राहुल गांधी का CEC ज्ञानेश कुमार पर हमला, ‘वोट चोरी’ का आरोप; SIR और चुनाव आयोग पर उठाए सवाल

राहुल गांधी ने CEC ज्ञानेश कुमार पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाकर इस्तीफा मांगा। SIR और वोटर लिस्ट के मुद्दे पर दो चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियां भी सामने आईं।

राहुल गांधी ने 24 सितंबर को CEC ज्ञानेश कुमार पर “वोट चोरी” का आरोप लगाते हुए उनके इस्तीफे की मांग की। SIR को लेकर विवाद के बीच दो चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियों ने चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए हैं।

नई दिल्ली: कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 24 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए। करीब 55 मिनट की प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने दावा किया कि चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूचियों में हेरफेर के जरिए विपक्ष के खिलाफ “वोट चोरी” हुई है। उनके ये आरोप राजनीतिक दावे हैं; इन्हें स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की और कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की भी जांच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति का विरोध किया था। चुनाव आयोग की ओर से हालांकि SIR से जुड़े फैसलों को कानूनी आधार वाला बताया गया है और आयोग ने आंतरिक टिप्पणियों को सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताया है।

55 मिनट की प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी के प्रमुख आरोप

राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग, Special Intensive Revision (SIR) और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों को उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में धांधली हुई और इसी वजह से सत्तारूढ़ भाजपा को सामान्य एंटी-इनकंबेंसी का सामना नहीं करना पड़ा।

उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और अन्य नेताओं की तस्वीरें और पुराने सार्वजनिक बयान भी दिखाए। राहुल ने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए।

हालांकि, चुनावों में “वोट चोरी” या व्यापक धांधली के उनके आरोपों को तथ्यात्मक रूप से स्थापित करने के लिए अलग से प्रमाण और आधिकारिक जांच की आवश्यकता होगी। उपलब्ध रिपोर्टिंग में इन्हें राहुल गांधी के आरोपों के रूप में ही दर्ज किया गया है।

राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार पर क्या आरोप लगाए?

राहुल गांधी ने CEC ज्ञानेश कुमार पर “वोट चोरी”, “कानून चोरी” और “संस्था चोरी” जैसे आरोप लगाए। उन्होंने उन्हें इस्तीफा देने और कथित अनियमितताओं की जांच में सहयोग करने की मांग की।

उन्होंने दावा किया कि देश में सरकारों के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी एक सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया है। इसके उदाहरण के तौर पर उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनावी प्रदर्शन का उल्लेख किया और सवाल उठाया कि भाजपा तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उसी तरह की एंटी-इनकंबेंसी क्यों नहीं दिखी।

राहुल ने इसका कारण चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी को बताया। यह उनका राजनीतिक आरोप है, न कि चुनाव आयोग या किसी न्यायिक संस्था द्वारा स्थापित निष्कर्ष।

राहुल गांधी ने अपने ‘वोट चोरी’ दावे की टाइमलाइन बताई

प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें लंबे समय से चुनावी प्रक्रिया को लेकर संदेह था। उन्होंने बताया कि उन्होंने 2025 में SIR को लेकर कई प्रेस कॉन्फ्रेंस की थीं और उस दौरान भी चुनाव आयोग पर मतदाता सूची से जुड़े आरोप लगाए थे।

उनका कहना था कि कुछ चुनावों के दौरान तकनीकी और चुनावी आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद उनका संदेह बढ़ा और इसके बाद विपक्ष ने इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाना शुरू किया।

उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी दल इस मुद्दे पर एकजुट हैं और संविधान तथा चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों को लेकर मिलकर काम करेंगे।

SIR क्या है और विवाद क्यों बढ़ा?

Special Intensive Revision यानी SIR चुनावी मतदाता सूची की व्यापक समीक्षा और संशोधन की प्रक्रिया है। चुनाव आयोग ने इसे मतदाता सूची को अपडेट करने और पात्र मतदाताओं को शामिल करने की प्रक्रिया के रूप में आगे बढ़ाया है।

The Indian Express की जांच के अनुसार, बिहार से जून 2025 में शुरू हुई SIR प्रक्रिया बाद में 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक पहुंची और ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए। यह आंकड़ा ड्राफ्ट रोल से हटाए गए नामों से संबंधित है; इसे अपने आप में स्थायी रूप से मताधिकार खत्म होने के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।

SIR को लेकर विवाद मुख्य रूप से नामों की जांच, दस्तावेजी प्रक्रिया, नए मतदाताओं के पंजीकरण और मतदाता डेटाबेस के तकनीकी प्रबंधन से जुड़ा है।

दो चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियों का मामला

The Indian Express की 23 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों ने कुछ कदमों को “अनधिकृत” और “गैरकानूनी” बताया तथा आरोप लगाया कि कुछ फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए गए।

यहां यह अंतर महत्वपूर्ण है कि ये दो चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज आपत्तियां हैं; इन्हें आयोग के अंतिम निर्णय के खिलाफ किसी न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

चुनाव आयोग ने रिपोर्ट के बाद कहा कि सदस्यों के बीच लिखित टिप्पणियां, तकनीकी इनपुट और आंतरिक जांच संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग ने यह भी कहा कि SIR समेत उसके अंतिम फैसलों को कानूनी आधार प्राप्त है और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।

Form-6 में बदलाव पर भी सवाल

नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 में SIR से संबंधित एक नया घोषणा विकल्प जोड़े जाने को लेकर भी दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी।

The Indian Express के अनुसार, नए प्रावधान में आवेदक से पूछा गया था कि क्या उसका, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR वाली मतदाता सूची में था। रिपोर्ट के मुताबिक, इस बदलाव को संधू और जोशी ने नियमों में संशोधन के बिना किए जाने के कारण “अनधिकृत” और “गैरकानूनी” बताया था। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने यह भी चिंता जताई कि इससे पहली बार वोटर बनने वाले युवाओं के लिए पंजीकरण प्रक्रिया कठिन हो सकती है।

मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण पर भी सवाल

दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों में मतदाता डेटाबेस और चुनावी सॉफ्टवेयर के नियंत्रण का मुद्दा भी शामिल था। The Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, विवेक जोशी ने मतदाता डेटाबेस के धीरे-धीरे दिल्ली में केंद्रीकरण पर सवाल उठाया। सुखबीर सिंह संधू ने भी कुछ राज्य अधिकारियों द्वारा ERONet तक पूर्ण पहुंच न होने की बात उठाई और सिस्टम की सुरक्षा तथा डेटा में बदलाव की अनुमति से जुड़े सवाल किए।

यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची में बदलाव की प्रशासनिक जिम्मेदारी और डिजिटल सिस्टम के नियंत्रण के बीच स्पष्ट जवाबदेही चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ी है।

गोवा में 97 पात्र मतदाताओं का मामला

The Indian Express की रिपोर्ट में गोवा का एक उदाहरण भी दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, SIR प्रक्रिया के दौरान सुनवाई के बाद ERO ने 97 मतदाताओं को पात्र पाया, लेकिन सॉफ्टवेयर में उन्हें दोबारा मतदाता सूची में शामिल करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था।

रिपोर्ट के अनुसार, गोवा के अधिकारियों ने इस तकनीकी समस्या के समाधान के लिए चुनाव आयोग को कई ईमेल भेजे। लेकिन अंतिम मतदाता सूची जारी होने तक सिस्टम में आवश्यक बदलाव नहीं किया गया था। यह मामला मतदाता सूची तैयार करने में तकनीकी प्रणालियों और स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों की भूमिका को लेकर सवालों का एक उदाहरण बन गया है।

पश्चिम बंगाल में अपीलों का मुद्दा

पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों को लेकर भी चुनाव आयोग के भीतर सवाल उठाए गए। The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, करीब 60 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड में गड़बड़ियां चिन्हित की गई थीं और जांच के बाद बड़ी संख्या में नाम हटाए गए।

रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद हटाए गए और बाद में जोड़े गए नामों से संबंधित बड़ी संख्या में अपीलें ट्रिब्यूनल के सामने आईं। संधू ने इनमें से कुछ अपीलों की प्रक्रिया और अनुमति को लेकर सवाल उठाए।

संविधान और चुनाव आयोग की संरचना क्या कहती है?

भारत का चुनाव आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत गठित संवैधानिक संस्था है। वर्तमान में आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त हैं। चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर ज्ञानेश कुमार को CEC तथा सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की भूमिका को लेकर मौजूदा विवाद इसी तीन-सदस्यीय संरचना के भीतर मतभेदों से जुड़ा है। The Indian Express की रिपोर्ट में भी बताया गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कई मामलों में औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं।

राहुल गांधी के आरोप और चुनाव आयोग का पक्ष

पूरे विवाद में दो अलग-अलग स्तरों को अलग रखना जरूरी है। पहला, राहुल गांधी और विपक्षी दलों द्वारा लगाए गए “वोट चोरी” और चुनावी हेरफेर के राजनीतिक आरोप हैं। दूसरा, चुनाव आयोग के भीतर दो आयुक्तों द्वारा SIR और चुनावी डेटाबेस से जुड़े कुछ प्रशासनिक फैसलों पर दर्ज की गई लिखित आपत्तियां हैं।

चुनाव आयोग ने आंतरिक टिप्पणियों को संस्थागत समीक्षा प्रक्रिया बताया है और कहा है कि उसके अंतिम फैसलों को कानूनी आधार प्राप्त है। इसलिए मौजूदा विवाद का तथ्यात्मक केंद्र SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची में बदलाव, तकनीकी प्रणालियों की भूमिका, आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया और इन पर राजनीतिक दलों के आरोपों के इर्द-गिर्द है।

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