Batwara 1947 Movie Review: सनी देओल की दमदार मौजूदगी, प्रीति-शबाना के किरदारों का सीमित असर

Batwara 1947 Movie Review: सनी देओल अपनी दमदार मौजूदगी से फिल्म में असर छोड़ते हैं, लेकिन प्रीति जिंटा और शबाना आजमी के किरदारों को सीमित जगह मिलती है।

सनी देओल और प्रीति जिंटा की फिल्म ‘बंटवारा 1947’ 14 अगस्त को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। 1947 के विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में दंगे, बिछड़ते परिवार, लाहौर पलायन की मजबूरी और सांप्रदायिक तनाव के बीच इंसानियत की कहानी दिखाई गई है।

  • Movie Review: बंटवारा 1947
  • कलाकार: सनी देओल , प्रीति जिंटा , शबाना आजमी , अली फजल , करण देओल और अभिमन्यु सिंह
  • लेखक: राजकुमार संतोषी, असगर वजाहत (नाटक जिस लाहौर नइ वेख्या, ओ जम्याइ नइ पर आधारित)
  • निर्देशक: राजकुमार संतोषी
  • निर्माता: आमिर खान, अपर्णा पुरोहित
  • रेटिंग: 2/5

एंटरटेनमेंट न्यूज़: सनी देओल और प्रीति जिंटा स्टारर फिल्म ‘बंटवारा 1947’ 14 अगस्त को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। भारत-पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म सांप्रदायिक तनाव, विस्थापन, इंसानियत और घर से बिछड़ने के दर्द जैसे गंभीर विषयों को एक ही कहानी में समेटने की कोशिश करती है। फिल्म का मूल विचार प्रभावशाली है, लेकिन इसकी लंबी अवधि, धीमा स्क्रीनप्ले और जरूरत से ज्यादा संवाद इसे पूरी तरह असरदार बनने से रोकते हैं।

करीब ढाई घंटे की यह फिल्म शुरुआत में उम्मीद जगाती है, लेकिन आगे बढ़ते-बढ़ते कहानी कई जगह दोहराव और लंबे भाषणों में उलझ जाती है। नतीजतन, दर्शक कहानी से जुड़ने के बजाय यह इंतजार करने लगते हैं कि अगला बड़ा सनी देओल संवाद या एक्शन दृश्य कब आएगा।

‘बंटवारा 1947’ की कहानी क्या है?

फिल्म की कहानी वर्ष 1947 के उथल-पुथल भरे दौर में शुरू होती है। भारत और पाकिस्तान के विभाजन के साथ हिंसा और पलायन का माहौल है। सिकंदर मिर्जा, जिसका किरदार सनी देओल ने निभाया है, अपने परिवार के साथ लाहौर पहुंचता है। उसके साथ पत्नी हमीदा बेगम, यानी प्रीति जिंटा, और जावेद मिर्जा के रूप में करण देओल भी हैं।

नए देश और नए शहर में परिवार नई जिंदगी शुरू करना चाहता है। उन्हें रहने के लिए एक बड़ी हवेली मिलती है, लेकिन वहां पहले से दुर्गावती देवी रहती हैं, जिनका किरदार शबाना आजमी ने निभाया है। दुर्गावती अपने घर को छोड़ने से इनकार कर देती हैं। उनके लिए वह हवेली केवल एक संपत्ति नहीं, बल्कि उनके परिवार, यादों और अतीत का आखिरी सहारा है। यहीं से मिर्जा परिवार और दुर्गावती के बीच टकराव शुरू होता है।

मामला तब और जटिल हो जाता है जब स्थानीय नेता याकूब खान की नजर भी उस हवेली पर पड़ती है। मजहब, सत्ता, लालच, हिंसा और इंसानियत के सवाल एक ही घर के भीतर टकराने लगते हैं। अली फजल हबीब अनवर के रूप में कहानी में मानवीय संवेदना का पक्ष मजबूत करने की कोशिश करते हैं।

सनी देओल ने संभाली फिल्म की सबसे बड़ी जिम्मेदारी

सनी देओल की स्क्रीन प्रेजेंस आज भी प्रभावशाली है। उनकी आवाज और संवाद अदायगी कुछ महत्वपूर्ण दृश्यों को ताकत देती है। हालांकि, फिल्म की एक बड़ी समस्या यह है कि लगभग हर बड़े मुद्दे का जवाब उनके लंबे संवादों से दिया जाता है। चाहे धर्म की बात हो, इंसानियत का संदेश हो या विरोधियों को जवाब देना हो, कहानी बार-बार सनी देओल के मोनोलॉग पर पहुंच जाती है। कुछ समय बाद यह तरीका दोहरावपूर्ण लगने लगता है। उनके संवादों में संदेश तो मौजूद है, लेकिन कई दृश्य इतने लंबे हैं कि प्रभाव पैदा करने के बजाय भाषण जैसे महसूस होते हैं।

प्रीति जिंटा और शबाना आजमी के किरदारों में सीमित असर

प्रीति जिंटा की बड़े पर्दे पर मौजूदगी दर्शकों के लिए सुखद हो सकती है, लेकिन हमीदा बेगम का किरदार उतनी मजबूती से विकसित नहीं हो पाता। कुछ दृश्यों में भावनाएं अपेक्षित गहराई के साथ सामने नहीं आतीं। शबाना आजमी जैसी अनुभवी अभिनेत्री से भी अधिक प्रभावशाली प्रदर्शन की उम्मीद रहती है। उनका किरदार भावनात्मक रूप से मजबूत है, लेकिन लेखन और प्रस्तुति कई जगह उसकी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर पाती।

अली फजल अपेक्षाकृत सहज नजर आते हैं और उनका अभिनय फिल्म के शांत तथा संवेदनशील हिस्सों में बेहतर प्रभाव छोड़ता है। करण देओल को भी एक्शन और इमोशनल दृश्य मिले हैं, लेकिन उनकी प्रस्तुति में और स्वाभाविकता की जरूरत महसूस होती है।

कहानी अच्छी, लेकिन स्क्रीनप्ले कमजोर

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका मूल विचार है। विभाजन के दौरान एक ही घर में अलग-अलग धर्मों और पृष्ठभूमि के लोगों के बीच पैदा होने वाला संघर्ष एक प्रभावशाली सिनेमाई विषय बन सकता था। फिल्म असगर वजाहत के चर्चित नाटक ‘जिस लाहौर नइ वेख्या, ओ जम्याइ नइ’ से प्रेरित बताई गई है। राजकुमार संतोषी और असगर वजाहत लेखन से जुड़े हैं। इसके बावजूद स्क्रीन पर कहानी कई जगह अपनी क्षमता के अनुरूप असर नहीं छोड़ती।

कुछ संवाद अटपटे और जरूरत से ज्यादा समझाने वाले लगते हैं। फिल्म बार-बार यह संदेश दोहराती है कि धर्म से ज्यादा इंसानियत महत्वपूर्ण है और नफरत की जड़ इंसान के व्यवहार में होती है। संदेश सकारात्मक है, लेकिन इसे अधिक सूक्ष्म तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता था।

निर्देशन, एक्शन और संगीत

निर्देशक राजकुमार संतोषी ने एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और सामाजिक विषय चुना है, लेकिन फिल्म की गति कमजोर पड़ती है। लाहौर और विभाजन के दौर का माहौल कई दृश्यों में उतना विश्वसनीय नहीं लगता, जितनी उम्मीद थी। सनी देओल की फिल्म होने के कारण एक्शन भी मौजूद है। हालांकि, इस बार के एक्शन दृश्य उनकी पुरानी फिल्मों जैसा प्रभाव पैदा नहीं करते।

संगीत की जिम्मेदारी ए.आर. रहमान के पास है, लेकिन फिल्म का कोई गीत विशेष रूप से यादगार नहीं बन पाता। बैकग्राउंड स्कोर ठीक है, मगर कहानी को अतिरिक्त ऊंचाई देने में सफल नहीं होता।

Batwara 1947 देखें या नहीं?

अगर आपको विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी कहानियां, सनी देओल की स्क्रीन प्रेजेंस और सामाजिक संदेश वाली फिल्में पसंद हैं, तो इसे एक बार देखा जा सकता है। लेकिन तेज रफ्तार कहानी और सूक्ष्म स्क्रीनप्ले की उम्मीद रखने वाले दर्शकों को निराशा हो सकती है।

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