देश की दो बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों Bharat Heavy Electricals Limited (BHEL) और Steel Authority of India Limited (SAIL) पर ‘महारत्न’
दर्जा छिनने का खतरा मंडराने लगा है।
बिजनेस न्यूज़: भारत की दो प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां Bharat Heavy Electricals Limited और Steel Authority of India Limited इस समय अपने ‘महारत्न’ दर्जे को लेकर गंभीर समीक्षा के दायरे में हैं। केंद्र सरकार ने दोनों कंपनियों को प्रदर्शन सुधारने के लिए एक साल का समय देते हुए कड़ा अल्टीमेटम जारी किया है। सरकारी समीक्षा बैठक में यह पाया गया कि दोनों कंपनियां महारत्न दर्जा बनाए रखने के लिए आवश्यक वित्तीय मानकों को लगातार पूरा नहीं कर पा रही हैं।
क्या है पूरा मामला?
भारत सरकार के कैबिनेट सचिव डॉ. टीवी सोमनाथन की अध्यक्षता में हुई नीति समीक्षा बैठक में यह मुद्दा सामने आया कि महारत्न दर्जा बनाए रखने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को पिछले तीन वित्तीय वर्षों में औसतन कम से कम ₹5,000 करोड़ का शुद्ध लाभ (PAT) अर्जित करना आवश्यक होता है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, कुल 14 महारत्न कंपनियों में से केवल Bharat Heavy Electricals Limited और Steel Authority of India Limited ही इस अनिवार्य लाभ मानक को पूरा करने में पिछड़ती दिख रही हैं।
सरकार का सख्त रुख

केंद्र सरकार ने दोनों कंपनियों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे अगले एक वर्ष में अपने वित्तीय प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार करें। यदि निर्धारित समयसीमा के भीतर स्थिति में सुधार नहीं होता है, तो इन कंपनियों को महारत्न श्रेणी से हटाकर नवरत्न श्रेणी में डाउनग्रेड किया जा सकता है। यह कदम भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है, क्योंकि यह पहली बार है जब किसी महारत्न कंपनी को दर्जा गंवाने की औपचारिक चेतावनी दी गई है।
महारत्न का दर्जा भारत की सबसे बड़ी और वित्तीय रूप से मजबूत सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को दिया जाता है। इस दर्जे के तहत कंपनियों को व्यापक वित्तीय स्वतंत्रता मिलती है। वर्तमान नियमों के अनुसार, महारत्न कंपनियां बिना किसी अतिरिक्त सरकारी मंजूरी के ₹5,000 करोड़ तक का निवेश निर्णय ले सकती हैं। यह स्वतंत्रता बड़े प्रोजेक्ट्स, विस्तार योजनाओं और रणनीतिक निवेश के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
यदि किसी कंपनी को नवरत्न श्रेणी में डाउनग्रेड किया जाता है, तो उसकी निवेश सीमा घटकर लगभग ₹1,000 करोड़ तक सीमित हो जाती है। इससे बड़े औद्योगिक और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
किन क्षेत्रों में कमजोर प्रदर्शन?
सरकारी समीक्षा में यह सामने आया है कि दोनों कंपनियां कई वित्तीय और परिचालन मानकों पर अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पा रही हैं। विशेष रूप से लाभप्रदता (profitability) और पूंजीगत रिटर्न के मामले में गिरावट चिंता का विषय बनी हुई है। हालांकि दोनों कंपनियां भारत के भारी उद्योग, ऊर्जा और इस्पात क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा और लागत दबाव ने इनके मार्जिन पर असर डाला है।
भारी उद्योग मंत्रालय और इस्पात मंत्रालय को निर्देश दिया गया है कि वे दोनों कंपनियों के लिए एक विस्तृत पुनरुद्धार (revival) योजना तैयार करें। इस योजना में कॉर्पोरेट गवर्नेंस, लागत नियंत्रण, परियोजना दक्षता और वित्तीय अनुशासन जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने को कहा गया है। इसके अलावा, समय पर भुगतान, MSME विक्रेताओं के साथ संबंधों और CSR अनुपालन जैसे मुद्दों को भी प्रदर्शन मूल्यांकन में शामिल किया जाएगा।









