यह कहानी हमें आपसी झगड़े के नुकसान और तीसरे पक्ष द्वारा उसका लाभ उठाने की चतुराई को दर्शाती है। यह हमें सिखाती है कि जब दो लोग आपस में लड़ते हैं, तो उनकी मूर्खता का फायदा हमेशा कोई तीसरा उठा ले जाता है। एकता और मिल-जुलकर रहने में ही भलाई है, क्योंकि आपसी फूट केवल बर्बादी और पछतावा ही लेकर आती है।
कहानी
एक बार की बात है, एक गाँव में दो बिल्लियाँ रहती थीं। वे दोनों बहुत अच्छी सहेलियाँ थीं और अक्सर साथ मिलकर शिकार किया करती थीं। एक दिन उन्हें कहीं से एक रसीली और ताज़ा रोटी का टुकड़ा मिला। दोनों बिल्लियाँ उस रोटी को देखकर बहुत खुश हुईं, लेकिन जैसे ही उसे खाने की बारी आई, उनके मन में लालच आ गया।
पहली बिल्ली ने झट से रोटी पर पंजा मारा और कहा, 'इस रोटी को सबसे पहले मैंने देखा है, इसलिए इस पर मेरा हक है और मैं इसे खाऊँगी।' दूसरी बिल्ली ने तुरंत विरोध करते हुए कहा, 'नहीं, इसे झपट्टा मारकर मैंने उठाया है, इसलिए यह रोटी मेरी है।' देखते ही देखते उन दोनों सहेलियों के बीच घमासान झगड़ा शुरू हो गया। वे एक-दूसरे पर गुर्राने लगीं और पंजा मारने की कोशिश करने लगीं। न तो पहली बिल्ली पीछे हटने को तैयार थी और न ही दूसरी।
काफी देर तक लड़ने के बाद उन्हें लगा कि इस तरह तो रोटी कोई नहीं खा पाएगा। तभी उनकी नज़र पास के पेड़ पर बैठे एक बंदर पर पड़ी। बंदर बहुत ही चालाक और धूर्त था। बिल्लियों ने सोचा कि क्यों न इस बंदर से अपना फैसला करवाया जाए। वे बंदर के पास गईं और बोलीं, 'बंदर मामा, हमारे पास एक रोटी है लेकिन हम तय नहीं कर पा रहे कि इसे बराबर कैसे बाँटें। क्या आप हमारे बीच न्याय कर सकते हैं?'
बंदर के मन में तो पहले से ही लड्डू फूट रहे थे। उसने बड़ी गंभीरता से कहा, 'हाँ-हाँ, क्यों नहीं! मैं तो हमेशा सत्य और न्याय का साथ देता हूँ। तुम दोनों घबराओ मत, मैं इस रोटी के दो बिल्कुल बराबर हिस्से कर दूँगा।' बंदर कहीं से एक तराजू लेकर आया। उसने रोटी के दो टुकड़े किए और उन्हें तराजू के दोनों पलड़ों में रख दिया।
एक पलड़ा थोड़ा भारी हो गया। बंदर ने कहा, 'अरे! यह हिस्सा तो थोड़ा बड़ा हो गया। रुको, मैं इसे खाकर दूसरे के बराबर कर देता हूँ।' बंदर ने उस बड़े टुकड़े में से एक बड़ा निवाला तोड़कर खा लिया। अब दूसरा पलड़ा भारी हो गया। बंदर ने फिर वही बात दोहराई, 'ओह! अब यह भारी हो गया। इसे भी बराबर करना पड़ेगा।' इस तरह बंदर जान-बूझकर बार-बार रोटी के टुकड़े खाता रहा।
बिल्लियाँ बेबसी से बंदर का मुँह देख रही थीं। धीरे-धीरे रोटी का आकार बहुत छोटा रह गया। बिल्लियाँ समझ गईं कि बंदर उन्हें बेवकूफ बना रहा है और पूरी रोटी खा जाएगा। उन्होंने डरते हुए कहा, 'बंदर मामा, अब आप तकलीफ मत कीजिए। जो बचा है वह हमें दे दीजिए, हम खुद ही बाँट लेंगी।'
लेकिन बंदर बहुत चालाक था। उसने आखिरी छोटा टुकड़ा हाथ में उठाया और बोला, 'यह छोटा सा टुकड़ा तो मेरी मेहनत की फीस है। मैंने तुम दोनों का इतना बड़ा झगड़ा सुलझाया है, क्या मुझे कुछ नहीं मिलना चाहिए?' इतना कहकर बंदर ने वह आखिरी टुकड़ा भी अपने मुँह में डाल लिया और पेड़ पर चढ़ गया। दोनों बिल्लियाँ खाली हाथ एक-दूसरे का मुँह ताकती रह गईं। उनकी आपसी लड़ाई के कारण उन्हें भूखा रहना पड़ा।
सीख
इस कहानी से हमें यह अनमोल सीख मिलती है कि 'जब दो लोग आपस में लड़ते हैं, तो फायदा हमेशा किसी तीसरे का ही होता है।' (When two people fight, the third one reaps the benefit). हमें अपने विवादों को मिल-जुलकर सुलझाना चाहिए, वरना कोई चालाक व्यक्ति हमारी फूट का लाभ उठाकर हमें कंगाल कर सकता है।













