पर शांति सेना (Peace Force) भेजने का दबाव बना रहा है। इस दबाव ने पाकिस्तान की राजनीति, सेना और जनता के बीच हलचल मचा दी है।

गाजा पीस प्लान से शुरू हुआ विवाद

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ, जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने गाजा शांति समझौते को लेकर एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका पाकिस्तान का आभारी है, क्योंकि उसने गाजा स्टेबिलाइजेशन फोर्स का हिस्सा बनने की पेशकश की है या कम से कम इस पर विचार करने की बात कही है। इस बयान के सामने आते ही पाकिस्तान में भूचाल आ गया।

मार्को रुबियो का यह बयान सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के गाजा पीस प्लान से जुड़ा हुआ माना जा रहा है। इस प्लान के तहत गाजा में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय सेनाएं तैनात करने की बात कही जा रही है। अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तान अपनी सेना इस मिशन में भेजे।

पाकिस्तान में क्यों मचा हंगामा

मार्को रुबियो के बयान के बाद पाकिस्तान में यह संदेश गया कि फील्ड मार्शल असीम मुनीर अमेरिका के दबाव में आकर पाकिस्तानी सेना को गाजा भेजने के लिए तैयार हैं। यही बात पाकिस्तान की जनता, विपक्षी दलों और यहां तक कि सरकार के भीतर भी नाराजगी का कारण बन गई।

पाकिस्तान में लोगों का मानना है कि गाजा जैसे संवेदनशील इलाके में सेना भेजना न सिर्फ खतरनाक है, बल्कि यह देश के हितों के भी खिलाफ है। कई शहरों में असीम मुनीर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। सड़कों पर उतरकर लोग इस फैसले का विरोध करने लगे।

सेना के भीतर भी मतभेद

यह मामला सिर्फ जनता और राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं है। पाकिस्तानी सेना के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद सामने आ रहे हैं। सेना के कई धड़े इस बात से सहमत नहीं हैं कि पाकिस्तानी सैनिकों को गाजा जैसे युद्धग्रस्त क्षेत्र में भेजा जाए।

सेना के भीतर यह चिंता भी जताई जा रही है कि अगर सैनिकों को गाजा भेजा गया, तो उन्हें हमास और अन्य फिलिस्तीनी समूहों के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ सकती है। यह स्थिति पाकिस्तान के लिए बेहद संवेदनशील हो सकती है, क्योंकि देश खुद को लंबे समय से फिलिस्तीन समर्थक बताता आया है।

वाशिंगटन दौरे की अटकलों ने बढ़ाया तनाव

मार्को रुबियो के बयान के बाद पाकिस्तान में यह खबर तेजी से फैलने लगी कि असीम मुनीर जल्द ही वाशिंगटन जाकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात करने वाले हैं। इस संभावित मुलाकात ने विवाद को और हवा दे दी।

मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया चर्चाओं में यह सवाल उठने लगा कि क्या असीम मुनीर अमेरिका के साथ किसी गुप्त समझौते की ओर बढ़ रहे हैं। यही कारण है कि जनता, मीडिया, राजनीतिक दल और यहां तक कि सत्ता पक्ष के कुछ नेता भी इस मुद्दे पर खुलकर विरोध जता रहे हैं।

विदेश कार्यालय की सफाई

बढ़ते विवाद को देखते हुए पाकिस्तान के विदेश कार्यालय को सामने आकर सफाई देनी पड़ी। शनिवार को विदेश कार्यालय ने कहा कि पाकिस्तान से गाजा में सैन्यकर्मी भेजने के लिए आधिकारिक तौर पर कोई अनुरोध नहीं किया गया है। साथ ही यह भी कहा गया कि पाकिस्तान ने इस मुद्दे पर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है।

इससे पहले पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने भी बयान दिया था कि जब तक गाजा स्टेबिलाइजेशन फोर्स के कार्यक्षेत्र और भूमिका पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक पाकिस्तान कोई निर्णय नहीं ले सकता। उन्होंने साफ कहा कि हमास को निरस्त्र करना पाकिस्तान का काम नहीं है।

मुस्लिम देशों की भूमिका पर सवाल

पाकिस्तान में इस पूरे मुद्दे को धार्मिक और नैतिक दृष्टिकोण से भी देखा जा रहा है। पाकिस्तानी समाज का एक बड़ा वर्ग मानता है कि किसी भी मुस्लिम देश को फिलिस्तीनी समूहों के खिलाफ हथियार नहीं उठाने चाहिए।

पाकिस्तान के प्रमुख अखबार द डॉन ने अपने संपादकीय में इस मुद्दे पर तीखी टिप्पणी की है। अखबार ने लिखा कि अमेरिका वह करने की कोशिश कर रहा है, जो इजरायल गाजा में करने में विफल रहा। संपादकीय में यह भी कहा गया कि किसी मुस्लिम देश को फिलिस्तीनी प्रतिरोधक समूहों से लड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।

इजरायल पर अविश्वास की भावना

द डॉन के संपादकीय में यह भी लिखा गया कि इजरायल पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अखबार के अनुसार, इजरायल पहले ही संकेत दे चुका है कि वह कब्जे वाले गाजा के महत्वपूर्ण हिस्सों में बने रहने का इरादा रखता है। ऐसे में अगर मुस्लिम और अरब देश इस योजना का हिस्सा बनते हैं, तो वे अमेरिका और इजरायल की उस रणनीति के सहयोगी बन जाएंगे, जो गाजा पर कब्जे को बनाए रखना चाहती है।

इसी कारण कई देशों ने गाजा में सेना भेजने से इनकार कर दिया है। पाकिस्तान में भी यही तर्क दिया जा रहा है कि उसे इस योजना से दूरी बनाए रखनी चाहिए।

असीम मुनीर के सामने दोहरी चुनौती

फील्ड मार्शल असीम मुनीर इस समय सबसे कठिन स्थिति में नजर आ रहे हैं। एक तरफ अमेरिका का दबाव है, जो पाकिस्तान से गाजा में सेना भेजने की उम्मीद कर रहा है। दूसरी तरफ पाकिस्तान की जनता, राजनीतिक दल और सेना के भीतर विरोध की लहर है।

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