Suryakant ने हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर दिलचस्प टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि 'न्याय भले ही अंधा होता है, लेकिन उसमें हास्य-बोध भी होता है, और यही चीज उसे और अधिक मानवीय बनाती है।'
नई दिल्ली: Justice Surya Kant ने न्याय व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण और मानवीय दृष्टिकोण पेश किया है। उन्होंने कहा कि अदालतें केवल कानून लागू करने की जगह नहीं हैं, बल्कि वहां इंसानी भावनाएं, अनुभव और कभी-कभी हास्य भी मौजूद रहता है। यह टिप्पणी उन्होंने एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान दी, जहां देश की शीर्ष न्यायिक और कानूनी हस्तियां मौजूद थीं।
“न्याय भले ही अंधा हो, लेकिन उसमें हास्य भी होता है”
कार्यक्रम में बोलते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि प्रसिद्ध कहावत “न्याय भले ही अंधा हो” को अक्सर गंभीरता से देखा जाता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि न्याय प्रणाली में हास्य और मानवीय संवेदनाएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा कि अदालतें ऐसी जगह हैं, जहां कानून और जीवन दोनों का मेल होता है और हर निर्णय के पीछे एक इंसानी कहानी होती है।
सॉलिसिटर जनरल की किताबों का विमोचन
यह बयान Tushar Mehta की दो पुस्तकों के विमोचन समारोह के दौरान आया। इनमें शामिल हैं:
- The Bench, The Bar and The Bizarre: The Curious and Extraordinary in Law
- The Lawful and the Awful: Quirky Tales from the World of Law
सीजेआई ने इन पुस्तकों की सराहना करते हुए कहा कि ये किताबें कानून की दुनिया को एक अलग और मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती हैं।
“कोर्टरूम कानून और थिएटर का संगम है”
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अपने संबोधन में जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कोर्टरूम एक ऐसा स्थान है जहां कानून और नाटकीयता का अनोखा मिश्रण देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि जज, वकील और सभी पक्ष अपने-अपने तरीके से न्याय प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं—जहां कभी गंभीरता होती है तो कभी हल्के-फुल्के क्षण भी सामने आते हैं। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि अदालतों में मौजूद हास्य का उद्देश्य किसी का मजाक उड़ाना नहीं होता, बल्कि यह प्रक्रिया को मानवीय बनाने और समझने का एक तरीका है।
उन्होंने कहा कि यह हास्य हमें यह याद दिलाता है कि कानून केवल नियमों का समूह नहीं है, बल्कि यह लोगों के जीवन से जुड़ा एक जीवंत तंत्र है।सीजेआई सूर्यकांत ने जोर देकर कहा कि हर न्यायिक निर्णय के पीछे एक इंसान होता है, जिसकी अपनी सीमाएं, अनुभव और भावनाएं होती हैं। उन्होंने कहा कि कानून केवल आदेशों और दलीलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवीय व्यवहार और सामाजिक वास्तविकताओं से भी जुड़ा हुआ है।
“कोर्टरूम एक जीवंत मंच है”
अपने विचारों को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि अदालतें एक तरह का जीवंत मंच हैं, जहां हर व्यक्ति अपनी भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा, जज गंभीरता और निष्पक्षता के साथ निर्णय देते हैं, वकील तर्क और प्रस्तुति के साथ अपनी बात रखते हैं और पूरी प्रक्रिया न्याय के व्यापक उद्देश्य की ओर बढ़ती है. इस कार्यक्रम में कई प्रमुख हस्तियां मौजूद थीं, जिनमें Amit Shah और R. Venkataramani भी शामिल थे। सभी ने न्यायपालिका और कानून से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार साझा किए।








