न्यायिक कार्य में करुणा और संवेदनशीलता के महत्व पर जोर देते हुए भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने सोमवार को कहा कि कानून का पहला दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि जिन लोगों पर वह लागू होता है, वे उसे समझ सकें।
CJI Surya Kant: भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने न्याय व्यवस्था में करुणा, संवेदनशीलता और आम लोगों की समझ को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि कानून सिर्फ लागू करने की व्यवस्था नहीं होना चाहिए, बल्कि जिन लोगों पर वह लागू होता है, उनकी परिस्थितियों को भी समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि कानून की पहली जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि लोग उसे समझ सकें और कानून भी उनकी वास्तविक स्थिति को समझे।
सीजेआई सूर्यकांत ने सोमवार को आयोजित दूसरे प्रो. (डॉ.) एन. आर. माधव मेनन स्मृति व्याख्यानमाला में न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि न्याय देने की प्रक्रिया में मानवीय पक्ष को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, अदालतों और न्यायिक संस्थाओं को कानून की व्याख्या के साथ-साथ उन लोगों की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए जो न्याय पाने के लिए व्यवस्था के सामने आते हैं।
करुणा का मतलब सहानुभूति या दया नहीं
सीजेआई ने स्पष्ट किया कि न्याय व्यवस्था में करुणा का अर्थ किसी एक पक्ष के प्रति भावनात्मक सहानुभूति दिखाना या किसी को दान देना नहीं है। करुणा का वास्तविक अर्थ किसी मामले के पीछे छिपी पूरी मानवीय परिस्थिति को समझने की कोशिश करना है। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश के लिए यह एक अनुशासित दृष्टिकोण होना चाहिए।
किसी मामले में शामिल व्यक्ति की सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों को समझना न्याय की प्रक्रिया को अधिक मानवीय बना सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि करुणा का इस्तेमाल विवेक के स्थान पर नहीं किया जा सकता। सीजेआई के मुताबिक विवेक के बिना करुणा मनमाने फैसलों की वजह बन सकती है, जबकि करुणा के बिना विवेक न्याय को महज एक औपचारिक प्रक्रिया में बदल सकता है। इसलिए दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
पुलिस थाने में ही कानूनी सहायता की जरूरत

प्रधान न्यायाधीश ने कानूनी सहायता को आम लोगों तक शुरुआती स्तर पर पहुंचाने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि पुलिस थाने में ही कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य यह हो सकता है कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई की शुरुआत से ही अपने अधिकारों और उपलब्ध विकल्पों की जानकारी मिल सके। इससे न्याय व्यवस्था को आम नागरिक के लिए अधिक सुलभ और समझने योग्य बनाने में मदद मिल सकती है।
बच्चों और पीड़ितों के लिए सुरक्षित गवाही की व्यवस्था
सीजेआई सूर्यकांत ने बच्चों और पीड़ितों से जुड़े मामलों में संवेदनशील प्रक्रिया अपनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने ऐसी व्यवस्था विकसित करने की बात कही, जिसमें कोई बच्चा या पीड़ित व्यक्ति आरोपी के सीधे सामने आए बिना अपनी गवाही दर्ज करा सके। ऐसी व्यवस्था विशेष रूप से संवेदनशील मामलों में पीड़ित या बच्चे के मानसिक दबाव को कम करने में मदद कर सकती है। साथ ही, इससे न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उनके अनुभव को अधिक सुरक्षित तरीके से दर्ज किया जा सकता है।
फैसलों की भाषा आसान बनाने पर जोर
प्रधान न्यायाधीश ने न्यायिक फैसलों की भाषा को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने ऐसे फैसले लिखने की आवश्यकता बताई जिन्हें मुकदमे में शामिल आम लोग स्वयं पढ़कर समझ सकें। कानूनी फैसलों में इस्तेमाल होने वाली जटिल भाषा अक्सर सामान्य नागरिक के लिए समझना मुश्किल होती है। ऐसे में सरल और स्पष्ट भाषा में निर्णय लिखने से न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ सकती है और लोगों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि अदालत ने किस आधार पर फैसला दिया।
सीजेआई ने कहा कि करुणा और संवेदनशीलता का दायरा सिर्फ अदालत में मौजूद पक्षों तक सीमित नहीं होना चाहिए। न्याय व्यवस्था को उन लोगों की परेशानियों पर भी ध्यान देना चाहिए जो सीधे अदालत में दिखाई नहीं देते, लेकिन किसी कानूनी प्रक्रिया से प्रभावित होते हैं। इनमें लैंगिक हिंसा से बचे लोग, विचाराधीन कैदियों के परिवार और दिव्यांग व्यक्ति जैसे वर्ग शामिल हो सकते हैं। उनकी परिस्थितियों को समझना भी न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी का हिस्सा है।












