Cotton Import Duty: कपड़े महंगे होने का खतरा? ड्यूटी फ्री कपास आयात बढ़ाने की मांग

Cotton Import Duty: कपड़ा उद्योग ने कपास के ड्यूटी फ्री आयात की अवधि बढ़ाने की मांग की है। कच्चे माल की कीमत और सप्लाई पर दबाव बढ़ने से कपड़ों के महंगे होने

टेक्सटाइल इंडस्ट्री की मांग को देखते हुए केंद्र सरकार ने जून से 31 अक्टूबर तक कपास के ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट की अनुमति दी थी। इस फैसले का उद्देश्य कपड़ा उद्योग और इससे जुड़े लोगों को राहत देना, घरेलू बाजार में कपास की उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों को नियंत्रित रखना था।

बिजनेस न्यूज़: भारत के कपड़ा उद्योग ने कच्चे कपास के शुल्क-मुक्त (Duty Free) आयात की सुविधा को अगले छह महीने तक बढ़ाने की मांग की है। उद्योग का कहना है कि कपास और सूती धागे की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से परिधान निर्माताओं और निर्यातकों की लागत बढ़ रही है। ऐसे में सस्ते कच्चे माल की उपलब्धता बनाए रखना जरूरी है, ताकि भारतीय टेक्सटाइल और गारमेंट इंडस्ट्री वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सके।

केंद्र सरकार ने कपड़ा उद्योग की मांग को देखते हुए जून से 31 अक्टूबर 2026 तक कच्चे कपास पर लागू आयात शुल्क को हटाने का फैसला किया था। इस कदम का उद्देश्य घरेलू बाजार में कपास की उपलब्धता बढ़ाना और उद्योग को ऊंची कीमतों से राहत देना था। अब उद्योग संगठन चाहते हैं कि यह छूट अक्टूबर के बाद भी जारी रहे।

कपास और सूती धागे की कीमतों में तेज बढ़ोतरी

कपड़ा उद्योग के मुताबिक 2026 में कपास की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पिछले कुछ महीनों में कच्चे कपास की कीमत करीब 20 से 24 फीसदी तक बढ़ने की बात कही जा रही है। वहीं, Cotton Yarn यानी सूती धागे की कीमतों में इससे भी ज्यादा उछाल आया है। तिरुपुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष के.एम. सुब्रमणियन के अनुसार, सूती धागे की कीमतों में इस साल करीब 60 फीसदी तक वृद्धि हुई है। 

तिरुपुर भारत के प्रमुख निटेड गारमेंट निर्यात केंद्रों में शामिल है। उद्योग का कहना है कि धागे की कीमत बढ़ने से तैयार कपड़ों की उत्पादन लागत पर सीधा असर पड़ रहा है, जिससे निर्यातकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो सकता है। सुब्रमणियन के मुताबिक गारमेंट निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की लागत में सूती धागे की हिस्सेदारी करीब 60 फीसदी तक होती है। इसलिए धागे की कीमत में बड़ा बदलाव पूरे परिधान उद्योग की लागत को प्रभावित करता है।

भारत में कपास उत्पादन में गिरावट बनी बड़ी वजह

घरेलू कपास उत्पादन में गिरावट को कीमतों में तेजी की प्रमुख वजहों में माना जा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में भारत का कपास उत्पादन करीब 2.35 फीसदी घटकर 290 लाख गांठ रह गया। प्रत्येक गांठ का मानक वजन करीब 170 किलोग्राम बताया गया है। भारत में कपास उत्पादन पिछले कुछ वर्षों से दबाव में है। 2021-22 की तुलना में उत्पादन में 17 फीसदी से अधिक की कमी आने की बात सामने आई है। उत्पादन घटने के साथ घरेलू कपड़ा उद्योग की कच्चे माल की जरूरत और आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ने की चिंता भी बढ़ी है।

भारत दुनिया के प्रमुख कपास उत्पादकों और टेक्सटाइल निर्यातकों में शामिल है। इसलिए घरेलू उत्पादन में बदलाव का असर केवल किसानों और मिलों पर ही नहीं, बल्कि गारमेंट निर्यात और वैश्विक सप्लाई चेन पर भी पड़ सकता है।

ड्यूटी फ्री आयात बढ़ाने के पक्ष में उद्योग

सरकार की ओर से कच्चे कपास पर करीब 11 फीसदी के आयात शुल्क को अस्थायी रूप से हटाने का फैसला उद्योग को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर कच्चा माल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया था। अब टेक्सटाइल कंपनियां चाहती हैं कि यह व्यवस्था कम से कम छह महीने और जारी रहे। उद्योग का तर्क है कि यदि घरेलू बाजार में कपास की पर्याप्त उपलब्धता नहीं रहती और कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो इसका असर सूती कपड़े और तैयार परिधानों की लागत पर पड़ सकता है। इससे भारतीय निर्यातकों को बांग्लादेश, वियतनाम और अन्य प्रमुख टेक्सटाइल निर्यातक देशों से प्रतिस्पर्धा में मुश्किल हो सकती है।

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