बिहार MLC चुनाव: दीपक प्रकाश का मंत्री पद बचना असंभव, एनडीए के भीतर रणनीति पर सवाल

बिहार MLC चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है। दीपक प्रकाश का मंत्री पद बचना मुश्किल माना जा रहा है, जिससे एनडीए की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं जानें पूरे राजनीतिक

Bharatiya Janata Party के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन में Bihar विधान परिषद चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नाम तय हो चुके हैं। नामांकन का अंतिम दिन 8 जून (सोमवार) होने के बीच राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।

पटना: बिहार विधान परिषद (MLC) चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। नामांकन की अंतिम तारीख पर बड़ा मोड़ तब आया जब उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और राज्य सरकार में मंत्री दीपक प्रकाश के चुनावी मैदान में उतरने से इनकार की खबर सामने आई। उनके नामांकन न करने के फैसले ने न सिर्फ एनडीए खेमे में हलचल बढ़ा दी है, बल्कि उनके मंत्री पद के भविष्य पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

नामांकन से दूरी, राजनीतिक समीकरण बदले

सूत्रों के अनुसार, बिहार विधान परिषद चुनाव के लिए एनडीए के भीतर सीटों और उम्मीदवारों को लेकर सहमति बन चुकी है, लेकिन दीपक प्रकाश को लेकर अंतिम समय तक असमंजस की स्थिति बनी रही। बताया जा रहा है कि उन्हें परिषद चुनाव के जरिए सदन की सदस्यता दिलाने का विकल्प भी विचाराधीन था, लेकिन सहमति नहीं बन सकी। इसी वजह से अब उनके नामांकन से बाहर रहने की स्थिति लगभग तय मानी जा रही है, जिससे उनकी मंत्री पद की वैधता पर सीधा असर पड़ सकता है।

दीपक प्रकाश वर्तमान में बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री हैं। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, कोई भी मंत्री जो विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, वह अधिकतम 6 महीने तक ही पद पर रह सकता है। इस अवधि के भीतर उन्हें किसी भी सदन की सदस्यता हासिल करनी होती है। दीपक प्रकाश ने 21 नवंबर 2025 को मंत्री पद की शपथ ली थी और 22 नवंबर को उन्हें विभागीय जिम्मेदारी दी गई थी। 

इस आधार पर 6 महीने की समयसीमा मई 2026 में पूरी हो चुकी है। ऐसे में यदि उन्हें अब विधान परिषद या किसी अन्य सदन की सदस्यता नहीं मिलती, तो उनका मंत्री बने रहना संवैधानिक रूप से संभव नहीं होगा।

एनडीए के भीतर रणनीति पर सवाल

सूत्रों का कहना है कि एनडीए नेतृत्व ने पहले उपेंद्र कुशवाहा को यह प्रस्ताव दिया था कि उनके बेटे को पार्टी के चुनाव चिन्ह पर विधान परिषद में भेजा जा सकता है। हालांकि, इस पर सहमति नहीं बन पाई, जिसके बाद नामांकन प्रक्रिया में उनका नाम आगे नहीं बढ़ सका। इस घटनाक्रम ने गठबंधन के भीतर रणनीतिक समन्वय और सीट बंटवारे की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

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