भोजशाला विवाद पर बड़ा फैसला: हाईकोर्ट ने ASI की रिपोर्ट के आधार पर परिसर को घोषित किया मंदिर

भोजशाला विवाद में बड़ा फैसला सामने आया है। हाईकोर्ट ने ASI की रिपोर्ट के आधार पर परिसर को मंदिर घोषित किया है। जानें इस फैसले का कानूनी आधार, इतिहास और इसके सा

मध्य प्रदेश के धार स्थित Bhojshala Complex को लेकर चल रहे लंबे विवाद पर हाल ही में Madhya Pradesh High Court ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने टिप्पणी की कि पुरातात्विक (archaeological) व्याख्या किसी अनुमान पर नहीं, बल्कि एक बहु-विषयी वैज्ञानिक प्रक्रिया पर आधारित होती है।

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के धार स्थित Bhojshala Complex को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद अब एक अहम कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इस परिसर को मंदिर के रूप में मान्यता देते हुए कहा कि पुरातात्विक निष्कर्ष केवल अनुमान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और बहु-विषयी प्रक्रिया का परिणाम होते हैं।

यह निर्णय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की विस्तृत जांच रिपोर्ट के आधार पर लिया गया है, जिसमें परिसर के ऐतिहासिक और स्थापत्य साक्ष्यों का गहन अध्ययन किया गया था।

ASI की 2189 पेज रिपोर्ट बनी फैसले की आधारशिला

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India) ने हाईकोर्ट में 2189 पेज की विस्तृत रिपोर्ट पेश की थी। इस रिपोर्ट में बताया गया कि मौजूदा ढांचे के नीचे 10वीं–11वीं शताब्दी के परमारकालीन मंदिर निर्माण के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं। खुदाई में बेसाल्ट पत्थरों, प्राचीन ईंटों और मंदिर शैली की नींव संरचना की पहचान की गई, जो इस स्थल के धार्मिक महत्व को दर्शाती है।

रिपोर्ट के अनुसार, परिसर में कई संस्कृत शिलालेख मिले जिनमें इस स्थान को “शारदा सदन” कहा गया है। शारदा को देवी सरस्वती का रूप माना जाता है, जो ज्ञान और शिक्षा की प्रतीक हैं। यह संकेत इस बात की ओर इशारा करता है कि यह स्थल प्राचीन समय में एक धार्मिक और शैक्षणिक केंद्र रहा होगा।

साहित्य और संस्कृति का केंद्र था परिसर

एक महत्वपूर्ण प्रमाण साहित्यिक ग्रंथ “पारिजात मंजरी” से जुड़ा शिलालेख भी है, जिसमें उल्लेख मिलता है कि इस नाटक का पहला मंचन इसी सरस्वती मंदिर में हुआ था। यह तथ्य दर्शाता है कि यह परिसर केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि कला, साहित्य और नाट्य गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र रहा है। ASI की रिपोर्ट में 106 स्तंभ और 82 पिलास्टर पाए गए, जिन पर स्पष्ट रूप से हिंदू मंदिर वास्तुकला के निशान मौजूद हैं।

इनमें देवी-देवताओं की आकृतियां, पारंपरिक नक्काशी और मंदिर शैली के पैटर्न शामिल हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, कई स्तंभों को मूल संरचना से हटाकर बाद के निर्माण में पुनः उपयोग किया गया, जिससे उनकी दिशा और क्रम में असंगतता देखी गई।

शिलालेखों और पत्थरों के साथ छेड़छाड़ के संकेत

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि कई संस्कृत और प्राकृत शिलालेखों को जानबूझकर घिसा गया, ताकि उनका मूल अर्थ पढ़ा न जा सके। इसके अलावा कई पत्थरों को उल्टा या असंगत तरीके से लगाया गया, जिससे मूल संरचना को बदलने की कोशिश के संकेत मिलते हैं। ASI को कई स्तंभों और पत्थरों पर बनी मूर्तियों में क्षति के संकेत मिले हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, गणेश, नृसिंह, भैरव और अन्य देवी-देवताओं की आकृतियों को छेनी-हथौड़े से नुकसान पहुंचाया गया था। इसे मूल धार्मिक पहचान को मिटाने की कोशिश के रूप में देखा गया है।

150 से अधिक संस्कृत शिलालेखों की मौजूदगी

परिसर में कुल 150 से अधिक संस्कृत और प्राकृत शिलालेख मिले, जबकि अरबी और फारसी शिलालेखों की संख्या लगभग 56 बताई गई। रिपोर्ट के अनुसार, संस्कृत और प्राकृत शिलालेख अधिक प्राचीन हैं और मूल संरचना से सीधे जुड़े हुए हैं। स्तंभों पर कई पारंपरिक प्रतीक जैसे स्वास्तिक, त्रिशूल और चक्र चिह्न पाए गए।

ASI ने इन्हें उस समय के कारीगरों के निर्माण चिह्न या “सिग्नेचर मार्क” बताया, जो प्राचीन मंदिर स्थापत्य में आम तौर पर देखे जाते हैं। रिपोर्ट में परिसर से कुल 94 मूर्तियों और कलाकृतियों की पहचान की गई, जिनमें देवी-देवताओं की विभिन्न आकृतियां शामिल हैं। इनमें गणेश, ब्रह्मा, नृसिंह और भैरव की मूर्तियां प्रमुख हैं, जो हिंदू मंदिर परंपरा से जुड़ी मानी जाती हैं।

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