मदरसों में वंदे मातरम् पर कलकत्ता HC की टिप्पणी, कहा- गाने से आसमान नहीं टूटेगा

कलकत्ता हाईकोर्ट ने मदरसों में वंदे मातरम् गायन के मामले में मौखिक टिप्पणी की कि इसे गाने से आसमान नहीं टूट पड़ेगा। सरकार के आदेश को चुनौती दी गई है
मदरसों में वंदे मातरम् पर कलकत्ता HC की टिप्पणी, कहा- गाने से आसमान नहीं टूटेगा
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कोलकाता: पश्चिम बंगाल के मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ गाने को अनिवार्य किए जाने के मामले पर कलकत्ता हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत ने अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि अगर मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ गाया जाएगा तो ‘आसमान नहीं टूट पड़ेगा।’ यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें मदरसों में राष्ट्रगीत गाने की अनिवार्यता को चुनौती दी गई है।

मामला पश्चिम बंगाल सरकार के उस आदेश से जुड़ा है, जिसके तहत राज्य के मदरसों में कक्षाएं शुरू होने से पहले होने वाली प्रार्थना सभा में ‘वंदे मातरम्’ का गायन अनिवार्य किया गया है। मई 2026 में जारी निर्देश के मुताबिक यह व्यवस्था सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और मान्यता प्राप्त मदरसों पर लागू की गई थी।

इस आदेश के खिलाफ एक याचिका कलकत्ता हाईकोर्ट में दाखिल की गई। याचिकाकर्ता ने सरकार के निर्देश को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ का गायन अनिवार्य करना संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों से जुड़ा सवाल खड़ा करता है। याचिका में समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों का हवाला दिया गया है।

सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणी ने इस मामले को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया। कोर्ट ने सवाल किया कि यदि मदरसों में राष्ट्रगीत गाया जाता है तो इसमें ऐसी क्या समस्या है जिससे कोई बड़ा संकट पैदा हो जाएगा। इसी संदर्भ में अदालत की ओर से कहा गया कि ‘आसमान नहीं टूट पड़ेगा।’ हालांकि इस टिप्पणी को अदालत का अंतिम फैसला नहीं, बल्कि सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणी के तौर पर समझना जरूरी है।

विवाद की शुरुआत पश्चिम बंगाल सरकार के मई में जारी आदेश से हुई थी। सरकार ने राज्य के सभी संबंधित मदरसों में सुबह की असेंबली के दौरान ‘वंदे मातरम्’ का गायन अनिवार्य किया था। आदेश के तहत सरकारी मॉडल मदरसे, सरकारी सहायता प्राप्त मदरसे, मान्यता प्राप्त संस्थान और कुछ अन्य मान्यता प्राप्त मदरसा संस्थान शामिल किए गए थे।

सरकार के इस फैसले के पीछे स्कूलों और मदरसों में राष्ट्रीय गीत के गायन को लेकर एक समान व्यवस्था लागू करने की बात सामने आई थी। इससे पहले राज्य सरकार ने स्कूलों में भी ‘वंदे मातरम्’ के गायन को अनिवार्य किया था। इसके बाद यही व्यवस्था मदरसों तक लागू किए जाने से राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस शुरू हो गई।

राज्य सरकार के आदेश के अनुसार ‘वंदे मातरम्’ को कक्षाएं शुरू होने से पहले होने वाली असेंबली प्रार्थना का हिस्सा बनाया जाना था। रिपोर्टों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में मान्यता प्राप्त मदरसों में लाखों विद्यार्थी पढ़ते हैं। ऐसे में इस आदेश का प्रभाव बड़ी संख्या में छात्रों और शिक्षकों पर पड़ना था।

याचिकाकर्ता की ओर से इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई गई। याचिका में कहा गया कि किसी विशेष गीत को अनिवार्य रूप से गाने के लिए बाध्य करना व्यक्ति की अभिव्यक्ति और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a) और 25(1) का उल्लेख किया गया है।

दूसरी ओर, सरकार और उसके समर्थकों की ओर से ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत बताते हुए इसके सम्मान को देशभक्ति से जोड़ा गया है। सरकार का पक्ष रहा है कि यह किसी विशेष समुदाय के खिलाफ कदम नहीं है, बल्कि शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रीय भावना को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू किया गया निर्देश है।

मामले में धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के बीच संतुलन का सवाल भी उठ रहा है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति से जोड़कर देख रहा है, जबकि विरोध करने वालों का कहना है कि किसी भी व्यक्ति को धार्मिक या वैचारिक आधार पर अपनी अंतरात्मा के विरुद्ध कोई गीत गाने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।

यही वजह है कि कलकत्ता हाईकोर्ट में दाखिल याचिका को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत के सामने यह सवाल है कि राज्य सरकार द्वारा मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ को अनिवार्य करने का आदेश संवैधानिक कसौटी पर कितना टिकता है और इसके लागू होने का दायरा क्या होना चाहिए।

सुनवाई के दौरान अदालत की ‘आसमान नहीं टूट पड़ेगा’ वाली टिप्पणी के बाद यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया। हालांकि अदालत ने अभी अंतिम निर्णय सुनाया है या नहीं, इसे लेकर मौखिक टिप्पणी और अंतिम न्यायिक आदेश के बीच अंतर रखना जरूरी है। किसी भी मामले में अंतिम स्थिति अदालत के लिखित आदेश से स्पष्ट होती है।

यह विवाद केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में समय-समय पर स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत और अन्य देशभक्ति से जुड़े कार्यक्रमों को लेकर बहस होती रही है। सवाल यह रहता है कि राष्ट्रीय भावना को बढ़ावा देने के साथ-साथ व्यक्तिगत अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी का संतुलन कैसे बनाया जाए।

‘वंदे मातरम्’ भारत का राष्ट्रीय गीत है और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस गीत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने रचा था और बाद में यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख प्रतीकों में शामिल हुआ। इसके ऐतिहासिक महत्व के कारण इसे देश में विशेष सम्मान प्राप्त है।

हालांकि गीत के कुछ अंशों को लेकर धार्मिक आधार पर आपत्तियां भी लंबे समय से चर्चा का विषय रही हैं। इसी कारण शैक्षणिक संस्थानों में इसके अनिवार्य गायन को लेकर अलग-अलग समुदायों और संगठनों की राय एक जैसी नहीं रही है।

पश्चिम बंगाल में सरकार के आदेश के बाद मुस्लिम समुदाय के कुछ संगठनों और धार्मिक नेताओं ने भी आपत्ति जताई थी। कुछ संगठनों ने प्रशासन से आदेश पर पुनर्विचार करने की मांग की थी।

वहीं सरकार के समर्थकों ने इसे देश के सभी नागरिकों के लिए समान राष्ट्रीय जिम्मेदारी के तौर पर पेश किया। राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि देश के कानून और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान सभी को करना चाहिए।

इस पूरे विवाद में अब हाईकोर्ट की सुनवाई अहम हो गई है। यदि अदालत सरकार के आदेश को बरकरार रखती है तो मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ के अनिवार्य गायन की व्यवस्था आगे भी जारी रह सकती है। यदि अदालत आदेश में बदलाव या रोक लगाती है तो राज्य सरकार को अपनी नीति में संशोधन करना पड़ सकता है।

फिलहाल अदालत की टिप्पणी ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को जरूर तेज कर दिया है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चा में भी इस टिप्पणी को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। लेकिन कानूनी रूप से मामले की वास्तविक दिशा अदालत के विस्तृत आदेश और आगे की सुनवाई से ही स्पष्ट होगी।

इस मामले में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अदालत की मौखिक टिप्पणी को अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। सुनवाई के दौरान न्यायाधीश कई बार सवाल या टिप्पणी करते हैं ताकि मामले के विभिन्न पहलुओं को समझा जा सके। अंतिम अधिकारिक स्थिति आदेश में दर्ज निष्कर्षों से तय होती है।

मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर चल रही यह कानूनी लड़ाई आने वाले दिनों में धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से जुड़े व्यापक सवालों को भी सामने ला सकती है।

फिलहाल कलकत्ता हाईकोर्ट में इस मुद्दे पर सुनवाई जारी है और अदालत की टिप्पणी के बाद मामले में लोगों की दिलचस्पी बढ़ गई है। सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर आगे क्या फैसला आता है, इस पर सभी की नजर रहेगी।

 

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