पर्यावरण और पारिस्थितिकी की सुरक्षा में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका का जिक्र करते हुए CJI सूर्यकांत ने शनिवार को शीर्ष अदालत को पर्यावरण न्याय का ‘बरगद का पेड़’ बताया। उन्होंने कहा कि संरक्षण और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
Environmental Justice: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को पर्यावरण न्याय का ‘बरगद का पेड़’ बताते हुए कहा कि संरक्षण और विकास को एक-दूसरे के विरोधी के तौर पर देखने के बजाय दोनों को साथ लेकर चलने की जरूरत है। उनका कहना था कि पर्यावरण से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य विकास को रोकना नहीं, बल्कि उसे ऐसी शर्तों और जवाबदेही के साथ आगे बढ़ाना होना चाहिए, जिससे पारिस्थितिकी की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सके।
जस्टिस सूर्यकांत ने यह बात नई दिल्ली में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स’ के उद्घाटन सत्र में कही। 19 और 20 सितंबर को आयोजित इस सम्मेलन में विभिन्न देशों के न्यायिक प्रतिनिधियों के साथ वैज्ञानिक, पर्यावरण विशेषज्ञ, नीति निर्माता और अन्य हितधारक शामिल हुए। NGT के अनुसार सम्मेलन का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय शासन, जैव विविधता, जलवायु न्याय और टिकाऊ विकास से जुड़े मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विचार-विमर्श करना है।
संविधान से न्यायिक व्याख्या तक पर्यावरण संरक्षण
CJI सूर्यकांत ने कहा कि भारतीय संविधान में पर्यावरण की रक्षा के लिए कई प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन संवैधानिक प्रावधानों का प्रभाव उनकी व्याख्या और क्रियान्वयन से मजबूत होता है। उन्होंने न्यायपालिका की भूमिका को ऐसे माध्यम के रूप में बताया, जिसने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों को व्यवहारिक न्यायशास्त्र में विकसित करने में योगदान दिया है।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की भूमिका को ‘बरगद’ के रूपक से समझाया। उनके मुताबिक इसकी जड़ें भारत की सभ्यतागत प्रकृति-सम्बंधी सोच में हैं, जबकि इसकी शाखाएं वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा से जुड़ी हैं। इस दृष्टिकोण में पर्यावरण संरक्षण को केवल मौजूदा पीढ़ी की जरूरत नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के हित से भी जोड़ा गया है।
विकास बनाम संरक्षण नहीं, दोनों के बीच संतुलन

मुख्य न्यायाधीश ने पर्यावरणीय मामलों में बदलती न्यायिक सोच का उल्लेख करते हुए कहा कि अब सवाल केवल यह नहीं है कि विकास और संरक्षण में से किसे चुना जाए। चुनौती यह है कि दोनों के बीच ऐसा संतुलन कैसे बनाया जाए, जिसमें आर्थिक और सामाजिक विकास के साथ प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा भी कायम रहे।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि पर्यावरणीय नुकसान का प्रभाव अक्सर किसी एक परियोजना या सीमित क्षेत्र तक नहीं रहता। जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिक क्षरण के मामलों में व्यापक और संचयी प्रभावों को समझना जरूरी है। इसी कारण पर्यावरणीय विवादों की न्यायिक समीक्षा में वैज्ञानिक जानकारी और व्यापक पारिस्थितिक संदर्भ की भूमिका बढ़ रही है।
अनुच्छेद 21 और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार
भारत में पर्यावरणीय न्यायशास्त्र के विकास में संविधान के अनुच्छेद 21 की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में जीवन के अधिकार की व्याख्या के दायरे में स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण से जुड़े अधिकारों को शामिल किया गया है। CJI सूर्यकांत ने इसी व्यापक संवैधानिक दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा कि पर्यावरणीय क्षति केवल प्रकृति को प्रभावित करने वाला मुद्दा नहीं है।
इसका असर मनुष्य के जीवन, स्वास्थ्य, आजीविका और समानता से जुड़े अधिकारों पर भी पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में यह संबंध और महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि बदलते तापमान, चरम मौसम की घटनाएं और पारिस्थितिक बदलाव समाज के अलग-अलग वर्गों को अलग-अलग तरीके से प्रभावित कर सकते हैं।
परियोजनाओं के लिए शर्तें और जवाबदेही जरूरी
CJI ने पर्यावरण संरक्षण की न्यायिक अवधारणाओं में विकसित हो रहे संतुलन पर भी जोर दिया। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि किसी विकास परियोजना को अनुमति देते समय उसके पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन, विशेषज्ञ निगरानी, क्षतिपूरक उपाय, बहाली और जवाबदेही जैसे पहलुओं को पर्याप्त महत्व दिया जाए।
ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य विकास गतिविधियों को पूरी तरह रोकना नहीं, बल्कि उनके पर्यावरणीय प्रभावों को नियंत्रित करना और नुकसान की स्थिति में सुधारात्मक उपाय सुनिश्चित करना है।










