रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि पाकिस्तान ने नूर खान एयरबेस पर ईरानी सैन्य विमान छिपाए। इसी रनवे पर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का विमान उतरने से पाकिस्तान की भूमिका और विश्वसनीयता पर नए सवाल खड़े हो गए हैं।
इस्लामाबाद: दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति के बीच पाकिस्तान एक बार फिर विवादों में घिरता नजर आ रहा है। हालिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि भारत के कथित ब्रह्मोस मिसाइल हमलों के बाद पाकिस्तान ने अपने संवेदनशील सैन्य ठिकानों को बचाने के लिए नई रणनीति अपनाई। इसी दौरान नूर खान एयरबेस पर ईरानी सैन्य विमानों की मौजूदगी की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance का विमान भी उसी रनवे पर उतरा, जहां कथित तौर पर ईरानी विमान पार्क किए गए थे। इस घटनाक्रम ने पाकिस्तान की विदेश नीति और उसकी रणनीतिक विश्वसनीयता को लेकर बहस तेज कर दी है।
ईरानी विमानों को लेकर सामने आए दावे
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ईरान ने संभावित अमेरिकी या इजरायली हमलों से अपने सैन्य संसाधनों को सुरक्षित रखने के लिए कुछ विमानों को पाकिस्तान में अस्थायी तौर पर स्थानांतरित किया।
इन विमानों में टोही मिशनों में इस्तेमाल होने वाले RC-130 विमान का भी उल्लेख किया गया है। बताया जा रहा है कि इन्हें Noor Khan Airbase पर रखा गया था।
हालांकि पाकिस्तान के अधिकारियों ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि एयरबेस पर विदेशी विमानों की मौजूदगी केवल “डेलिगेशन लॉजिस्टिक्स” का हिस्सा थी। इसके बावजूद, इस मुद्दे ने वैश्विक रणनीतिक हलकों में चर्चा को जन्म दे दिया है।
आसिम मुनीर की भूमिका पर उठे सवाल
Asim Munir की भूमिका भी इस पूरे घटनाक्रम में चर्चा का केंद्र बनी हुई है। विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका के साथ अपने संबंध मजबूत बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर ईरान और चीन जैसे क्षेत्रीय साझेदारों के साथ भी करीबी बनाए हुए है।
इसी वजह से पाकिस्तान की विदेश नीति को “संतुलन साधने की कोशिश” के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह संतुलन अब पाकिस्तान के लिए चुनौती बनता जा रहा है।

ब्रह्मोस हमलों के बाद बढ़ी सुरक्षा चिंताएं
भारतीय सैन्य अभियानों के संदर्भ में पिछले वर्ष पाकिस्तान के कुछ सैन्य ठिकानों पर कथित हमलों की खबरें सामने आई थीं। इन्हीं में BrahMos मिसाइल का उल्लेख किया गया था।
नूर खान एयरबेस को पाकिस्तान के सबसे महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों में माना जाता है। ऐसे में इस एयरबेस पर विदेशी सैन्य विमानों की मौजूदगी ने पाकिस्तान की सुरक्षा तैयारियों और वायु रक्षा प्रणाली को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों पर असर संभव
अमेरिका लंबे समय से पाकिस्तान का रणनीतिक साझेदार रहा है। आतंकवाद विरोधी अभियानों, सैन्य सहयोग और आर्थिक सहायता के जरिए दोनों देशों के बीच गहरे संबंध रहे हैं।
लेकिन हालिया घटनाओं के बाद वाशिंगटन में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर संदेह बढ़ने की बात कही जा रही है। अमेरिकी राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या पाकिस्तान वास्तव में निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है या फिर क्षेत्रीय समीकरणों के अनुसार अपनी रणनीति बदल रहा है।
कुछ अमेरिकी नेताओं ने पाकिस्तान की “दोहरी नीति” पर चिंता जताई है और उसकी क्षेत्रीय भूमिका की समीक्षा की मांग की है।
चीन, ईरान और अमेरिका के बीच संतुलन की चुनौती
पाकिस्तान की विदेश नीति लंबे समय से कई शक्तियों के बीच संतुलन बनाने पर आधारित रही है। एक ओर उसका चीन के साथ आर्थिक और सैन्य सहयोग मजबूत है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ सीमा, ऊर्जा और सुरक्षा संबंध जुड़े हुए हैं।
साथ ही अमेरिका से मिलने वाली आर्थिक और सैन्य सहायता भी पाकिस्तान के लिए महत्वपूर्ण रही है। यही कारण है कि पाकिस्तान अक्सर खुद को क्षेत्रीय कूटनीति के केंद्र में बनाए रखने की कोशिश करता है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते वैश्विक हालात में यह संतुलन बनाए रखना पहले से अधिक कठिन हो गया है।
क्षेत्रीय राजनीति में बढ़ सकता है तनाव
विश्लेषकों का कहना है कि यदि ईरानी विमानों की मौजूदगी से जुड़े दावे सही साबित होते हैं, तो इससे अमेरिका, इजरायल और खाड़ी देशों के साथ पाकिस्तान के संबंध प्रभावित हो सकते हैं।
वहीं दूसरी ओर, यह घटनाक्रम दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की सुरक्षा राजनीति में नए तनाव को जन्म दे सकता है। फिलहाल पाकिस्तान इन आरोपों को खारिज कर रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे पर नजरें बनी हुई हैं।










