देश में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एनडीए शासित सभी राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने के लक्ष्य की घोषणा की है। हालांकि, इस मुद्दे पर एनडीए के सहयोगी दलों के रुख में अलग-अलग राय देखने को मिल रही है।
Uniform Civil Code (UCC): भारत में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर को मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि 2029 से पहले भाजपा-एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने का लक्ष्य है। हालांकि, इस लक्ष्य की राह में कानूनी प्रक्रिया, राज्यों की अलग-अलग परिस्थितियां और एनडीए के कुछ सहयोगी दलों की राय जैसी चुनौतियां मौजूद हैं।
यूसीसी का उद्देश्य व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े कुछ विषयों में नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था तैयार करना है। इनमें विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार और संपत्ति से जुड़े मामले शामिल हो सकते हैं। भारत में यह विषय लंबे समय से संवैधानिक और राजनीतिक चर्चा का हिस्सा रहा है।
क्या है समान नागरिक संहिता?
समान नागरिक संहिता यानी Uniform Civil Code का सामान्य अर्थ ऐसी समान नागरिक कानून व्यवस्था से है, जिसमें संबंधित विषयों पर धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय एक समान नियम लागू किए जाएं। इसके दायरे में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना और संपत्ति जैसे पारिवारिक एवं नागरिक मामलों को शामिल किया जा सकता है।
यूसीसी लंबे समय से भाजपा के प्रमुख नीतिगत मुद्दों में रहा है। पार्टी ने इसे अपने चुनावी एजेंडे में भी शामिल किया है। अब भाजपा शासित राज्यों में राज्य स्तर पर इसके लिए कानून बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
संविधान में UCC का क्या प्रावधान है?
भारत के संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता से संबंधित है। यह राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों का हिस्सा है और राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने की बात कहता है। यूसीसी से संबंधित विवाह, तलाक, गोद लेना और उत्तराधिकार जैसे विषय संविधान की समवर्ती सूची से भी जुड़े हैं।
इसका मतलब है कि इन विषयों पर केंद्र और राज्य, दोनों स्तरों पर कानून बनाने की संवैधानिक व्यवस्था मौजूद है। इसी वजह से विभिन्न राज्य अपने स्तर पर यूसीसी से संबंधित कानून और नियम तैयार कर रहे हैं।
किन राज्यों में आगे बढ़ी UCC की प्रक्रिया?

दिए गए स्रोत के अनुसार, उत्तराखंड, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश ने यूसीसी से जुड़े कानून पारित किए हैं। उत्तराखंड में यूसीसी 27 जनवरी 2025 से लागू है। इसमें विवाह, तलाक, विरासत और उत्तराधिकार से संबंधित समान नियमों के साथ बहुविवाह पर रोक और विवाह पंजीकरण जैसे प्रावधान शामिल हैं। लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण को लेकर भी इसमें नियम हैं।
गुजरात विधानसभा ने मार्च 2026 में यूसीसी बिल पारित किया। असम ने मई 2026 में और मध्य प्रदेश ने जुलाई 2026 में यूसीसी बिल पारित किया। इन राज्यों के कानूनों में विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के साथ अन्य संबंधित पारिवारिक विषयों को शामिल किया गया है। गोवा में अलग स्थिति है, जहां 1867 से समान सिविल कोड लागू है।
महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में क्या स्थिति है?
महाराष्ट्र सरकार ने भी यूसीसी की दिशा में प्रक्रिया शुरू की है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के अनुसार, सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति यूसीसी से जुड़ी सिफारिशों पर काम कर रही है। रिपोर्ट मिलने के बाद सरकार आगे की प्रक्रिया तय करेगी। पश्चिम बंगाल सरकार ने भी यूसीसी लागू करने की घोषणा की है और एक समिति ड्राफ्ट विधेयक की समीक्षा कर रही है।
एनडीए के सहयोगी दलों का क्या रुख है?
यूसीसी को लेकर एनडीए के भीतर पूरी तरह एक जैसी राय सामने नहीं आई है। जदयू ने व्यापक बातचीत और सभी संबंधित पक्षों से परामर्श की जरूरत बताई है। पार्टी नेता श्याम रजक ने बिहार में यूसीसी लागू करने का विरोध किया है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान ने भी जल्दबाजी के बजाय व्यापक चर्चा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समानता के साथ भारत की विविधता और अलग-अलग समुदायों की संवैधानिक सुरक्षा को भी ध्यान में रखना होगा।
आंध्र प्रदेश की एनडीए सहयोगी टीडीपी की ओर से भी कहा गया है कि फिलहाल यूसीसी पर विस्तृत चर्चा नहीं हुई है और जरूरत पड़ने पर हितधारकों से बातचीत के बाद रुख तय किया जाएगा।
विपक्ष ने क्या सवाल उठाए?
यूसीसी को लेकर विपक्षी नेताओं ने अलग-अलग आपत्तियां और सवाल उठाए हैं। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने आरोप लगाया है कि यूसीसी के जरिए मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा सकता है। उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों का हवाला दिया है।जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्यवार यूसीसी लागू करने की रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि इसका उद्देश्य पूरे देश में समान कानून लागू करना है, तो इसे संसद के माध्यम से लागू करने पर विचार होना चाहिए।











