हम अक्सर अपनी क्षमताओं पर भरोसा करने के बजाय दूसरों की राय को सच मान लेते हैं। यह कहानी दो मेंढकों के संघर्ष की है, जो हमें सिखाती है कि जीवन में कई बार 'बहरा' हो जाना ही हमारे लिए वरदान साबित होता है। जब हम दूसरों की नकारात्मक बातों को सुनना बंद कर देते हैं, तभी हम असंभव को संभव कर पाते हैं।
मुख्य कहानी
एक बार मेंढकों का एक बड़ा झुंड जंगल के रास्ते से कहीं जा रहा था। वे सब कतार में चल रहे थे और 'टर्र-टर्र' की आवाज़ करते हुए अपनी यात्रा का आनंद ले रहे थे। अचानक, रास्ते में एक गहरा गड्ढा आया। आगे चल रहे दो मेंढक ध्यान नहीं दे पाए और धड़ाम से उस गहरे गड्ढे में गिर गए।
गड्ढा बहुत गहरा था और उसकी दीवारें बहुत खड़ी थीं। जब बाकी मेंढकों ने देखा कि उनके दो साथी नीचे गिर गए हैं, तो वे सब गड्ढे के किनारे जमा हो गए। उन्होंने ऊपर से नीचे झाँका और गहराई देखकर उनके होश उड़ गए।
ऊपर खड़े मेंढकों ने आपस में कानाफूसी की और निष्कर्ष निकाला कि अब इन दोनों का बचना नामुमकिन है। उन्होंने ऊपर से चिल्लाकर नीचे गिरे हुए मेंढकों से कहा, 'मित्रों! यह गड्ढा बहुत गहरा है। तुम लोग बाहर निकलने की कोशिश मत करो। यह बेकार है। तुम कभी बाहर नहीं आ पाओगे।'
लेकिन नीचे गिरे दोनों मेंढकों ने उनकी बात को अनसुना कर दिया। वे अपनी पूरी ताकत लगाकर ऊपर छलांग लगाने लगे। वे बार-बार कूदते, लेकिन दीवारें इतनी ऊँची थीं कि वे वापस नीचे गिर जाते।
ऊपर खड़े मेंढक लगातार चिल्ला रहे थे, 'अरे! क्यों व्यर्थ में अपनी ऊर्जा बर्बाद कर रहे हो? यह असंभव है! देखो, दीवारें कितनी सीधी हैं। तुम गिरकर मर जाओगे। हार मान लो और शांति से अपनी मृत्यु का इंतजार करो।'
उन शब्दों का असर होने लगा। पहले मेंढक ने ऊपर वालों की बातें सुन लीं। उसने सोचा, 'शायद ये सही कह रहे हैं। गड्ढा सचमुच बहुत गहरा है और मैं थक चुका हूँ।'
उसकी हिम्मत टूट गई। नकारात्मक बातों ने उसके आत्मविश्वास को खत्म कर दिया। उसने कोशिश करना छोड़ दिया और हताशा में गड्ढे के एक कोने में बैठ गया। कुछ ही देर में, उम्मीद खो देने के कारण उसने वहीं अपने प्राण त्याग दिए।
लेकिन दूसरा मेंढक अलग था। वह अभी भी हार नहीं मान रहा था। वह गिरता, फिर उठता और पहले से भी ज्यादा जोर लगाकर छलांग लगाता। उसका शरीर छिल गया था, वह बुरी तरह थक चुका था, लेकिन उसकी आँखों में एक ही लक्ष्य था, बाहर निकलना।
ऊपर खड़े मेंढक यह देखकर और जोर से चिल्लाने लगे, 'अरे मूर्ख! क्यों खुद को इतना तड़पा रहा है? तेरे साथी की तरह तू भी मर जाएगा। बस कर! हार मान ले!'
हैरानी की बात यह थी कि ऊपर वाले जितना जोर से चिल्लाते और उसे रोकने के लिए हाथ-पैर हिलाते, वह मेंढक उतनी ही ज्यादा ताकत से छलांग लगाता। ऐसा लग रहा था जैसे उनका चिल्लाना उसमें जोश भर रहा हो।
उसने अपनी सारी बची-खुची ताकत इकट्ठा की, अपनी नसों को कस लिया और एक अंतिम, जोरदार छलांग लगाई। इस बार वह गड्ढे के मुहाने तक पहुँच गया और लुढ़कते हुए बाहर घास पर आ गिरा।
वह बच गया था!
ऊपर खड़े मेंढकों को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। जब उस मेंढक की सांसें थोड़ी सामान्य हुईं, तो उन्होंने उसे घेर लिया और पूछा, 'क्या तुमने हमारी बात नहीं सुनी? हम तो तुम्हें बता रहे थे कि यह असंभव है, फिर तुमने यह कैसे किया?'
मेंढक ने उन्हें प्रश्नभरी नजरों से देखा। तब उन्हें पता चला कि वह मेंढक बहरा था।
वह उनकी नकारात्मक बातें सुन ही नहीं सकता था। जब वे ऊपर से चिल्ला रहे थे और हाथ हिला-हिलाकर उसे रुकने (Demotivate) का इशारा कर रहे थे, तो उस बहरे मेंढक को लगा कि वे उसका उत्साह बढ़ा रहे हैं। उसे लगा कि वे कह रहे हैं, 'शाबाश! तुम कर सकते हो! थोड़ा और जोर लगाओ!'
इसी गलतफहमी ने, उस सकारात्मक सोच ने उसे वह शक्ति दी जिससे वह मौत के मुँह से बाहर निकल आया। जबकि दूसरा मेंढक, जो सुन सकता था, उसने नकारात्मकता को अपने अंदर आने दिया और अपनी जान गंवा दी।
सीख
शब्दों की शक्ति: हमारी जुबान में जीवन और मृत्यु दोनों की शक्ति होती है। एक हताश व्यक्ति को उत्साहजनक शब्द नया जीवन दे सकते हैं, जबकि नकारात्मक शब्द किसी का मनोबल तोड़कर उसे मार भी सकते हैं।













