ऑस्ट्रेलिया के पूर्व चीन राजदूत ग्राहम फ्लेचर ने मॉरिसन सरकार की बीजिंग नीति की आलोचना करते हुए कहा कि कुछ गठबंधन सांसद चीन के निशाने पर आने से लगभग खुश थे। उन्होंने शी जिनपिंग के बढ़ते वैचारिक नियंत्रण को चीन की अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम बताया।
केनबरा: ऑस्ट्रेलिया के चीन में पूर्व राजदूत ग्राहम फ्लेचर ने चीन के दबाव और तत्कालीन मॉरिसन सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि गठबंधन सरकार के कुछ सांसद बीजिंग की ओर से निशाना बनाए जाने को लेकर “लगभग खुश” नजर आते थे और चीन की 14 शिकायतों की सूची को बार-बार सामने रखते थे। फ्लेचर ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में देश की बदलती राजनीतिक और आर्थिक दिशा पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि चीन में बढ़ता वैचारिक नियंत्रण और सरकारी दखल देश की उद्यमशीलता तथा आर्थिक विकास पर दबाव डाल सकता है।
मॉरिसन सरकार की चीन नीति पर पूर्व राजदूत की आलोचना
ग्राहम फ्लेचर ऑस्ट्रेलिया के अनुभवी चीन विशेषज्ञों में शामिल रहे हैं। उन्होंने 2019 से 2023 तक बीजिंग में ऑस्ट्रेलिया के राजदूत के रूप में काम किया। उनका कार्यकाल उस दौर में रहा, जब 2020-21 में ऑस्ट्रेलिया और चीन के संबंध बेहद खराब हुए और बाद में 2022 में लेबर पार्टी की सरकार आने के बाद दोनों देशों के रिश्तों में स्थिरता लाने की प्रक्रिया शुरू हुई। फ्लेचर ने ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के अकादमिक डैरेन लिम द्वारा होस्ट किए गए ‘ऑस्ट्रेलिया इन द वर्ल्ड’ पॉडकास्ट में चीन के साथ उस समय के विवाद और ऑस्ट्रेलियाई सरकार की रणनीति पर चर्चा की।
उन्होंने कहा कि चीन की ओर से ऑस्ट्रेलिया पर दबाव डाला जाना अपने आप में बीजिंग के लिए एक तरह की रणनीतिक गलती थी। हालांकि, उनका मानना है कि ऑस्ट्रेलिया में कुछ नेताओं और राजनेताओं ने इस टकराव को खत्म करने के बजाय उसे राजनीतिक रूप से इस्तेमाल किया।
कोविड जांच की मांग के बाद बिगड़े रिश्ते
ऑस्ट्रेलिया और चीन के संबंधों में 2020 में उस समय बड़ा तनाव पैदा हुआ, जब तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई विदेश मंत्री मैरिस पेन ने कोविड-19 महामारी की उत्पत्ति को लेकर अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की थी। इसके बाद चीन ने मॉरिसन सरकार के मंत्रियों से संपर्क सीमित कर दिया। साथ ही ऑस्ट्रेलिया से होने वाले कई अरब डॉलर के निर्यात पर टैरिफ और अन्य व्यापारिक प्रतिबंध लगाए गए।
तनाव के चरम दौर में चीनी दूतावास के अधिकारियों ने ऑस्ट्रेलियाई मीडिया के सामने 14 शिकायतों की एक सूची रखी थी। इसमें चीन से जुड़े निवेश पर लगाए गए प्रतिबंध, चीन की आलोचना करने वाले थिंक टैंक के लिए सरकारी फंडिंग और विदेशी हस्तक्षेप से जुड़े ऑस्ट्रेलियाई कानूनों सहित कई मुद्दे शामिल थे। फ्लेचर ने हालांकि इस सूची को चीन सरकार की ओर से जारी कोई औपचारिक मांग-पत्र मानने से इनकार किया। उनके मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया में नेताओं और टिप्पणीकारों ने इस सूची को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया।
‘संघर्ष को और गहरा करने’ से बचने की सलाह
फ्लेचर ने कहा कि चीन द्वारा जारी की गई शिकायतों की सूची को ऑस्ट्रेलिया के कुछ राजनेताओं ने इस तरह पेश किया, जैसे वे चीन के साथ टकराव को राजनीतिक उपलब्धि के रूप में देख रहे हों।
उन्होंने कहा कि पिछली सरकार में कुछ लोगों में चीन की ओर से खुद को निशाना बनाए जाने को लेकर “लगभग खुशी” का भाव था। उनके अनुसार, कुछ नेताओं ने चीन की शिकायतों की सूची को सार्वजनिक मंचों पर बार-बार प्रदर्शित किया।
फ्लेचर ने संकेत दिया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने विदेशों में अन्य नेताओं के साथ बैठकों के दौरान भी इस सूची को दिखाया था। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि उन्हें सुनने में आया था कि सरकार के एक सदस्य ने सूची को लैमिनेट करवा लिया था और विदेश यात्राओं के दौरान उसे दूसरे लोगों को दिखाया करता था।
फ्लेचर के मुताबिक, इस तरह की रणनीति दोनों देशों को उस स्थिति में और गहराई तक ले जाती है, जहां से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।
2022 के चुनाव से रिश्तों को मिला ‘सर्किट ब्रेकर’
पूर्व राजदूत के अनुसार, 2022 में ऑस्ट्रेलिया में लेबर पार्टी की चुनावी जीत ने दोनों देशों के रिश्तों को दोबारा व्यवस्थित करने का अवसर दिया। उन्होंने इसे एक तरह का “सर्किट ब्रेकर” बताया, जिससे ऑस्ट्रेलिया और चीन दोनों पक्ष बिना अपनी प्रतिष्ठा खोए संबंधों को रीसेट करने की दिशा में आगे बढ़ सके।

फ्लेचर ने कहा कि इसके लिए दोनों पक्षों को कुछ समझौते करने पड़े। उनके अनुसार, ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसे लोग थे जो चीन को हराना, शर्मिंदा करना या पराजित देखना चाहते थे। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों से सार्वजनिक रूप से माफी या पिछली स्थिति को स्वीकार करने की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं था।
शी जिनपिंग के चीन पर भी उठाए सवाल
फ्लेचर ने सिर्फ ऑस्ट्रेलिया की तत्कालीन चीन नीति की आलोचना नहीं की, बल्कि मौजूदा चीन की राजनीतिक और आर्थिक दिशा पर भी अपनी राय रखी।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन में राजनीतिक नियंत्रण और वैचारिक सोच पर अधिक जोर दिखाई देता है। उनके अनुसार, इससे देश नई सोच और वैकल्पिक दृष्टिकोण के लिए अपेक्षाकृत सीमित जगह वाला वातावरण तैयार कर रहा है।
फ्लेचर ने अपने चीन में शुरुआती अनुभवों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने 1980 के दशक में चीन में काम किया था, तब देश अपनी अर्थव्यवस्था को खोलने की दिशा में आगे बढ़ रहा था। उस समय चीनी अधिकारी नई सोच के प्रति काफी खुले थे और विदेशी लोगों से विचारों का आदान-प्रदान करने के इच्छुक रहते थे।
सरकारी नियंत्रण को बताया आर्थिक जोखिम
फ्लेचर ने मौजूदा चीन में वैचारिक और सरकारी नियंत्रण को आर्थिक विकास के लिए संभावित चुनौती बताया।
उनके अनुसार, शी जिनपिंग की वैचारिक नियंत्रण और अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका को लेकर प्राथमिकता की एक कीमत चुकानी पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि चीन ने उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन अपनी उपलब्धियों से अत्यधिक संतुष्ट होने की स्थिति उसे अपनी कमियों और संभावित सुधारों पर पर्याप्त ध्यान देने से रोक सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि चीन को अपनी मौजूदा धारणाओं को लगातार चुनौती देने की जरूरत है। उनके अनुसार, अगर चीन अधिक खुले दिमाग से काम करे तो वह अपनी मौजूदा क्षमता से कहीं बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।
जोखिम लेने से पीछे हट रहे कारोबारी?
पूर्व राजदूत ने चीन की अर्थव्यवस्था और समाज में अभी भी ऊर्जा और गतिशीलता मौजूद होने की बात कही। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि वैचारिक कठोरता धीरे-धीरे आर्थिक व्यवस्था और विकास पर दबाव डाल सकती है। उनके मुताबिक, प्रचार और विचारधारा पर अत्यधिक जोर लोगों की सोच और काम करने की स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है। सरकारी अधिकारी, सरकारी कंपनियां और निजी उद्यमी अपने फैसलों में अधिक जोखिम से बचने लगते हैं, क्योंकि उन्हें यह चिंता रहती है कि सरकार की तय दिशा से अलग जाने पर उसके नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं।
फ्लेचर की टिप्पणी ऐसे समय में सामने आई है, जब ऑस्ट्रेलिया और चीन के बीच संबंधों में पहले के मुकाबले स्थिरता लाने की कोशिशें हुई हैं। उनकी टिप्पणियां एक तरफ ऑस्ट्रेलिया की पिछली चीन नीति की समीक्षा करती हैं, वहीं दूसरी तरफ चीन के भीतर बढ़ते राजनीतिक और वैचारिक नियंत्रण के संभावित आर्थिक प्रभावों पर भी सवाल उठाती हैं।
चीन-ऑस्ट्रेलिया संबंधों पर बहस जारी
पूर्व राजदूत की टिप्पणियां बताती हैं कि चीन के साथ संबंधों को लेकर ऑस्ट्रेलिया में रणनीति और प्राथमिकताओं पर बहस अभी भी जारी है। एक ओर बीजिंग के दबाव और व्यापारिक प्रतिबंधों का सामना करने की नीति रही, तो दूसरी ओर दोनों देशों के बीच तनाव कम करने और आर्थिक संबंधों को स्थिर करने की कोशिशें भी हुईं।
फ्लेचर का तर्क है कि किसी भी पक्ष के लिए लंबे समय तक टकराव की स्थिति में बने रहना फायदेमंद नहीं है। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की पिछली सरकार के कुछ नेताओं पर चीन के साथ विवाद को जरूरत से ज्यादा राजनीतिक रूप देने का आरोप लगाया, जबकि चीन के मौजूदा राजनीतिक मॉडल में भी उन्होंने ऐसी कठोरता देखी, जो उनके मुताबिक देश की आर्थिक संभावनाओं को प्रभावित कर सकती है।











