दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति मामले में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। दोनों नेताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट में जज बदलने की मांग खारिज होने के बाद याचिका दाखिल कर निष्पक्ष सुनवाई की मांग की है।
New Delhi: दिल्ली की राजनीति से जुड़े चर्चित उत्पाद शुल्क नीति (Excise Policy) मामले में एक नया कानूनी मोड़ सामने आया है। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया ने अब इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। दोनों नेताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा उनकी मांग खारिज किए जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है।
दरअसल केजरीवाल और सिसोदिया ने मांग की थी कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की याचिका की सुनवाई किसी दूसरे जज के सामने कराई जाए। उनका कहना था कि इस मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति स्वर्ण कांत शर्मा की पीठ को लेकर उन्हें निष्पक्षता पर गंभीर आशंका है। हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने इस मांग को खारिज कर दिया। इसके बाद दोनों नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी है।
हाईकोर्ट में जज बदलने की मांग
इस पूरे विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब केजरीवाल और सिसोदिया ने 11 मार्च को दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक आवेदन दिया। इस आवेदन में उन्होंने कहा कि केंद्रीय एजेंसियों की याचिका की सुनवाई किसी अन्य न्यायाधीश के सामने कराई जाए।
उनका तर्क था कि मौजूदा परिस्थितियों में मामले की सुनवाई निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए और इसके लिए जरूरी है कि केस किसी दूसरी पीठ को सौंपा जाए। आम आदमी पार्टी के नेताओं का कहना था कि कुछ पहले दिए गए आदेशों से उन्हें निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा हुआ है।
लेकिन मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मौजूदा रोस्टर के अनुसार यह मामला उसी पीठ के पास सूचीबद्ध है और इसे बदलने के लिए कोई प्रशासनिक आधार नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश का स्पष्ट जवाब
मुख्य न्यायाधीश ने अपने जवाब में कहा कि अदालत की कार्यसूची यानी रोस्टर के अनुसार याचिका न्यायमूर्ति स्वर्ण कांत शर्मा को सौंपी गई है। उन्होंने कहा कि किसी भी मामले से खुद को अलग करने का फैसला संबंधित न्यायाधीश ही लेते हैं।
मुख्य न्यायाधीश के अनुसार अदालत के पास ऐसा कोई ठोस कारण नहीं है जिसकी वजह से मामले को किसी दूसरी पीठ में स्थानांतरित किया जाए। इसलिए जज बदलने की मांग को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इस फैसले के बाद आम आदमी पार्टी के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उनका कहना है कि मामले की निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना चाहिए।
सीबीआई की याचिका से जुड़ा मामला
दरअसल यह पूरा मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो की उस याचिका से जुड़ा है जिसमें निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी गई है। 27 फरवरी को एक निचली अदालत ने दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति मामले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपियों को बरी कर दिया था।

सीबीआई ने इस फैसले को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है। इस याचिका में एजेंसी ने कहा है कि निचली अदालत के फैसले में कई कानूनी और तथ्यात्मक त्रुटियां हैं।
सीबीआई की इसी याचिका की सुनवाई 16 मार्च को न्यायमूर्ति स्वर्ण कांत शर्मा की पीठ के सामने सूचीबद्ध की गई है। इसी सुनवाई से पहले केजरीवाल और सिसोदिया ने जज बदलने की मांग की थी।
2021 की उत्पाद शुल्क नीति क्या थी
दिल्ली सरकार ने वर्ष 2021 में नई उत्पाद शुल्क नीति लागू की थी। इस नीति का उद्देश्य शराब बिक्री प्रणाली में बदलाव करना और सरकारी राजस्व बढ़ाना बताया गया था। नई नीति के तहत शराब की बिक्री को निजी क्षेत्र के माध्यम से संचालित करने का मॉडल अपनाया गया। सरकार का दावा था कि इससे भ्रष्टाचार कम होगा और राजस्व में वृद्धि होगी।
हालांकि इस नीति को लागू होने के कुछ समय बाद ही विवादों का सामना करना पड़ा। विपक्षी दलों और कुछ अधिकारियों ने आरोप लगाया कि नीति में कई अनियमितताएं हुईं और कुछ शराब लाइसेंसधारियों को अनुचित लाभ दिया गया।
जांच एजेंसियों की कार्रवाई
इन आरोपों के बाद दिल्ली के उपराज्यपाल के आदेश पर केंद्रीय जांच एजेंसियों ने मामले की जांच शुरू की। केंद्रीय जांच ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस मामले में कई अधिकारियों और नेताओं से पूछताछ की।
जांच एजेंसियों का आरोप था कि नीति के क्रियान्वयन के दौरान रिश्वतखोरी और अनियमितताओं के जरिए सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया गया। हालांकि इस मामले में आरोपियों ने इन सभी आरोपों से इनकार किया है।
निचली अदालत ने फरवरी में अपने फैसले में कहा कि जांच एजेंसियों के कुछ निष्कर्षों में स्पष्ट कमियां दिखाई देती हैं। अदालत ने इसी आधार पर केजरीवाल, सिसोदिया सहित सभी आरोपियों को बरी कर दिया।
हाईकोर्ट के आदेश से बढ़ा विवाद
निचली अदालत के फैसले के बाद सीबीआई ने हाईकोर्ट का रुख किया। इस दौरान न्यायमूर्ति स्वर्ण कांत शर्मा ने 9 मार्च को मामले में कुछ अहम आदेश दिए। उन्होंने इस केस में शामिल सभी 23 आरोपियों को नोटिस जारी किया। इसके साथ ही सीबीआई के एक जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई पर रोक लगा दी।
न्यायमूर्ति शर्मा ने निचली अदालत की कुछ टिप्पणियों पर भी सवाल उठाए और कहा कि उनमें प्रथम दृष्टया कुछ त्रुटियां दिखाई देती हैं। इसके अलावा इस मामले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) की कार्यवाही को भी फिलहाल स्थगित कर दिया गया।
इन आदेशों के बाद आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया कि कुछ फैसले आरोपियों की बात सुने बिना दिए गए हैं। पार्टी का कहना है कि इससे निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका
इसी पृष्ठभूमि में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई है। याचिका में मांग की गई है कि इस मामले की सुनवाई निष्पक्ष तरीके से सुनिश्चित की जाए और जरूरत पड़ने पर इसे किसी अन्य पीठ को सौंपा जाए। साथ ही इस मामले को जल्द सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की भी मांग की गई है।








