अमेरिकी पनडुब्बी का टॉरपीडो हमला, ईरानी युद्धपोत हिंद महासागर में डूबा, 180 नाविकों की जान पर खतरा

अमेरिकी पनडुब्बी का टॉरपीडो हमला, ईरानी युद्धपोत हिंद महासागर में डूबा, 180 नाविकों की जान पर खतरा

हिंद महासागर में अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत आइरिस देना को टॉरपीडो से डुबाया। 32 नाविक बचाए गए, जबकि जहाज पूरी तरह समुद्र की गहराइयों में समा गया। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहला हमला है।

US Iran conflict: हिंद महासागर में श्रीलंका के पास अमेरिकी नौसेना की पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत “आइरिस देना” को टॉरपीडो से निशाना बनाया और इसे पूरी तरह डुबो दिया। यह घटना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार किसी युद्ध में किसी जहाज को सीधे टॉरपीडो से डुबाने की रिकॉर्ड की गई घटना है। 

अमेरिकी पेंटागन के अनुसार यह हमला बुधवार को किया गया, और इसका उद्देश्य ईरानी जहाज को समुद्री खतरे से बाहर करना था। इस हमले ने न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर तनाव बढ़ाया बल्कि वैश्विक समुद्री मार्गों पर नजर रखने वाले देशों का ध्यान भी आकर्षित किया।

टॉरपीडो हमले का भयंकर प्रभाव

अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा जारी किए गए वीडियो में साफ दिखाई दिया कि टॉरपीडो ने युद्धपोत के पिछले हिस्से के नीचे जाकर विस्फोट किया। विस्फोट के साथ समुद्र से पानी का विशाल गुबार उठता है और जहाज का ढांचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है। कुछ ही पलों में युद्धपोत टूटता हुआ नजर आता है और धीरे-धीरे समुद्र की गहराइयों में समा जाता है। 

अमेरिकी रक्षा मंत्री Pete Hegseth ने इस हमले को “शांत लेकिन घातक मौत” बताया। वहीं अमेरिकी सेना के संयुक्त चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष Gen. Dan Cane ने कहा कि टॉरपीडो ने अपने लक्ष्य पर तुरंत असर किया और जहाज को भारी नुकसान पहुंचाया।

समुद्र से बचाए गए ईरानी नाविक

हमले के तुरंत बाद अफरा-तफरी का माहौल बन गया। श्रीलंका के अधिकारियों ने बताया कि डूबते युद्धपोत से 32 ईरानी नाविकों को बचाया गया। जहाज पर कुल 180 लोग सवार थे, जिनमें अधिकांश के हालात फिलहाल अस्पष्ट हैं। अमेरिकी नौसेना ने इस हमले के सभी विवरण अमेरिकी सेंट्रल कमान के पास भेजे हैं और इस पनडुब्बी की पहचान फिलहाल सार्वजनिक नहीं की गई है।

1945 के बाद पहली बार हुआ ऐसा हमला

इतिहास में झांकें तो अमेरिकी पनडुब्बी ने पिछली बार 14 अगस्त 1945 को जापान के जहाज सीडी-13 को टॉरपीडो से डुबाया था। उस हमले में जापानी जहाज के 28 नाविकों की मौत हुई थी। इसके बाद अमेरिकी पनडुब्बियों का मुख्य काम खुफिया मिशन और जमीन से मिसाइल हमलों तक सीमित रहा, लेकिन सीधे टॉरपीडो से किसी जहाज को डुबाने की घटना अब तक नहीं हुई थी। इस कारण यह हमला इतिहास में एक अलग पहचान बनाता है।

खतरनाक हथियार: मार्क-48 टॉरपीडो

जनरल डैन केन के अनुसार इस हमले में अमेरिकी नौसेना का प्रमुख हथियार मार्क-48 टॉरपीडो इस्तेमाल किया गया। इसे खास तौर पर दुश्मन के जहाजों और पनडुब्बियों को नष्ट करने के लिए विकसित किया गया है। यह टॉरपीडो पहली बार 1972 में सेवा में शामिल हुआ और समय के साथ इसमें कई आधुनिक सुधार किए गए। इसका वजन लगभग 3800 पाउंड है और यह सोनार तकनीक के जरिए अपने लक्ष्य को ढूंढता है।

जब यह जहाज के नीचे जाकर फटता है तो लगभग 500 पाउंड टीएनटी के बराबर विस्फोट होता है। इस धमाके से पानी के अंदर गैस का एक बड़ा बुलबुला बनता है, जो जहाज की रीढ़ जैसी संरचना को तोड़ देता है। जैसे ही मुख्य संरचना टूटती है, पूरा जहाज अक्सर दो हिस्सों में बंटकर समुद्र की गहराइयों में समा जाता है।

अमेरिकी वीडियो में दिखा डूबते जहाज का नजारा

अमेरिकी रक्षा विभाग ने सोशल मीडिया पर डूबते युद्धपोत की तस्वीर और वीडियो जारी किया। इसमें साफ दिखाई दिया कि विस्फोट के तुरंत बाद आइरिस देना का अगला हिस्सा ऊपर उठ गया और कुछ ही पलों में पूरा जहाज संतुलन खोकर समुद्र में समा गया। यह दृश्य इस बात का संकेत था कि समुद्र के भीतर हुए विस्फोट की शक्ति कितनी भयंकर थी।

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