हिमाचल में 55 लाख के मनरेगा घोटाले का आरोप, 22 अधिकारी जांच के घेरे में; कई कामों में मटेरियल नहीं लगाया

चंबा में मनरेगा के करीब 55 लाख रुपये के कथित घोटाले की जांच शुरू है। 22 अधिकारी दायरे में हैं और कई कार्यों में मटेरियल नहीं लगाने के आरोप हैं।
हिमाचल में 55 लाख के मनरेगा घोटाले का आरोप, 22 अधिकारी जांच के घेरे में; कई कामों में मटेरियल नहीं लगाया
Photo Credit / Attribution: Google

चंबा: हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में मनरेगा के तहत हुए कामों को लेकर करीब 55 लाख रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया है। मामले में विभागीय स्तर पर जांच आगे बढ़ाई जा रही है और 22 अधिकारियों व कर्मचारियों की भूमिका जांच के दायरे में बताई जा रही है। आरोप है कि मनरेगा के तहत स्वीकृत कई विकास कार्यों में रिकॉर्ड के अनुसार जिस तरह का मटेरियल इस्तेमाल होना चाहिए था, वह मौके पर नहीं लगाया गया। इसके बावजूद कामों के भुगतान और रिकॉर्ड से जुड़े सवाल उठ रहे हैं।

मनरेगा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने के साथ-साथ गांवों में सार्वजनिक उपयोग की परिसंपत्तियां तैयार करने की महत्वपूर्ण योजना है। हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में इसके तहत सड़क, रास्ते, नालियां, जल संरक्षण, भूमि विकास, सिंचाई और अन्य ग्रामीण विकास कार्य कराए जाते हैं। ऐसे में योजना के पैसे के इस्तेमाल में गड़बड़ी का आरोप सामने आने से प्रशासनिक स्तर पर भी मामला गंभीर माना जा रहा है। हिमाचल में मनरेगा के कामों में ऑनलाइन हाजिरी और डिजिटल निगरानी जैसी व्यवस्थाएं भी लागू हैं, जिनका उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना है।

मामले में सबसे बड़ा सवाल उन कार्यों को लेकर उठ रहा है, जिनके लिए मटेरियल की राशि स्वीकृत की गई थी। आरोप है कि कई जगह काम के लिए जरूरी सामग्री मौके पर नहीं लगाई गई, जबकि कागजों में उससे संबंधित खर्च दर्ज किया गया। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि स्वीकृत राशि का इस्तेमाल किस तरह किया गया और वास्तविक काम तथा सरकारी रिकॉर्ड में कितना अंतर है।

जांच के दायरे में आए 22 अधिकारियों और कर्मचारियों से संबंधित रिकॉर्ड भी खंगाले जा सकते हैं। इसमें कार्यों की स्वीकृति, तकनीकी मंजूरी, मस्टर रोल, भुगतान, मटेरियल की खरीद, बिल-वाउचर और मौके पर हुए निर्माण की स्थिति जैसी जानकारियां शामिल हो सकती हैं। यदि जांच में रिकॉर्ड और वास्तविक काम के बीच अंतर साबित होता है तो जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।

मनरेगा में मजदूरों को रोजगार देने के साथ-साथ निर्धारित मानकों के अनुसार काम कराना जरूरी होता है। किसी भी कार्य में मटेरियल की जरूरत होने पर उसके इस्तेमाल और खर्च का रिकॉर्ड रखा जाता है। इसलिए यदि किसी काम में मटेरियल का भुगतान हुआ लेकिन मौके पर वह सामग्री नहीं लगी, तो यह जांच का महत्वपूर्ण बिंदु बन जाता है।

चंबा जैसे पहाड़ी जिले में ग्रामीण विकास कार्यों के लिए मनरेगा का महत्व और अधिक है। जिले के कई गांव दुर्गम पहाड़ी इलाकों में बसे हैं, जहां सड़क, पैदल रास्ते, पानी और सिंचाई जैसी बुनियादी सुविधाओं की जरूरत बनी रहती है। मनरेगा के माध्यम से इन क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोजगार देने के साथ-साथ सामुदायिक परिसंपत्तियां विकसित की जाती हैं।

ऐसे में करीब 55 लाख रुपये की कथित गड़बड़ी का मामला केवल सरकारी राशि के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे उन ग्रामीण परिवारों के हित भी जुड़े हैं जिनके लिए मनरेगा रोजगार और विकास का महत्वपूर्ण माध्यम है। यदि किसी काम में निर्धारित सामग्री नहीं लगाई गई, तो उसका असर उस परिसंपत्ति की गुणवत्ता और उपयोगिता पर भी पड़ सकता है।

जांच में यह भी देखा जा सकता है कि जिन कार्यों में मटेरियल का इस्तेमाल दिखाया गया, वे वास्तव में कितने पूरे हुए। यदि कोई काम अधूरा है या मौके पर निर्धारित निर्माण दिखाई नहीं देता, तो संबंधित अधिकारियों और पंचायत स्तर के जिम्मेदार लोगों से जवाब मांगा जा सकता है।

चंबा में मनरेगा से जुड़े अनियमितताओं के मामले पहले भी सामने आते रहे हैं। दिसंबर 2025 में चुराह की एक ग्राम पंचायत में सेब पौधों की खरीद से जुड़े कथित घोटाले में पंचायत प्रतिनिधियों के खिलाफ कार्रवाई की खबर सामने आई थी। उस मामले की जड़ भी मनरेगा से वित्त पोषित पौधरोपण कार्यों में कथित अनियमितताओं की शिकायत से जुड़ी बताई गई थी।

इस पृष्ठभूमि में वर्तमान 55 लाख रुपये के मामले को लेकर जांच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। हालांकि किसी भी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका जांच पूरी होने से पहले अंतिम रूप से दोषी नहीं मानी जा सकती। जांच में सामने आने वाले दस्तावेज, मौके का निरीक्षण और संबंधित लोगों के बयान ही यह तय करेंगे कि वास्तव में किस स्तर पर अनियमितता हुई।

जांच टीम द्वारा मौके पर जाकर उन कार्यों का निरीक्षण किए जाने की संभावना है जिनमें मटेरियल के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठे हैं। मौके की स्थिति की तुलना सरकारी रिकॉर्ड से की जा सकती है। यदि दस्तावेजों में किसी सड़क, रास्ते, दीवार, नाली या अन्य निर्माण में सामग्री लगाने का उल्लेख है, तो निरीक्षण के दौरान यह देखा जाएगा कि वास्तविक निर्माण उसी अनुपात में हुआ या नहीं।

मस्टर रोल भी जांच का अहम हिस्सा हो सकता है। मनरेगा में मजदूरों की उपस्थिति और उनके काम के दिनों का रिकॉर्ड तैयार किया जाता है। इस रिकॉर्ड के आधार पर मजदूरी का भुगतान किया जाता है। इसलिए जांच में मजदूरों की हाजिरी, भुगतान और संबंधित कार्यों की वास्तविक स्थिति का मिलान किया जा सकता है।

इसके अलावा मटेरियल सप्लाई से जुड़े बिल और भुगतान की भी जांच महत्वपूर्ण होगी। यदि किसी कार्य में सीमेंट, रेत, बजरी, पाइप, पत्थर या अन्य सामग्री के लिए भुगतान दिखाया गया है, तो यह देखा जा सकता है कि सामग्री किस विक्रेता से खरीदी गई, कितनी मात्रा में खरीदी गई और उसका इस्तेमाल किस काम में हुआ।

ग्रामीण विकास कार्यों में गुणवत्ता बनाए रखना भी मनरेगा की महत्वपूर्ण शर्त है। केवल कागज पर काम पूरा दिखाना पर्याप्त नहीं होता। जिस परिसंपत्ति के निर्माण के लिए पैसा स्वीकृत किया गया है, उसका जमीन पर मौजूद होना और उपयोगी होना जरूरी है। इसलिए कथित घोटाले की जांच में सिर्फ पैसों का हिसाब ही नहीं, बल्कि काम की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण होगी।

22 अधिकारियों के जांच के दायरे में आने की खबर से विभागीय स्तर पर भी हलचल बढ़ सकती है। यदि जांच में किसी अधिकारी की लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा सकती है। वहीं यदि किसी स्तर पर सरकारी धन के दुरुपयोग के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं तो मामला आगे कानूनी कार्रवाई तक भी पहुंच सकता है।

प्रशासन के सामने चुनौती यह भी होगी कि जांच निष्पक्ष और दस्तावेजी आधार पर पूरी की जाए। सरकारी योजनाओं में वित्तीय अनियमितता के आरोप गंभीर होते हैं, लेकिन कार्रवाई से पहले रिकॉर्ड और मौके की वास्तविक स्थिति का सही मिलान जरूरी है।

चंबा के ग्रामीण इलाकों में मनरेगा से जुड़े हजारों परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित होते हैं। ऐसे में योजना में पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी है। यदि सरकारी धन का इस्तेमाल सही तरीके से होता है तो इससे एक तरफ ग्रामीण परिवारों को रोजगार मिलता है और दूसरी तरफ गांवों में स्थायी विकास कार्य तैयार होते हैं।

मनरेगा के कामों की निगरानी में पंचायत प्रतिनिधियों, तकनीकी कर्मचारियों और विभागीय अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। काम की मंजूरी से लेकर उसकी माप, भुगतान और अंतिम सत्यापन तक कई स्तरों पर प्रक्रिया होती है। इसी वजह से जांच में 22 अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर भी नजर रखी जा रही है।

मामले में यह भी देखा जा सकता है कि जिन कार्यों में अनियमितता का आरोप है, उनकी स्वीकृति कब मिली थी और काम कब शुरू हुआ। भुगतान किस तारीख को हुआ और उस समय काम की स्थिति क्या थी, इसका रिकॉर्ड भी जांच का हिस्सा हो सकता है।

यदि जांच में यह सामने आता है कि बिना मटेरियल लगाए भुगतान किया गया, तो संबंधित अधिकारियों से यह पूछा जा सकता है कि उन्होंने कार्य का सत्यापन किस आधार पर किया। इसी तरह यदि मटेरियल खरीदा गया था लेकिन मौके पर इस्तेमाल नहीं हुआ, तो सामग्री की आपूर्ति और भंडारण से जुड़े रिकॉर्ड की भी जांच हो सकती है।

हिमाचल में मनरेगा के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर काम कराया जाता है। हाल के वर्षों में राज्य में मनरेगा के तहत रोजगार और ग्रामीण विकास कार्यों को लेकर कई चर्चाएं हुई हैं। राज्य सरकार ने भी मनरेगा से जुड़े मुद्दों और नई ग्रामीण रोजगार योजना को लेकर अपनी चिंताएं केंद्र के सामने रखी हैं।

ऐसे समय में चंबा से सामने आया कथित 55 लाख रुपये का मामला योजना के स्थानीय क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करता है। हालांकि यह भी जरूरी है कि जांच पूरी होने से पहले इसे अंतिम रूप से घोटाला घोषित करने के बजाय इसे कथित वित्तीय अनियमितता के रूप में देखा जाए।

ग्रामीणों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन कार्यों के लिए पैसा स्वीकृत हुआ था, वे जमीन पर दिखाई दें और लंबे समय तक उपयोगी रहें। अगर किसी सड़क, रास्ते, जल संरक्षण संरचना या अन्य सार्वजनिक परिसंपत्ति के निर्माण में मटेरियल का इस्तेमाल नहीं हुआ, तो उसका नुकसान सीधे ग्रामीणों को उठाना पड़ सकता है।

जांच में अगर आरोप सही पाए जाते हैं तो सरकारी धन की वसूली और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। वहीं यदि जांच में आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो संबंधित अधिकारियों को भी राहत मिल सकती है। इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगा।

फिलहाल 55 लाख रुपये की कथित अनियमितता और 22 अधिकारियों के जांच के दायरे में आने की खबर ने चंबा के मनरेगा कार्यों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासन की जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि किन-किन कार्यों में गड़बड़ी हुई, कितना पैसा नियमों के मुताबिक खर्च हुआ और किन मामलों में मटेरियल का इस्तेमाल नहीं किया गया।

मामले की जांच आगे बढ़ने के साथ उन लोगों की जिम्मेदारी भी सामने आ सकती है जिन्होंने कार्यों की निगरानी, माप और भुगतान प्रक्रिया में भूमिका निभाई। यदि जांच में ठोस सबूत मिलते हैं तो दोषियों पर नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।

फिलहाल चंबा में मनरेगा से जुड़े इस मामले पर ग्रामीणों और संबंधित विभाग की नजर बनी हुई है। करीब 55 लाख रुपये की कथित अनियमितता, कई कार्यों में मटेरियल नहीं लगाए जाने के आरोप और 22 अधिकारियों के जांच के दायरे में आने से मामला गंभीर हो गया है। अब जांच रिपोर्ट से ही यह साफ होगा कि सरकारी धन के इस्तेमाल में वास्तविक गड़बड़ी कितनी हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।

Leave a comment