उत्तराखंड के चमोली जिले में आवारा और हिंसक कुत्तों के बढ़ते आतंक ने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। नारायणबगड़ और नलगांव क्षेत्र में कुत्तों के हमलों के खतरे को देखते हुए 10 स्कूलों को बंद करने का फैसला लिया गया है। स्कूल बंद होने के बाद करीब 600 से अधिक बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन कराई जा रही है। प्रशासन की ओर से स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अभियान चलाकर अब तक तीन कुत्तों को पकड़े जाने की जानकारी सामने आई है।
कुत्तों के आतंक का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए स्कूलों में नियमित कक्षाएं रोकनी पड़ी हैं। प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में बच्चों को स्कूल तक पहुंचने के दौरान आवारा कुत्तों के हमले से कैसे सुरक्षित रखा जाए। ऐसे में फिलहाल ऑनलाइन पढ़ाई को वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि स्कूल जाने वाले बच्चों को अक्सर पैदल ही रास्ता तय करना पड़ता है। पहाड़ी क्षेत्रों में कई गांवों और स्कूलों के बीच दूरी अधिक होती है और रास्ते सुनसान भी हो सकते हैं। ऐसे में अगर रास्ते में हिंसक कुत्तों का झुंड मौजूद हो तो बच्चों के लिए खतरा और बढ़ जाता है।
प्रशासन ने स्थिति को देखते हुए प्रभावित क्षेत्र में कुत्तों को पकड़ने का अभियान शुरू किया है। अब तक तीन कुत्तों को पकड़े जाने की जानकारी सामने आई है। अधिकारियों की कोशिश है कि ऐसे कुत्तों को चिन्हित किया जाए जो लोगों, खासकर बच्चों के लिए खतरा बन रहे हैं।
उत्तराखंड में आवारा कुत्तों की समस्या पहले भी सामने आती रही है। राज्य के शहरी विकास निदेशालय की व्यवस्था के तहत नगर निकायों को उग्र आवारा कुत्तों से जुड़ी शिकायतों के लिए निगरानी समिति और डॉग स्क्वॉड जैसी व्यवस्था करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। शिकायत मिलने पर कुत्ते को पकड़कर निगरानी में रखने और उसके व्यवहार के आधार पर आगे की कार्रवाई का प्रावधान है।
लेकिन चमोली के इस मामले ने समस्या की गंभीरता को एक अलग स्तर पर ला दिया है। यहां मामला सिर्फ सड़क पर घूमते आवारा कुत्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थिति इतनी चिंताजनक बताई जा रही है कि 10 स्कूलों में बच्चों की नियमित पढ़ाई रोकनी पड़ी है।
ऑनलाइन पढ़ाई शुरू होने से बच्चों की शिक्षा पूरी तरह बाधित न हो, इसकी कोशिश की जा रही है। 600 से ज्यादा विद्यार्थियों को डिजिटल माध्यम से पढ़ाया जा रहा है। हालांकि पहाड़ी क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी और मोबाइल नेटवर्क की समस्या के कारण ऑनलाइन शिक्षा अपने आप में चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
कई ग्रामीण परिवारों के सामने स्मार्टफोन और इंटरनेट की उपलब्धता भी एक समस्या हो सकती है। इसलिए स्कूल बंद करने के साथ-साथ प्रशासन और शिक्षा विभाग के लिए यह सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा कि हर बच्चे तक ऑनलाइन कक्षा की सुविधा पहुंचे और कोई विद्यार्थी पढ़ाई से बाहर न रह जाए।
बच्चों की सुरक्षा को लेकर अभिभावकों में भी चिंता स्वाभाविक है। माता-पिता चाहते हैं कि जब तक इलाके में हिंसक कुत्तों का खतरा पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो जाता, तब तक प्रशासन प्रभावी कदम उठाए। स्कूल दोबारा खोलने से पहले आसपास के रास्तों और स्कूल परिसर की सुरक्षा की समीक्षा करना भी जरूरी होगा।
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि केवल कुछ कुत्तों को पकड़ लेना स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता। इसके लिए क्षेत्र में आवारा कुत्तों की संख्या, उनके प्रजनन, भोजन के स्रोत और लोगों पर हमले की घटनाओं का रिकॉर्ड तैयार करना होगा। साथ ही यह भी पता लगाना होगा कि कौन से कुत्ते वास्तव में आक्रामक हैं और किन्हें पशु कल्याण नियमों के तहत नियंत्रित किया जा सकता है।
उत्तराखंड पशु कल्याण बोर्ड भी आवारा कुत्तों की आबादी नियंत्रण और संबंधित विभागों के साथ समन्वय की भूमिका निभाता है।
स्कूलों के आसपास विशेष निगरानी की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि बच्चे अक्सर कुत्तों के व्यवहार को समझ नहीं पाते। दौड़ने या अचानक चिल्लाने से कुत्ते के आक्रामक होने का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में बच्चों को भी आवारा या हिंसक कुत्तों से सुरक्षित दूरी बनाए रखने और किसी घटना की स्थिति में तुरंत बड़ों को जानकारी देने के बारे में जागरूक करना जरूरी है।
देश में आवारा कुत्तों के हमलों को लेकर चिंता लगातार बढ़ी है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों में भी शैक्षणिक संस्थानों समेत सार्वजनिक संस्थानों में कुत्तों के हमलों की बढ़ती घटनाओं को गंभीर सार्वजनिक सुरक्षा और स्वास्थ्य का मुद्दा माना गया है। अदालत ने ऐसे संस्थानों की पहचान और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की दिशा में निर्देश दिए हैं।
चमोली में स्कूल बंद करने का फैसला इसी व्यापक चिंता के बीच महत्वपूर्ण है। यहां प्रशासन के सामने एक तरफ बच्चों को सुरक्षित रखना है, तो दूसरी तरफ उनकी पढ़ाई को ज्यादा लंबे समय तक प्रभावित होने से बचाना है।
अगर कुत्तों का आतंक जल्द नियंत्रित होता है तो स्कूलों को दोबारा खोला जा सकता है। लेकिन इसके लिए प्रशासन को केवल पकड़े गए तीन कुत्तों तक कार्रवाई सीमित रखने के बजाय पूरे इलाके में स्थिति का आकलन करना होगा। स्कूलों के आसपास नियमित निगरानी, स्थानीय लोगों की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई और जरूरत पड़ने पर डॉग स्क्वॉड की तैनाती जैसे कदम मददगार हो सकते हैं।
इस पूरे मामले ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि आखिर ऐसी स्थिति आने से पहले आवारा कुत्तों की समस्या पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हो पाती। अगर किसी क्षेत्र में लगातार लोगों या बच्चों पर हमले की शिकायतें आती हैं तो स्थानीय प्रशासन को पहले ही संवेदनशील इलाकों की पहचान करके कार्रवाई करनी चाहिए।
फिलहाल 10 स्कूल बंद हैं, 600 से अधिक बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन चल रही है और तीन कुत्ते पकड़े जा चुके हैं। अब सबसे बड़ी चुनौती बच्चों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराकर स्कूलों में सामान्य पढ़ाई बहाल करना है।
यह घटना केवल चमोली या उत्तराखंड तक सीमित समस्या की ओर इशारा नहीं करती। देश के कई हिस्सों में बच्चों पर आवारा कुत्तों के हमले की खबरें सामने आती रही हैं। हाल में गाजियाबाद में भी स्कूल जा रहे एक बच्चे पर कुत्तों के झुंड के हमले के बाद उसकी मौत हो गई, जिसने बच्चों की सुरक्षा और आवारा कुत्तों के प्रबंधन को लेकर फिर गंभीर सवाल खड़े किए।
ऐसे में चमोली का फैसला प्रशासन के लिए एक अस्थायी सुरक्षा उपाय जरूर है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए कुत्तों की आबादी नियंत्रण, आक्रामक कुत्तों की पहचान, पशु चिकित्सा व्यवस्था और स्कूलों के आसपास सुरक्षा निगरानी को एक साथ मजबूत करना होगा।









