गेहूं अनुसंधान में अहम योगदान के लिए डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। आईसीएआर से जुड़े इस वरिष्ठ वैज्ञानिक ने जलवायु अनुकूल गेहूं किस्मों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका शोध किसानों की आय बढ़ाने और भारत की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने में सहायक रहा है।
National Science Award 2025: राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह को गेहूं अनुसंधान में उल्लेखनीय योगदान के लिए सराहा गया है। यह सम्मान उन्हें भारत में, वर्ष 2025 में, कृषि विज्ञान के क्षेत्र में किए गए कार्यों के लिए दिया गया। आईसीएआर के नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज, नई दिल्ली से जुड़े डॉ. सिंह ने चार मेगा गेहूं किस्मों के विकास का नेतृत्व किया। उनका शोध इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे जलवायु परिवर्तन के दौर में भी किसानों को बेहतर और स्थिर उत्पादन मिल सका है।
गेहूं अनुसंधान में अहम योगदान
डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह वर्तमान में आईसीएआर के नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज, नई दिल्ली से जुड़े हैं और देश के प्रमुख गेहूं वैज्ञानिकों में गिने जाते हैं। उन्होंने गेहूं की चार मेगा किस्मों के विकास में नेतृत्व किया, जिससे उत्पादन बढ़ा और निर्यात की संभावनाएं मजबूत हुईं।
उनका फोकस ऐसी किस्मों पर रहा, जो गर्मी, सूखा और बदलते मौसम जैसी चुनौतियों में भी बेहतर पैदावार दे सकें। मार्कर-असिस्टेड सेलेक्शन और प्रिसीजन फीनोटाइपिंग जैसी आधुनिक तकनीकों के जरिए उन्होंने गेहूं सुधार को नई दिशा दी, जिसका सीधा लाभ किसानों तक पहुंचा।

शिक्षा और वैज्ञानिक सफर
मूल रूप से वाराणसी के रहने वाले डॉ. सिंह ने कृषि विज्ञान संस्थान और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से शिक्षा हासिल की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अनुसंधान के क्षेत्र को चुना और 1996 से 2001 तक करनाल में वैज्ञानिक के रूप में कार्य किया।
लगातार शोध और प्रयोगों के जरिए उन्होंने खुद को गेहूं अनुसंधान के एक भरोसेमंद नाम के रूप में स्थापित किया। उनके काम ने यह साबित किया कि वैज्ञानिक नवाचार किस तरह खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बना सकता है।
पुरस्कार और वैश्विक पहचान
डॉ. ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह को इससे पहले भी कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं, जिनमें डॉ. बीपी पाल अवार्ड, रफी अहमद किदवई अवार्ड और नानाजी देशमुख आउटस्टैंडिंग अवार्ड शामिल हैं। वे नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज सहित कई वैज्ञानिक संस्थाओं के फेलो हैं।
पौध प्रजनन पर उनके 188 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं, जो भारतीय कृषि अनुसंधान की वैश्विक पहचान को मजबूत करते हैं और युवा वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।









