पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को वर्ष 2021-22 की आबकारी नीति से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में मिली जमानत को चुनौती देने वाली प्रवर्तन निदेशालय (ED) की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट सोमवार को सुनवाई करेगा।
नई दिल्ली: पूर्व दिल्ली मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल से जुड़े आबकारी नीति मामले में सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रही है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 2021-22 की दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ट्रायल कोर्ट की ओर से दी गई जमानत को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट आज इसी याचिका पर आगे सुनवाई करेगा।
यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि दिल्ली की विवादित आबकारी नीति को लेकर जांच कई वर्षों से चल रही है। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने मुख्य सवाल ED की उस चुनौती से जुड़ा रहेगा, जिसमें एजेंसी ने निचली अदालत के जमानत आदेश को रद्द करने या उस पर रोक जारी रखने की मांग की है।
20 जून 2024 को मिली थी जमानत
अरविंद केजरीवाल को 20 जून 2024 को दिल्ली की ट्रायल कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में एक लाख रुपये के निजी मुचलके पर जमानत दी थी। इसके बाद ED ने इस आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट ने निचली अदालत के जमानत आदेश पर रोक लगा दी थी। इसके बाद मामले में अलग-अलग न्यायिक प्रक्रियाएं आगे बढ़ती रहीं।
केजरीवाल की गिरफ्तारी और जमानत से जुड़े मुद्दे सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचे। उनके खिलाफ ED की कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी कानूनी सवाल उठाए गए थे।
आबकारी नीति विवाद क्या है?
दिल्ली सरकार की 2021-22 की आबकारी नीति का उद्देश्य शराब कारोबार में बदलाव और प्रतिस्पर्धा बढ़ाना था। हालांकि, बाद में इस नीति के निर्माण और लागू करने में कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगे। तत्कालीन उपराज्यपाल की सिफारिश के बाद इस मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने शुरू की। बाद में ED ने कथित मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े पहलुओं की जांच शुरू की।
जांच एजेंसियों का आरोप रहा है कि नीति में बदलाव के दौरान कुछ निजी कारोबारियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया और कथित तौर पर अवैध धन का इस्तेमाल हुआ। हालांकि, इन आरोपों को अदालत में अंतिम रूप से सिद्ध किया जाना बाकी है।

ED की क्या दलील है?
ED ने ट्रायल कोर्ट के जमानत आदेश को चुनौती देते हुए दलील दी है कि निचली अदालत ने मामले से जुड़े तथ्यों और जांच एजेंसी के पक्ष पर पर्याप्त विचार नहीं किया। एजेंसी चाहती है कि जमानत से जुड़े निचली अदालत के आदेश की न्यायिक समीक्षा की जाए। ED की जांच में कथित मनी ट्रेल, लेनदेन और नीति से जुड़े लोगों की भूमिका जैसे पहलू महत्वपूर्ण रहे हैं।
एजेंसी का आरोप है कि आबकारी नीति के निर्माण और क्रियान्वयन में कथित तौर पर ऐसी व्यवस्था बनाई गई, जिससे कुछ कारोबारियों को लाभ पहुंचा और अवैध धन के लेनदेन का रास्ता बना। दूसरी ओर, केजरीवाल और उनकी पार्टी इन आरोपों को लगातार खारिज करते रहे हैं और जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठाते रहे हैं।
सुनवाई में देरी पर भी उठे सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान केजरीवाल की ओर से पेश वकील ED द्वारा बार-बार स्थगन मांगे जाने का विरोध कर चुके हैं। उनका तर्क रहा है कि कार्यवाही को अनावश्यक रूप से लंबा खींचा जा रहा है। अक्टूबर 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट ने ED को मामले में अपनी दलीलें रखने का अंतिम अवसर दिया था। अब इस मामले की सुनवाई एक बार फिर अदालत के समक्ष है।
आबकारी नीति मामले की व्यापक कानूनी स्थिति में फरवरी 2026 में भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुआ था। राउज एवेन्यू कोर्ट ने CBI से जुड़े मामले में अरविंद केजरीवाल समेत आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया था। हालांकि, डिस्चार्ज और बरी होने की कानूनी स्थिति अलग होती है और मामले से जुड़े अन्य कानूनी पहलू अलग-अलग अदालतों में जारी रह सकते हैं।
इसलिए आज की सुनवाई को केवल राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में नहीं, बल्कि जमानत और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े कानूनी सवालों के संदर्भ में देखना महत्वपूर्ण होगा।












