धनबाद: झारखंड के धनबाद में टीबी मरीजों को मिलने वाली सरकारी पोषण सहायता राशि में कथित गड़बड़ी का मामला सामने आया है। मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट (MDR) टीबी के एक मरीज के नाम पर जारी होने वाली पोषण राशि बिहार के एक युवक के बैंक खाते में पहुंच गई। मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की भुगतान व्यवस्था और लाभुकों के बैंक विवरण की जांच पर सवाल उठने लगे हैं।
मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि टीबी मरीजों के इलाज के दौरान उन्हें पोषण संबंधी सहायता देने के लिए सरकार की ओर से सीधे बैंक खाते में राशि भेजने की व्यवस्था है। केंद्र सरकार की निक्षय पोषण व्यवस्था में पात्र टीबी मरीजों को पोषण सहायता DBT के जरिए देने का प्रावधान है। केंद्रीय क्षय रोग प्रभाग भी पोषण सहायता के लिए प्रत्यक्ष लाभ अंतरण यानी DBT व्यवस्था संचालित करता है।
धनबाद में सामने आए मामले में आरोप है कि जिस MDR टीबी मरीज को पोषण राशि मिलनी चाहिए थी, उसके बजाय रकम बिहार के एक युवक के खाते में चली गई। यानी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज लाभुक और बैंक खाते के बीच कथित तौर पर गड़बड़ी हुई। अब यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि मरीज का बैंक खाता किस स्तर पर बदला गया या सिस्टम में गलत खाता संख्या कैसे दर्ज हुई।
मामले ने स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड अपडेट करने की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी योजनाओं में लाभुकों की पहचान, आधार और बैंक खाते का मिलान बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि लाभुक का नाम सही होने के बावजूद भुगतान किसी दूसरे व्यक्ति के खाते में चला गया, तो यह जांच का विषय है कि डेटा एंट्री, बैंक विवरण सत्यापन या भुगतान प्रक्रिया में गलती कहां हुई।
सबसे अहम सवाल यह है कि क्या यह महज तकनीकी गलती थी या जानबूझकर लाभुक के बैंक खाते में बदलाव किया गया? इसका जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा। विभाग को संबंधित मरीज के रिकॉर्ड, बैंक खाते, भुगतान की तारीख, भुगतान आदेश और सिस्टम में दर्ज बैंक विवरण की जांच करनी होगी।
इस मामले में बिहार के युवक के खाते में राशि पहुंचना भी जांच का महत्वपूर्ण बिंदु है। युवक का धनबाद के मरीज से क्या संबंध है, उसके खाते का विवरण सरकारी रिकॉर्ड में कैसे दर्ज हुआ और कितनी राशि उसके खाते में पहुंची—इन सभी सवालों के जवाब जुटाए जा रहे हैं।
यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी व्यक्ति ने जानबूझकर मरीज के खाते की जगह दूसरे व्यक्ति का बैंक खाता दर्ज कराया था, तो मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं रहेगा। ऐसी स्थिति में जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।
वहीं यदि यह तकनीकी या डेटा एंट्री की गलती साबित होती है तो विभाग को भुगतान व्यवस्था में सुधार करना होगा, ताकि भविष्य में किसी मरीज की सरकारी सहायता किसी दूसरे व्यक्ति के खाते में न जाए।
टीबी मरीजों के लिए पोषण सहायता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बीमारी के दौरान शरीर को पर्याप्त पोषण की जरूरत होती है। केंद्र सरकार की ओर से टीबी मरीजों के लिए पोषण देखभाल और सहायता को राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है।
खासकर MDR टीबी मरीजों के मामले में लंबे समय तक इलाज और दवाओं की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे मरीजों के लिए नियमित उपचार के साथ पर्याप्त पोषण बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए यदि पात्र मरीज को मिलने वाली सहायता राशि किसी अन्य खाते में चली जाए तो इसका सीधा असर मरीज की आर्थिक स्थिति पर पड़ सकता है।
यह मामला सामने आने के बाद विभागीय अधिकारियों के सामने एक और चुनौती यह है कि धनबाद में कितने अन्य टीबी मरीजों के बैंक खातों का सत्यापन किया गया है। यदि एक मामले में बैंक खाते से जुड़ी गड़बड़ी सामने आई है तो दूसरे लाभुकों के रिकॉर्ड की भी जांच करना जरूरी हो सकता है।
सरकारी योजनाओं में DBT का उद्देश्य यही है कि बिचौलियों की भूमिका खत्म हो और लाभ सीधे पात्र व्यक्ति के बैंक खाते में पहुंचे। केंद्रीय टीबी प्रभाग भी निक्षय पोषण सहायता के लिए DBT व्यवस्था और उससे जुड़े दिशा-निर्देश उपलब्ध कराता है।
ऐसे में किसी दूसरे व्यक्ति के खाते में भुगतान पहुंचने की घटना DBT व्यवस्था के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है। सिस्टम में बैंक खाता दर्ज करने से लेकर अंतिम भुगतान तक कई स्तरों पर सत्यापन की व्यवस्था होती है। अब जांच में यह देखना होगा कि इन प्रक्रियाओं का पालन किया गया था या नहीं।
मामले में यह भी पता लगाया जा सकता है कि संबंधित MDR टीबी मरीज को इससे पहले पोषण सहायता की राशि मिली थी या नहीं। अगर पहले भुगतान सही खाते में होता रहा और अचानक बैंक खाता बदल गया, तो यह बदलाव कब और किसके लॉगिन या रिकॉर्ड के जरिए हुआ, इसकी जांच महत्वपूर्ण होगी।
दूसरी तरफ अगर शुरुआत से ही गलत खाता दर्ज था तो सवाल उठेगा कि मरीज के बैंक दस्तावेज और सरकारी रिकॉर्ड का मिलान किस तरह किया गया। यही जानकारी पूरे मामले की असली वजह सामने लाने में मदद कर सकती है।
धनबाद में सामने आई इस घटना से टीबी उन्मूलन कार्यक्रम की जमीनी निगरानी पर भी चर्चा शुरू हो सकती है। किसी बीमारी के इलाज के साथ मरीज को मिलने वाली सरकारी सहायता भी समय पर और सही व्यक्ति तक पहुंचना जरूरी है। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए सरकारी सहायता उपचार की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
फिलहाल इस मामले में सबसे जरूरी है कि संबंधित मरीज की राशि सुरक्षित रूप से उसके खाते में पहुंचाई जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि गलत खाते में भुगतान कैसे हुआ। साथ ही यदि किसी स्तर पर जानबूझकर गड़बड़ी की गई है तो जिम्मेदार लोगों की पहचान कर कार्रवाई की जानी चाहिए।
मामले की जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि बिहार के युवक के खाते में पहुंची राशि के पीछे तकनीकी गलती, रिकॉर्ड में लापरवाही या सुनियोजित गड़बड़ी में से क्या कारण था। फिलहाल घटना ने स्वास्थ्य विभाग की भुगतान व्यवस्था और लाभुकों के बैंक विवरण के सत्यापन पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।









