Bhakra Dam के लिए डूबा Bilaspur, 52 हजार लोग हुए विस्थापित; 65 साल बाद भी प्लाट का इंतजार

Bhakra Dam के निर्माण में 9 अगस्त 1961 को पुराना Bilaspur और 354 गांव डूबे थे। 52 हजार लोग विस्थापित हुए, आज भी प्लाट और पुनर्वास का इंतजार है।

भाखड़ा बांध के निर्माण के कारण 9 अगस्त 1961 को पुराना बिलासपुर शहर और 354 गांव जलमग्न हो गए थे। करीब 52 हजार लोग विस्थापित हुए, लेकिन छह दशक से ज्यादा समय बाद भी पुनर्वास और प्लाट की समस्या बनी हुई है।

बिलासपुर: भाखड़ा बांध के लिए पुराने बिलासपुर शहर के जलमग्न होने के 65 साल पूरे हो गए हैं। 9 अगस्त 1961 को बांध की झील में शहर के साथ 354 गांव भी डूब गए थे और करीब 12 हजार परिवारों के 52 हजार लोगों को विस्थापित होना पड़ा था। नया बिलासपुर बसने के बावजूद विस्थापित परिवार आज भी पुनर्वास और जमीन के मालिकाना हक से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।

9 अगस्त 1961 को झील में समा गया पुराना बिलासपुर

भाखड़ा बांध के निर्माण के दौरान 9 अगस्त 1961 को पुराना बिलासपुर शहर पूरी तरह जलमग्न हो गया था। शहर के साथ 354 गांव भी बांध की झील में समा गए। इस परियोजना के कारण करीब 12 हजार परिवारों के 52 हजार लोगों को अपना घर और जमीन छोड़कर विस्थापित होना पड़ा।

पुराना बिलासपुर केवल मकानों और बाजारों का शहर नहीं था। यहां की ऐतिहासिक गलियां, मंदिर, महल और प्राकृतिक जलस्रोत स्थानीय संस्कृति का हिस्सा थे। धौलरा का महल, चामडू के कुएं, पंचरुखी का मीठा पानी और गोपाल मंदिर के दुर्लभ चित्र भी जलाशय में खो गए।

आज भी पुराने शहर से जुड़े लोग उस दौर को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं। उनके लिए यह केवल एक शहर का डूबना नहीं था, बल्कि अपनी जमीन, घर और सांस्कृतिक विरासत से अलग होने की घटना थी।

विस्थापितों का दावा, नेहरू का वादा पूरा नहीं हुआ

भाखड़ा बांध को देश के विकास और ऊर्जा जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण परियोजना माना गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसे आधुनिक भारत का मंदिर बताया था। विस्थापितों को बेहतर सुविधाएं और पुनर्वास उपलब्ध कराने का आश्वासन भी दिया गया था।

हालांकि, विस्थापित परिवारों का कहना है कि छह दशक से अधिक समय बीतने के बावजूद पुनर्वास से जुड़ी कई समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया है। कई परिवारों को जमीन और प्लाट के मालिकाना हक का इंतजार है।

विस्थापितों के संगठनों का आरोप है कि इस मुद्दे को अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में उठाया गया, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकल सका। सर्वदलीय भाखड़ा विस्थापित एवं प्रभावित समिति के महासचिव पंडित जयकुमार शर्मा और ग्रामीण भाखड़ा विस्थापित सुधार समिति के अध्यक्ष देशराज शर्मा ने भी विस्थापितों की समस्याओं को लेकर चिंता जताई है।

अब निजी जमीन खरीदकर प्लाट देने का प्रस्ताव

दशकों पुराने इस विवाद के समाधान के लिए राज्य सरकार ने अब नया प्रस्ताव तैयार किया है। इसके तहत निजी जमीन खरीदकर विस्थापित परिवारों को प्लाट उपलब्ध कराने की योजना पर विचार किया जा रहा है।

इससे पहले एम्स के पास चंगर पलासीं क्षेत्र में करीब 256 बीघा जमीन का चयन किया गया था, लेकिन बाद में इसे उपयुक्त नहीं पाया गया। इसके बाद ग्वालथाई के पास सरकारी जमीन पर भी विचार किया गया, लेकिन वहां भी योजना आगे नहीं बढ़ सकी।

अब प्रशासन ने निजी भूमि खरीदने का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा है। प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद जमीन खरीदकर विस्थापितों को प्लाट उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है।

पहले भी बन चुकी हैं पुनर्वास की योजनाएं

विस्थापितों के पुनर्वास के लिए इससे पहले भी अलग-अलग सरकारों की ओर से योजनाएं बनाई जाती रही हैं। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के कार्यकाल में एचआरटीसी कॉलोनी के पास दो सेक्टर विकसित करने और प्लाट तैयार करने की घोषणा की गई थी।

हालांकि, विस्थापित परिवारों की पर्याप्त रुचि नहीं होने के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी और बाद में ठंडे बस्ते में चली गई।

अब निजी जमीन खरीदने के प्रस्ताव से लंबे समय से प्लाट की प्रतीक्षा कर रहे विस्थापित परिवारों को एक बार फिर उम्मीद जगी है। हालांकि, प्रस्ताव को मंजूरी मिलने और वास्तविक आवंटन शुरू होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि 65 साल पुरानी पुनर्वास की समस्या का स्थायी समाधान कितना आगे बढ़ पाता है।

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