बांग्लादेश चुनाव से पहले देश में राजनीतिक अस्थिरता गहराती जा रही है। सत्ता परिवर्तन, धार्मिक हिंसा और NCP-जमात गठबंधन टूटने से चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
Bangladesh Election 2026: बांग्लादेश में 2026 के आम चुनाव से पहले हालात तेजी से अस्थिर होते जा रहे हैं। अगस्त 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद से देश राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। कानून व्यवस्था कमजोर पड़ती दिख रही है और राजनीतिक दलों के भीतर भी गहरी दरारें सामने आ रही हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बांग्लादेश चुनावी लोकतंत्र की ओर बढ़ पाएगा या हालात और बर्बर होते जाएंगे।
सत्ता परिवर्तन के बाद बदला माहौल
शेख हसीना के सत्ता से बेदखल होने के बाद बांग्लादेश में राजनीतिक संतुलन पूरी तरह बदल गया। सत्ता शून्य जैसी स्थिति बनी, जिसका फायदा कट्टरपंथी ताकतों और ध्रुवीकरण की राजनीति ने उठाया। कई इलाकों में धार्मिक हिंसा, नस्लीय तनाव और अल्पसंख्यकों पर हमलों की खबरें सामने आईं। चुनाव से पहले इस तरह का माहौल लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
धार्मिक हिंसा और नस्लभेद की बढ़ती घटनाएं
बीते महीनों में बांग्लादेश में धार्मिक हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं। कई मानवाधिकार संगठनों ने चेतावनी दी है कि समाज तेजी से ध्रुवीकृत हो रहा है। नस्लभेद और धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीति ने आम लोगों की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। चुनावी माहौल में यह तनाव और ज्यादा गहराने की आशंका है।
क्यों टूटा NCP और जमात का गठबंधन
नेशनल सिटीजन पार्टी यानी NCP और जमात-ए-इस्लामी के बीच बना चुनावी गठबंधन अब टूट चुका है। इसकी सबसे बड़ी वजह सीट बंटवारे और मतों को लेकर मतभेद रहे। दोनों दलों के बीच इस बात पर सहमति नहीं बन पाई कि किस क्षेत्र में कौन उम्मीदवार उतारेगा और किस मुद्दे पर साझा रणनीति अपनाई जाएगी।
तसनीम जारा का बड़ा फैसला
गठबंधन टूटने के बाद NCP की चर्चित नेता तसनीम जारा ने पार्टी की उम्मीदवारी ठुकराने का ऐलान कर दिया। उन्होंने घोषणा की कि वह फरवरी 2026 में होने वाले राष्ट्रीय चुनाव में ढाका-9 सीट से Independent candidate के रूप में चुनाव लड़ेंगी। यह फैसला NCP के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
तसनीम जारा का भावुक बयान
तसनीम जारा ने कहा कि उनका सपना किसी राजनीतिक पार्टी के मंच से संसद में जाकर अपने निर्वाचन क्षेत्र और देश की सेवा करने का था। लेकिन मौजूदा हालात ने उन्हें यह फैसला लेने पर मजबूर किया। उन्होंने अपने Facebook post में लिखा कि उन्होंने जनता से नई राजनीतिक संस्कृति के निर्माण का वादा किया था और परिस्थितियां चाहे जैसी हों, वह उस वादे पर कायम रहेंगी।
NCP के शीर्ष नेतृत्व में गहराती दरार

तसनीम जारा के बाद NCP की एक और वरिष्ठ नेता समंता शर्मिन ने भी पार्टी के फैसलों पर खुलकर सवाल उठाए। उन्होंने जमात-ए-इस्लामी के साथ किसी भी तरह के गठबंधन का कड़ा विरोध किया। उनका कहना है कि जमात बांग्लादेश की राजनीति में एक विश्वसनीय सहयोगी नहीं है और उसके साथ समझौता करने की कीमत NCP को भारी पड़ सकती है।
विचारधारा का टकराव बना बड़ी वजह
समंता शर्मिन ने साफ कहा कि NCP की मूल विचारधारा जमात-ए-इस्लामी से पूरी तरह अलग है। NCP न्याय, सुधार और संविधान सभा के चुनाव जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द बनी पार्टी है। उनके अनुसार इन तीन बुनियादी मुद्दों पर सहमति किसी भी राजनीतिक गठबंधन के लिए जरूरी शर्त है, जो जमात के साथ संभव नहीं दिखती।
PR सिस्टम पर विवाद
NCP नेताओं का आरोप है कि जमात-ए-इस्लामी ने निचले सदन में Proportional Representation यानी PR की मांग कर सुधारों में बाधा डाली। पार्टी का मानना है कि यह मांग लोकतांत्रिक सुधारों के बजाय राजनीतिक लाभ के लिए की गई। इसी वजह से NCP के कई नेताओं ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि सुधारों के खिलाफ खड़ी ताकतों के साथ गठबंधन संभव नहीं है।
अकेले चुनाव लड़ने का पुराना ऐलान
जुलाई मार्च के बाद NCP के कई संयोजकों और वरिष्ठ नेताओं ने घोषणा की थी कि पार्टी सभी 300 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। देशभर से उम्मीदवारों को आमंत्रित किया गया था और यह संदेश दिया गया था कि NCP किसी भी बड़े दल या गठबंधन के सहारे नहीं, बल्कि स्वतंत्र रूप से जनता के बीच जाएगी।
जमात से गठबंधन का मतलब BNP का समर्थन नहीं
समंता शर्मिन ने यह भी स्पष्ट किया कि जमात-ए-इस्लामी से गठबंधन का मतलब BNP को समर्थन देना नहीं है। उन्होंने कहा कि BNP या जमात में से किसी के साथ भी गठबंधन करना NCP की संगठनात्मक और राजनीतिक नीतियों से भटकाव होगा। उनका कहना है कि पार्टी को अपनी वैचारिक पहचान पर कायम रहना चाहिए।
छात्र आंदोलन से निकली NCP की पहचान
NCP की स्थापना जुलाई 2024 में शेख हसीना के खिलाफ हुए विद्रोह के बाद हुई थी। इस आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से छात्रों ने किया था। पार्टी खुद को एक नई राजनीतिक ताकत के रूप में पेश करती रही है, जो पुरानी राजनीति से अलग रास्ता अपनाना चाहती है।
महिला नेताओं का विरोध
जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन की पहल के बाद से NCP के भीतर खासतौर पर महिला नेताओं का विरोध तेज हो गया। उनका मानना है कि जमात जैसी पार्टी के साथ जुड़ाव NCP की प्रगतिशील छवि को नुकसान पहुंचा सकता है। यह आंतरिक विरोध अब खुलकर सामने आ चुका है।











