Census 2027 में दिव्यांग लोगों की सही संख्या दर्ज किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। दिव्यांग अधिकार संगठनों और कार्यकर्ताओं का कहना है कि जनगणना में दिव्यांगता के लिए प्रस्तावित 9 श्रेणियां देश में कानून के तहत मान्य सभी 21 दिव्यांगताओं को स्पष्ट रूप से नहीं दर्शाती हैं।
नई दिल्ली: भारत में होने वाली जनगणना 2027 में दिव्यांग लोगों की सही संख्या दर्ज किए जाने को लेकर अधिकार संगठनों ने चिंता जताई है। दिव्यांगता अधिकार समूहों का कहना है कि जनगणना के लिए प्रस्तावित दिव्यांगता संबंधी 9 श्रेणियां Rights of Persons with Disabilities (RPwD) Act, 2016 के तहत मान्य सभी 21 दिव्यांगताओं को पर्याप्त रूप से दर्ज नहीं कर पाएंगी। संगठनों को आशंका है कि इससे कई दिव्यांग समूहों की वास्तविक संख्या सरकारी आंकड़ों में स्पष्ट रूप से सामने नहीं आएगी।
नेशनल प्लेटफॉर्म फॉर द राइट्स ऑफ द डिसेबल्ड की ओर से जारी बयान पर 405 लोगों के हस्ताक्षर होने की बात कही गई है। बयान में मांग की गई है कि Census 2027 में देश के कानून के तहत मान्यता प्राप्त सभी 21 दिव्यांगताओं को उचित तरीके से दर्ज करने की व्यवस्था की जाए।
9 श्रेणियों को लेकर क्या है आपत्ति?
दिव्यांग अधिकार संगठनों के अनुसार, प्रस्तावित ढांचे में दिव्यांगता को नौ व्यापक श्रेणियों में रखा गया है। इनमें देखने, सुनने, बोलने, चलने-फिरने, बौद्धिक दिव्यांगता, मानसिक बीमारी, एसिड अटैक से संबंधित दिव्यांगता, लंबे समय से रहने वाली न्यूरोलॉजिकल स्थितियां और रक्त संबंधी विकार जैसी श्रेणियां शामिल हैं।
संगठनों का तर्क है कि इतनी व्यापक श्रेणियों में अलग-अलग प्रकार की दिव्यांगताओं को एक साथ रखने से प्रत्येक समूह की वास्तविक स्थिति अलग से सामने नहीं आएगी। इसका असर भविष्य में सरकारी योजनाओं और नीतियों की योजना बनाने पर पड़ सकता है।
इन दिव्यांगताओं को लेकर चिंता

अधिकार समूहों ने विशेष रूप से उन दिव्यांगताओं का उल्लेख किया है, जिनकी अलग पहचान जनगणना के आंकड़ों में पर्याप्त रूप से सामने न आने की आशंका है। इनमें ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर, स्पेसिफिक लर्निंग डिसएबिलिटी, बौनापन, कुष्ठ रोग से ठीक हुए लोग, सेरेब्रल पाल्सी, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, मल्टीपल स्क्लेरोसिस और पार्किंसन जैसी स्थितियां शामिल हैं।
इसके अलावा कई दिव्यांगताओं वाले लोगों, जिनमें डेफब्लाइंडनेस यानी सुनने और देखने दोनों से संबंधित दिव्यांगता वाले व्यक्ति भी शामिल हैं, की पहचान को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। संगठनों का कहना है कि अलग-अलग दिव्यांगताओं की प्रकृति और जरूरतें अलग होती हैं। इसलिए केवल बड़ी श्रेणियों में उन्हें शामिल करने से नीति निर्माताओं को प्रत्येक समूह की वास्तविक आवश्यकताओं का स्पष्ट आकलन नहीं मिल पाएगा।
RPwD Act में 21 दिव्यांगताएं मान्य
RPwD Act, 2016 भारत में दिव्यांगता की कानूनी पहचान का प्रमुख आधार है। इस कानून के तहत मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं की संख्या पहले की तुलना में बढ़ाकर 21 की गई थी। अधिकार संगठनों की मुख्य मांग यही है कि Census 2027 में दिव्यांगता संबंधी सवालों और वर्गीकरण को इस कानूनी ढांचे के अनुरूप तैयार किया जाए, ताकि कोई भी मान्यता प्राप्त समूह आधिकारिक आंकड़ों में अदृश्य न रह जाए।
Census 2027 में अभी क्या है स्थिति?
केंद्र सरकार ने मार्च 2026 में बताया था कि Census 2027 दो चरणों में आयोजित की जाएगी। पहले चरण में मकानों की सूची और आवास संबंधी जानकारी जुटाई जाएगी, जबकि दूसरे चरण में आबादी की गणना की जाएगी। दिव्यांगता से जुड़े सवाल दूसरे चरण की जनगणना से संबंधित होंगे। सरकार ने पहले ही संकेत दिया है कि दूसरे चरण में पूछे जाने वाले सवालों को बाद में अंतिम रूप देकर जारी किया जाएगा। ऐसे में दिव्यांगता संबंधी प्रश्नावली में अंतिम रूप से कौन-कौन से विकल्प शामिल होते हैं, यह अभी महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है।
दिव्यांग लोगों की सटीक संख्या और उनकी दिव्यांगता के प्रकार से जुड़े विश्वसनीय आंकड़े सरकार के लिए नीति निर्माण में महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे आंकड़ों की मदद से शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा, सार्वजनिक परिवहन और अन्य सुविधाओं को जरूरत के मुताबिक तैयार किया जा सकता है।अधिकार संगठनों का कहना है कि यदि किसी समुदाय या दिव्यांगता समूह की संख्या सही तरीके से दर्ज नहीं होगी, तो उसके लिए आवश्यक संसाधनों और योजनाओं का अनुमान भी सटीक नहीं हो सकेगा।
2011 की जनगणना में भारत में करीब 2.68 करोड़ दिव्यांग लोगों की पहचान दर्ज की गई थी। अब Census 2027 को लेकर अधिकार समूह चाहते हैं कि पिछली जनगणना की तुलना में अधिक विस्तृत और समावेशी आंकड़े जुटाए जाएं।











