‘डिजिटल अरेस्ट’ मामलों पर बड़ी पहल: गृह मंत्रालय ने गठित की उच्चस्तरीय समिति, सुप्रीम कोर्ट को दी जानकारी

‘डिजिटल अरेस्ट’ मामलों पर बड़ी पहल: गृह मंत्रालय ने गठित की उच्चस्तरीय समिति, सुप्रीम कोर्ट को दी जानकारी

भारत में तेजी से बढ़ते ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर अपराध के मामलों पर केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि इन मामलों की गहन जांच और प्रभावी समाधान के लिए एक उच्चस्तरीय अंतर-विभागीय समिति का गठन कर दिया गया है। 

नई दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ से जुड़े मामलों की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है। डिजिटल अरेस्ट एक प्रकार का साइबर अपराध है, जिसमें ठग खुद को कानून प्रवर्तन एजेंसियों, अदालतों या सरकारी विभागों के अधिकारी बताकर पीड़ितों को फोन, ऑडियो और वीडियो कॉल के जरिए डराते-धमकाते हैं। इस दौरान पीड़ितों को मानसिक रूप से बंधक बनाकर उनसे पैसे ऐंठने का दबाव डाला जाता है।

क्या है ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर अपराध?

डिजिटल अरेस्ट एक गंभीर साइबर ठगी का तरीका है, जिसमें अपराधी खुद को पुलिस अधिकारी, अदालत के प्रतिनिधि या सरकारी एजेंसी का कर्मचारी बताकर लोगों को डराते-धमकाते हैं। ऑडियो और वीडियो कॉल के जरिए पीड़ितों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि वे किसी कानूनी मामले में फंस गए हैं। इसके बाद उन्हें डिजिटल रूप से “हिरासत” में होने का डर दिखाकर पैसे ऐंठे जाते हैं। कई मामलों में पीड़ितों से लंबे समय तक संपर्क बनाए रखकर उन्हें मानसिक दबाव में रखा जाता है।

पिछले साल दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ मामलों का देशव्यापी समन्वित जांच करने के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को निर्देश दिया था। यह आदेश हरियाणा के एक बुजुर्ग दंपति की शिकायत पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जारी किया गया था। अदालत ने इस दौरान गृह मंत्रालय समेत अन्य केंद्रीय मंत्रालयों से भी पूछा था कि साइबर अपराधों से निपटने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।

समिति का गठन और उद्देश्य

गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा) की अध्यक्षता में इस उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है। समिति का मुख्य उद्देश्य डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों की व्यापक और रियल-टाइम जांच, मौजूदा कानूनों की समीक्षा और उनके प्रभावी क्रियान्वयन में आ रही कमियों की पहचान करना है। समिति के प्रमुख कार्यों में शामिल हैं:

  • डिजिटल अरेस्ट मामलों से जुड़े मौजूदा मुद्दों का विश्लेषण
  • न्याय मित्र द्वारा दी गई सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर विचार
  • संबंधित कानूनों, नियमों और परिपत्रों में मौजूद खामियों की पहचान
  • साइबर अपराध से निपटने के लिए सुधारात्मक उपाय सुझाना

समिति में कौन-कौन शामिल?

इस समिति में कई अहम मंत्रालयों और एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल किए गए हैं, जिनमें:

  • इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय
  • विदेश मंत्रालय
  • वित्तीय सेवा विभाग
  • विधि एवं न्याय मंत्रालय
  • उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय
  • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI)
  • केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI)
  • राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA)
  • दिल्ली पुलिस
  • भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C)

गृह मंत्रालय के अनुसार, I4C के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) इस समिति के सदस्य-सचिव होंगे। समिति की बैठक हर दो सप्ताह में आयोजित की जाएगी। मंत्रालय ने बताया कि समिति की पहली बैठक 29 दिसंबर को हुई थी। इस बैठक में CBI ने डिजिटल अरेस्ट मामलों की जांच के लिए एक मौद्रिक सीमा तय करने का सुझाव दिया। 

इसके अलावा, ठगी की रकम की त्वरित निकासी रोकने और उसे वापस दिलाने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) को अंतिम रूप देने पर काम चल रहा है। साथ ही, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) और 1930 हेल्पलाइन के पुनर्गठन पर भी गंभीरता से विचार किया जा रहा है, ताकि पीड़ितों को तेजी से राहत मिल सके।

Leave a comment